
खरसिया में अवैध खनन पर कार्यवाही के बाद सियासी हल-चल: ‘सेटिंग’ के भरोसे चलने वालों पर भारी पड़ी सख़्ती…
खरसिया।खरसिया रेंजर क्षेत्र में अवैध रेत खनन के खिलाफ हुई ताज़ा कार्रवाई ने न केवल खनन नेटवर्क को झटका दिया है, बल्कि स्थानीय स्तर पर राजनीतिक और प्रशासनिक हलचल भी तेज कर दी है। कार्रवाई के बाद कथित तौर पर प्रभावशाली संपर्कों के सहारे काम करने वाले लोगों के बीच बेचैनी देखी गई।
खरसिया रेंजर क्षेत्र के कम्पार्टमेंट 1160 पीएफ में वनभूमि से अवैध रेत उत्खनन के मामले में वन विभाग ने सख्त़ कार्यवाही करते हुए दो प्रकरण (POR) दर्ज किए हैं। कार्यवाही के दौरान दो ट्रैक्टर ज़प्त किए गए, जो अवैध रूप से रेत परिवहन में लगे थे। मौके से जुड़े आरोपियों की पहचान शुभम यादव (पलगड़ा) और परमेश्वर जायसवाल (पलगड़ा) के रूप में हुई है।
सूचना मिलते ही प्रशिक्षु आईएफएस अधिकारी कुणाल मिश्रा के नेतृत्व में वन विभाग की पेट्रोलिंग टीम ने तत्काल दबिश दी। टीम में वनपाल अरुण सोनवानी, वन रक्षक नंदकुमार राठिया और वनपाल दिनेश डनसेना शामिल थे। मौके पर पहुंचते ही दो ट्रैक्टर दिखाई दिए,जिनके चालक भागने की कोशिश करने लगे।
स्थिति की गंभीरता को देखते हुए स्वयं कुणाल मिश्रा करीब 200 मीटर तक दौड़कर आरोपियों का पीछा करते रहे। टीम की समन्वित कार्यवाही से दोनों वाहनों को ज़प्त कर लिया गया और आरोपियों को पकड़ना संभव हुआ।
जप्त वाहन और आरोपीत
सोनालिका ट्रैक्टर (क्रमांक 4993/23) ट्रॉली सहित – चालक शुभम यादव
महिंद्रा यूगो ट्रैक्टर (क्रमांक 4993/22) ट्रॉली सहित – चालक परमेश्वर जायसवाल
खरसिया क्षेत्र में वनभूमि से अवैध रेत खनन लंबे समय से एक गंभीर समस्या बना हुआ है। स्थानीय स्तर पर यह गतिविधि पर्यावरणीय संतुलन के साथ-साथ सरकारी राजस्व को भी नुकसान पहुंचा रही है।
इस कार्यवाही की खास बात सिर्फ जप्ती नहीं, बल्कि नेतृत्व का वह सक्रिय और आक्रामक स्वरूप है जो आमतौर पर जमीनी स्तर पर कम देखने को मिलता है। प्रशिक्षु स्तर पर होते हुए भी कुणाल मिश्रा का खुद मौके पर दौड़कर आरोपितों का पीछा करना एक स्पष्ट संदेश देता है—वन अपराध अब “लो-रिस्क” गतिविधि नहीं रहा।
ऐसी कार्यवाही को निरंतरता देना जरूरी है। नियमित पेट्रोलिंग, स्थानीय सूचना तंत्र को मजबूत करना और जब्त वाहनों पर कड़ी कानूनी कार्यवाही—ये तीनों कदम मिलकर ही अवैध खनन पर स्थायी रोक लगा सकते हैं।
खरसिया में हुई यह कार्यवाही सिर्फ एक जप्ती नहीं,बल्कि प्रशासनिक इच्छाशक्ति का उदाहरण है। प्रशिक्षु आईएफएस कुणाल मिश्रा ने यह दिखाया है कि यदि अधिकारी मैदान में उतरने को तैयार हों,तो अवैध गतिविधियों पर लगाम लगाना संभव है।



