
रायगढ़।रायगढ़ जिले में “ऑपरेशन आघात” के तहत कोतरारोड़ पुलिस ने ग्राम बायंग में अवैध महुआ शराब के खिलाफ कार्यवाही करते हुए 105 से अधिक डिब्बों में रखे लाहन को नष्ट किया और एक आरोपी को 12 लीटर शराब के साथ आरोपीत दादूलाल बंजारे को आबकारी एक्ट में गिरफ्तार कर न्यायिक रिमांड पर भेजा।

वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक ने स्पष्ट संदेश दिया है कि अवैध कारोबार पर लगातार सख़्ती जारी रहेगी।
जिले में लंबे समय से महुआ शराब का अवैध निर्माण एक समानांतर अर्थव्यवस्था की तरह फलता-फूलता रहा है। ग्रामीण अंचलों में यह न केवल कानून-व्यवस्था का मुद्दा है, बल्कि स्वास्थ्य और सामाजिक संरचना से भी जुड़ा हुआ है। ऐसे में समय-समय पर पुलिस कार्यवाही नई नहीं है, लेकिन इसके स्थायी समाधान पर सवाल हमेशा बने रहते हैं।
यहां दिलचस्प स्थिति यह है कि पुलिस की सक्रियता सुर्खियों में है, लेकिन आबकारी विभाग की भूमिका अक्सर पृष्ठभूमि में ही रह जाती है—इतनी पृष्ठभूमि में कि उसकी उपस्थिति का अहसास भी नहीं होता।
जब 100 से अधिक डिब्बों में लाहन खुले खेतों में “आराम फरमा” रहा था, तब निगरानी की जिम्मेदारी किसके पास थी—यह प्रश्न हवा में तैरता रहता है,जवाब कहीं दर्ज नहीं होता।
कार्यवाही के बाद तस्वीरें,बयान और सख़्ती के संदेश तेजी से सामने आते हैं,लेकिन उससे पहले की चुप्पी उतनी ही मजबूत और स्थिर रहती है।

इस बीच, कुछ स्थानीय स्तर के राजनीतिक कार्यकर्ता—चाहे वे किसी भी दल के हों—इस मुद्दे को भी अपने-अपने चश्मे से देखने में व्यस्त रहते हैं। अवैध शराब की समस्या उनके लिए सामाजिक चिंता से अधिक राजनीतिक तर्क-वितर्क का विषय बन जाती है।
परिणाम यह होता है कि असली प्रश्न—प्रणालीगत विफलता—शोर में दब जाता है।
इस तरह की कार्यवाही तत्काल प्रभाव में अवैध कारोबार पर चोट जरूर करती है, लेकिन जब तक संबंधित विभागों के बीच जवाबदेही स्पष्ट नहीं होगी, तब तक यह सिलसिला “रेड और रिलीज़” के चक्र से आगे बढ़ता नजर नहीं आता।
स्थानीय समाज पर इसका असर दोहरा है—एक ओर कानून का डर, दूसरी ओर व्यवस्था पर अविश्वास।
उक्त कार्यवाही वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक शशि मोहन सिंह, अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक अनिल सोनी एवं डीएसपी सुशांतो बनर्जी के मार्गदर्शन में की गई, जिसमें प्रशिक्षु डीएसपी अजय नागवंशी,थाना प्रभारी निरीक्षक कमला पुसाम ठाकुर,आरक्षक चुडामणी गुप्ता, राजेश खांडे,अजय साय,शुभम तिवारी,जयचंद भगत तथा ग्राम कोटवारों की सराहनीय भूमिका रही।
जरूरत केवल छापेमारी की नहीं, बल्कि समन्वित रणनीति और निरंतर निगरानी की है, जहां पुलिस और आबकारी विभाग दोनों समान रूप से सक्रिय और जवाबदेह हों।
अन्यथा, “ऑपरेशन” चलते रहेंगे, बयान आते रहेंगे, और खेतों में लाहन अपनी अगली खेप के इंतजार में फिर चुपचाप तैयार होता रहेगा।




