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प्रेम में व्यापार नहीं होता …

खरसिया। खरसिया के ग्राम टेमटेमा में 24 फरवरी से 02 मार्च तक आयोजित संगीतमय श्रीमद्भागवत महापुराण एवं हरिवंश पुराण कथा के दौरान रविवार को साध्वी राधा किशोरी ने श्रीकृष्ण–रुक्मिणी विवाह, श्री राधे-जू कथा तथा सुभद्रा हरण प्रसंग का विस्तार से वर्णन किया। कथा में गर्ग संहिता के उदाहरणों के माध्यम से प्रेम और भक्ति के आध्यात्मिक स्वरूप को स्पष्ट किया गया।

साध्वी राधा किशोरी ने कहा कि प्रेम का मूल्यांकन किसी मापदंड से नहीं किया जा सकता, बल्कि यह समर्पण और आस्था का विषय है। उन्होंने श्रीकृष्ण और रुक्मिणी के विवाह प्रसंग को श्रद्धा, विश्वास और धर्म के आदर्श रूप में प्रस्तुत करते हुए भक्ति मार्ग के महत्व पर प्रकाश डाला।

श्रीमद्भागवत कथा में बार-बार यह सिद्धांत प्रतिपादित किया गया है कि सच्चा प्रेम नि:स्वार्थ होता है और उसमें किसी प्रकार का लेन-देन या स्वार्थ नहीं होता। भगवान श्रीकृष्ण और उनके भक्तों के संबंध के माध्यम से यह बताया गया है कि प्रेम का आधार समर्पण है, अपेक्षा नहीं।

श्रीमद्भागवत महापुराण का केंद्रीय विषय भक्ति है। इसमें गोपियों का श्रीकृष्ण के प्रति प्रेम, रुक्मिणी का समर्पण, सुदामा की मित्रता और मीरा जैसे भक्तों की भावना—सभी उदाहरण यह स्थापित करते हैं कि ईश्वर से संबंध किसी लाभ या प्रतिफल के लिए नहीं, बल्कि निष्काम भाव से होना चाहिए।

जहां स्वार्थ या लाभ की अपेक्षा जुड़ जाती है, वहां प्रेम का शुद्ध स्वरूप समाप्त हो जाता है और वह व्यवहार या सौदे जैसा बन जाता है।

  • निष्काम भक्ति का सिद्धांत: श्रीमद्भागवत के अनुसार प्रेम का सर्वोच्च रूप वह है जिसमें भक्त केवल भगवान को प्रसन्न करने की भावना से जुड़ा रहता है।
  • गोपियों का उदाहरण: वृंदावन की गोपियों का श्रीकृष्ण के प्रति प्रेम पूर्ण समर्पण और त्याग का प्रतीक माना जाता है, जिसमें किसी प्रतिफल की अपेक्षा नहीं थी।
  • मानव संबंधों का संदेश: कथा यह भी संकेत देती है कि सांसारिक संबंधों में भी स्वार्थ रहित प्रेम ही स्थायी और सार्थक होता है।

यह संदेश धार्मिक संदर्भ से आगे बढ़कर सामाजिक जीवन पर भी लागू होता है। कथा बताती है कि परिवार, मित्रता और समाज में संबंध तभी मजबूत बनते हैं जब उनमें अपेक्षा से अधिक विश्वास और त्याग का भाव हो। इस दृष्टि से श्रीमद्भागवत प्रेम को आध्यात्मिक और सामाजिक संतुलन का आधार मानती है।

विशेषज्ञों के अनुसार श्रीमद्भागवत का यह सिद्धांत आधुनिक जीवन में भी प्रासंगिक है, जहां संबंध अक्सर लाभ-हानि के आधार पर आंके जाते हैं। कथा का संदेश है कि नि:स्वार्थ प्रेम ही स्थायी शांति और आध्यात्मिक संतोष का मार्ग बन सकता है।

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भागवत कथा के भक्ति रस में डूबे डॉ. पुरन पटेल

पेशे से पशुपालन विभाग में सहायक सर्जन डॉ. पुरन पटेल इन दिनों चर्चा में है हजारों गौ वंश के सफल आपरेशन कर जीवन दान देने वाले श्रीमद्भागवत कथा के भक्ति रस में लीन नजर आ रहे हैं। साध्वी राधा किशोरी के श्री मुख से 24फरवरी से 02मार्च तक बहने वाले श्रीमद्भागवत कथा,हरिवंश पुराण अमृत के रसास्वादन के लिए पावन ग्राम टेमटेमा महा रास के संगीतमय प्रसंग के दौरान वे सपरिवार भजन और कीर्तन में तल्लीन होकर भावपूर्ण गोपी के भाव में ठुमके लगाते हुए दिखाई दिए।

संगीतमय श्रीमद्भागवत कथा हरिवंश पुराण में टोली के साथ उनकी सक्रिय उपस्थिति और भक्ति भाव ने कथा स्थल में उपस्थित श्रद्धालुओं का ध्यान आकर्षित किया। कथा के दौरान डॉ. पटेल का समर्पण यह दर्शाता है कि व्यस्त पेशेवर जीवन के बीच भी आध्यात्मिक आस्था और सांस्कृतिक परंपराओं के प्रति जुड़ाव बना हुआ है।

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Gopal Krishna Naik

Editor in Chief Naik News Agency Group

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