माँ

समाज और राष्ट्र के लिए तो अशोभनीय…

✍ अकलतरा@ श्याम केडिया

मुड़िया साधु! स्त्री से पुरुष तक, बच्चे से बूढ़े तक, सब मोहाग्नि में धधक रहे हैं। सुलग रहे हैं। इसी से अलग रहने के कारण, मुझे, तुम्हें सन्त-महात्मा, सज्जन, औघड़ अघोरेश्वरों को, जिन्हें कोई महत्वाकांक्षा नहीं है और जो अपने आपके स्वाध्याय में पूर्णतः तल्लीन रहने वाले हैं, पराश्रित न होने की प्रवृत्ति प्राप्त होती है।

मनुष्य को पशु, पक्षी से भी अधिक और शीघ्र कोई बात समझ में आती है। फिर भी वह महामाया के मोह से ग्रस्त रहता है। अनेक प्रकार के वैसे कृत्यों में संलग्न रहता है, जो समाज और राष्ट्र के लिए तो अशोभनीय हैं ही, स्वयं उसके लिए तो विश्वासघात के समान है।

।। प, पू, अघोरेश्वर ।।
।।।अघोर पीठ जन सेवा अभेद आश्रम ट्रस्ट, पोंड़ी दल्हा अकलतरा।।।

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Gopal Krishna Naik

Editor in Chief Naik News Agency Group

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