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“जब पानी पूछे—रास्ता मेरा था,अब कागज़ों में कहाँ जाऊँ?”

खरसिया।खरसिया तहसील क्षेत्र के ग्राम नहरपाली रेलवे फाटक से बीपीसीएल पेट्रोल पंप के बीच स्थित स्टेट हाईवे-200 से होकर प्राकृतिक बारिश का जल प्रवाह होते आ रहा था परन्तु प्राकृतिक जल प्रवाह को कुछ लोगों द्वारा बाधित करने की कोशिशें जारी हैं। स्थानीय स्तर पर यह आशंका जताई जा रही है कि वर्षा ऋतु में स्टेट हाइवे 200 जलमग्न हो सकता है, जिससे आवागमन पूरी तरह प्रभावित होगा। इस मार्ग का उपयोग खरसिया से जिला मुख्यालय, जिला मुख्यालय से खरसिया मुख्यालय तक आने-जाने वाले नागरिकों, नहरपाली स्कूल, जेएसडब्ल्यू के कर्मचारियों और मोनेट डीएवी स्कूल के विद्यार्थियों द्वारा नियमित रूप से किया जाता है।

क्षेत्र में कुछ समय से निर्माण की गतिविधियों के कारण प्राकृतिक जल निकासी तंत्र प्रभावित हुआ है। छोटे-छोटे नालों और बहाव मार्गों को या तो पाट दिया गया है या उनके ऊपर असंगत निर्माण कर दिए गए हैं। प्रारंभिक स्तर पर ये परिवर्तन नगण्य प्रतीत होते हैं, लेकिन वर्षा के समय यही “छोटी अनदेखी” बड़े संकट का रूप ले लेती है।
प्राकृतिक जल प्रवाह की अनदेखी का परिणाम पहले भी प्रभावित हुआ।

यहां स्थिति कुछ ऐसी है मानो पानी को भी अब अनुमति लेनी पड़े—“कृपया बताएं, बहने के लिए संबंधित विभाग से एनओसी ली है या नहीं?”
विकास की नई परिभाषा में शायद यह भी शामिल हो गया है कि जहां पानी बहता था, वहां अब कंक्रीट बहना चाहिए। फर्क सिर्फ इतना है कि कंक्रीट स्थायी है, और पानी… वह तो हर साल अपनी जिद के साथ लौट आता है।

स्थानीय प्रशासन,योजनाकार और संबंधित एजेंसियां शायद इस भरोसे में हैं कि बारिश भी फाइलों की तरह समय देखकर ही आएगी। और यदि आ भी गई, तो पानी खुद ही समझदार बनकर रास्ता बदल लेगा।
परंतु प्रकृति का स्वभाव फाइलों से नहीं, प्रवाह से चलता है—जहां रास्ता रोका जाएगा,वह वहीं ठहरेगा और फिर फैलकर अपना अस्तित्व दर्ज कराएगा।

यह विडंबना भी कम दिलचस्प नहीं कि समस्या सबको दिख रही है, पर समाधान के नाम पर सामूहिक चुप्पी है। शिकायत नहीं, शिकवा नहीं—तो कार्यवाही किस आधार पर हो? शायद इंतजार है उस दिन का,जब सड़क पूरी तरह जलमग्न हो और फिर “आपातकालीन निरीक्षण” की औपचारिकता निभाई जाए।

यदि वर्तमान स्थिति बनी रहती है,तो वर्षा काल में नहरपाली से रक्सापाली, स्टेट हाइवे 200मार्ग बाधित होना लगभग तय माना जा सकता है। इसका सीधा असर स्थानीय अर्थव्यवस्था,शिक्षा और दैनिक जीवन पर पड़ेगा।
स्कूल जाने वाले बच्चों से लेकर औद्योगिक क्षेत्र में कार्यरत कर्मचारियों तक,सभी को असुविधा का सामना करना पड़ सकता है। साथ ही,आपातकालीन सेवाओं के लिए भी यह मार्ग जोखिमपूर्ण हो जाएगा।

ऐसी समस्याओं का समाधान केवल तात्कालिक मरम्मत से नहीं, बल्कि दीर्घकालिक जल निकासी योजना और सख्त निगरानी से संभव है।
प्राकृतिक जल प्रवाह के मार्गों की पहचान, अतिक्रमण हटाने और वैज्ञानिक ड्रेनेज सिस्टम विकसित करने की आवश्यकता है।

अन्यथा,हर वर्ष यही प्रश्न दोहराया जाएगा—
“पानी आया क्यों?”
जबकि असल सवाल यह होना चाहिए—
“हमने उसके जाने का रास्ता छोड़ा क्यों नहीं?”

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Gopal Krishna Naik

Editor in Chief Naik News Agency Group

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