छत्तीसगढ़रायगढ़

इंसाफ के लिए सड़क पर उतरा रायगढ़ अधिवक्ता संघ…

न्याय की पुकार लिए अधिवक्ता संघ जब सड़क पर उतर आया,
सत्ता के गलियारों ने भी मौन पदयात्रा का शोर सुन पाया?

रायगढ़।रायगढ़ की युवा महिला अधिवक्ता की निर्मम हत्या ने केवल एक परिवार की दुनिया नहीं उजाड़ी, बल्कि उस व्यवस्था के सामने भी कठोर प्रश्न खड़े कर दिए हैं, जिसके भीतर न्याय की उम्मीदें सांस लेती हैं। एक ऐसी युवती, जिसने कानून को अपना पेशा चुना, लोगों को न्याय दिलाने का दायित्व निभाया, वही स्वयं क्रूरता की शिकार होकर सुनसान डैम किनारे वस्त्रविहीन अवस्था में मृत पाई गई। यह दृश्य केवल एक अपराध नहीं, बल्कि सभ्यता के चेहरे पर पड़ा भयावह दाग है।



हत्या की परिस्थितियाँ जितनी भयावह हैं, उतनी ही पीड़ादायक वह प्रतीक्षा भी है जिसमें एक परिवार अपनी बेटी की तलाश करता रहा। घर की चौखट पर लौटने की उम्मीद में बीतते दिन, बार-बार मोबाइल मिलाने की बेचैनी, और फिर पहचान के लिए चप्पल तथा वस्त्रो का सहारा लेना—यह किसी भी संवेदनशील समाज को भीतर तक विचलित कर देने वाला क्षण है। एक बहन का यह कहना कि कोई दूसरी लड़की मृतका की आवाज बनाकर फोन पर बात कर रही थी, इस पूरे प्रकरण को और अधिक रहस्यमय तथा भयावह बना देता है।

इस घटना के बाद जिला अधिवक्ता संघ का मौन मार्च केवल विरोध प्रदर्शन नहीं था, बल्कि वह  व्यवस्था के भीतर से उठी पीड़ा की सामूहिक अभिव्यक्ति थी। अदालत से पुलिस अधीक्षक कार्यालय तक पसरा मौन दरअसल बहुत कुछ कह रहा था—जब कानून के जानकार स्वयं असुरक्षित महसूस करने लगें, तब आशंकाओं का अनुमान सहज ही लगाया जा सकता है।

महिलाओं की सुरक्षा को लेकर वर्षों से दावे किए जाते रहे हैं, योजनाएँ बनती रही हैं, लेकिन ऐसी घटनाएँ बार-बार यह याद दिलाती हैं कि भय अब केवल सड़कों तक सीमित नहीं रहा। वह पेशों, संस्थाओं और सार्वजनिक जीवन के भीतर भी प्रवेश कर चुका है। एक महिला अधिवक्ता, जो प्रतिदिन न्यायालय आती-जाती थी, यदि सुरक्षित नहीं रह सकी, तो यह केवल व्यवस्था की चुनौती नहीं, बल्कि सामाजिक चेतना की विफलता भी है।



इस पूरे मामले में पुलिस द्वारा कुछ सुराग मिलने और शीघ्र गिरफ्तारी का आश्वासन निश्चित रूप से महत्वपूर्ण है, एक माँ-बाप के लिए अपनी बेटी की मृत्यु से बड़ा दुःख शायद ही कोई हो, और जब वह मृत्यु इतनी अमानवीय परिस्थितियों में हुई हो, तब न्याय केवल कानूनी प्रक्रिया नहीं रह जाता—वह भावनात्मक और नैतिक दायित्व बन जाता है।

अधिवक्ता आराधना सिदार अब लौटकर नहीं आएंगी। उनकी अधूरी फाइलें, अदालत के गलियारों में उनके कदमों की स्मृतियाँ और परिवार की टूटी हुई उम्मीदें लंबे समय तक इस घटना की गवाही देती रहेंगी। लेकिन यदि यह समाज सचमुच संवेदनशील है, तो इस मामले को केवल एक खबर बनकर समाप्त नहीं होने देना चाहिए। दोषियों की गिरफ्तारी और कठोर दंड ही उस पीड़ा के प्रति न्यूनतम न्याय होगा, जिसे आज एक परिवार, अधिवक्ता संघ और पूरा शहर महसूस कर रहा है।

किसी भी सभ्य समाज की पहचान इस बात से होती है कि वह अपनी बेटियों को कितना सुरक्षित महसूस कराता है। रायगढ़ की यह घटना उसी कसौटी पर हमारे समय से कठोर जवाब मांग रही है।

Show More

Gopal Krishna Naik

Editor in Chief Naik News Agency Group

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button
error: Content is protected !!