तेज रफ्तार का ‘शुभ मुहूर्त’ — सड़क पर बारात,हाॅस्पिटल में बाराती…

खरसिया।एनएच-49 पर एक और हादसा हुआ। दो वाहन—एक बारातियों से भरी बोलेरो और दूसरी फ्रॉनक्स—आमने-सामने टकराए। टक्कर इतनी जोरदार कि दोनों गाड़ियाँ सड़क छोड़ खेत में जा गिरीं। कई लोग घायल हुए, कुछ की हालत उचित नहीं बताई जा रही है। घटना भूपदेवपुर थाना क्षेत्र के रक्सापाली और मुरा चौक के बीच एन एच 49 का बताया जा रहा है,पुलिस जांच में जुटी है।

अब तथ्य यहीं खत्म हो जाते हैं, और हमारी सामूहिक आदत शुरू होती है—कुछ देर अफसोस,फिर वही रफ्तार,वही लापरवाही, वही “मुझे क्या” वाला रवैया।
सवाल यह नहीं है कि हादसा कैसे हुआ। सवाल यह है कि क्या हमें वास्तव में जवाब चाहिए भी या नहीं? क्योंकि जवाब तो हर बार वही निकलता है—तेज रफ्तार,ओवरटेक की जल्दबाजी,और सड़क को अपनी निजी संपत्ति समझने की पुरानी बीमारी। फर्क सिर्फ इतना होता है कि इस बार कौन घायल हुआ, कौन बच गया?

विडंबना देखिए—एक तरफ बारात,यानी जीवन के नए अध्याय की शुरुआत; दूसरी तरफ वही सफर हाॅस्पिटल के बिस्तर पर खत्म होता नजर आता है। शायद अब “शुभ यात्रा” का मतलब भी बदल चुका है—घर से निकलो तो यह मानकर चलो कि सुरक्षित पहुंचना किस्मत की बात है,नियमों की नहीं।
स्थानीय लोग हर बार की तरह पहले मदद के लिए दौड़े। यह हमारे समाज का सबसे मजबूत पक्ष है—हादसे के बाद इंसानियत जाग जाती है। लेकिन सवाल फिर वही—क्या यह इंसानियत हादसे से पहले थोड़ी सी सतर्कता में नहीं बदल सकती?

सड़कें अब सिर्फ रास्ते नहीं रहीं,बल्कि हमारी मानसिकता का आईना बन गई हैं। जहां धैर्य की जगह अधीरता, नियमों की जगह ‘जुगाड़’, और जिम्मेदारी की जगह ‘चलता है’ ने ले ली है।
प्रशासन हर हादसे के बाद जांच करता है, चेतावनी देता है,अभियान चलाता है। लेकिन सड़क पर असली निर्णय ड्राइवर के हाथ में होता है—उस एक सेकंड का,जब वह तय करता है कि ब्रेक दबाना है या रफ्तार बढ़ानी है।
भविष्य की बात करें तो तस्वीर बहुत अलग नहीं दिखती—जब तक रफ्तार को रोमांच और नियमों को बोझ समझा जाता रहेगा,तब तक एनएच-49 जैसी सड़कें सिर्फ दूरी कम नहीं करेंगी, बल्कि जिंदगी भी कम करती रहेंगी।
शायद अब वक्त आ गया है कि हम यह तय करें—हमें मंजिल जल्दी चाहिए या सुरक्षित चाहिए। क्योंकि सड़क पर ‘जल्दी’ और ‘जिंदगी’ अक्सर एक साथ नहीं चलतीं।



