खरसिया।जनगणना प्रशिक्षण से लौटते समय एक दिव्यांग शिक्षक की सड़क दुर्घटना में मृत्यु ने प्रशासनिक व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना के बाद औपचारिकता के तौर पर राहत राशि प्रदान कर दी गई और शिक्षा विभाग अनुकम्पा नियुक्ति की प्रक्रिया शुरू कर ‘कर्तव्य’ की इतिश्री मान ली गई।
शिक्षक, जिसे समाज का आधार स्तंभ माना जाता है, पहले ही शारीरिक चुनौतियों से जूझ रहा था। ऐसे में उसे जोखिमपूर्ण ड्यूटी पर भेजना न केवल संवेदनहीनता का उदाहरण है, बल्कि प्रशासनिक विवेक पर भी प्रश्नचिह्न लगाता है। यह पहली घटना नहीं है जब व्यवस्थागत लापरवाही ने किसी कर्मचारी की जान ली हो, लेकिन हर बार की तरह इस बार भी प्रतिक्रिया सीमित और सतही ही नजर आई।
यह घटना केवल एक दुर्घटना नहीं, बल्कि उस तंत्र की विफलता है जहाँ नियमों से अधिक ‘प्रक्रियात्मक औपचारिकताएं’ महत्वपूर्ण हो जाती हैं। राहत राशि और अनुकम्पा नियुक्ति,एक परिवार के लिए अस्थायी सहारा हो सकते हैं,परंतु वे उस मूल प्रश्न को नहीं दबा सकते—क्या इस मृत्यु को रोका जा सकता था?
जिम्मेदार जनप्रतिनिधियों की चुप्पी इस पूरे घटनाक्रम को और भी गंभीर बना देती है। जब जवाबदेही की मांग उठनी चाहिए,तब मौन व्यवस्था के प्रति मौन समर्थन का संकेत देता है।
इस घटना ने न केवल शिक्षा विभाग की कार्यप्रणाली पर अविश्वास बढ़ाया है,बल्कि कर्मचारियों के बीच असुरक्षा की भावना भी गहरा दी है। यदि दिव्यांग कर्मचारी भी जोखिमपूर्ण परिस्थितियों में बिना पर्याप्त सुरक्षा के भेजे जाएंगे, तो यह पूरे सिस्टम की संवेदनशीलता पर प्रश्न है।
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आवश्यक है कि इस मामले में केवल आर्थिक सहायता तक सीमित न रहकर जिम्मेदारी तय की जाए। ड्यूटी निर्धारण के मानकों की समीक्षा,दिव्यांग कर्मचारियों के लिए विशेष प्रोटोकॉल,और दोषियों पर सख़्त कार्यवाही..यदि अब भी सुधार नहीं हुआ, तो यह केवल एक घटना नहीं रहेगी,बल्कि एक खतरनाक प्रवृत्ति का संकेत बनेगी—जहाँ सिस्टम की लापरवाही,जीवन से बड़ी हो जाएगी।




