खरसियाछत्तीसगढ़रायगढ़

धर्म नगरी की गलियों में उठता एक असहज सवाल…

खरसिया।खरसिया इन दिनों केवल विकास, राजनीति और कारोबार की चर्चाओं तक सीमित नहीं है। चौक-चौराहों और चाय की दुकानों पर अब एक अलग तरह की कानाफूसी सुनाई देने लगी है। चर्चा उस कथित “नामी सटोरिया” की है,जो खुलेआम गमछा कांधे में डालकर नेताजी के साथ कदमताल करता दिखाई देता है। सवाल केवल उसकी मौजूदगी का नहीं,बल्कि उस सहज स्वीकार्यता का है,जो समाज और व्यवस्था दोनों की चुप्पी से जन्म लेती दिख रही है।

मामला यदि केवल व्यक्तिगत मेल-जोल तक सीमित होता, तो शायद इतनी चर्चा नहीं होती। लेकिन जब किसी व्यक्ति का नाम लंबे समय से अवैध कारोबार,जुआ, सट्टे या संदिग्ध गतिविधियों से जोड़ा जाता रहा हो और वही चेहरा सार्वजनिक आयोजनों में प्रभावशाली लोगों के साथ दिखाई दे,तब स्वाभाविक रूप से कई प्रश्न खड़े होते हैं। क्या यह केवल सामाजिक समीकरण है, राजनीतिक उपयोगिता है, या फिर प्रभाव और संरक्षण का कोई अदृश्य तंत्र काम कर रहा है — यह जांच का विषय है।

समस्या का दूसरा और अधिक गंभीर पक्ष यह है कि ऐसी चर्चाएं धीरे-धीरे जनता के भीतर संस्थाओं की विश्वसनीयता पर प्रश्नचिह्न खड़ा करती हैं। आम नागरिक यह सोचने को मजबूर होता है कि यदि आरोपों और चर्चाओं के बावजूद कोई व्यक्ति निर्भीक होकर सार्वजनिक जीवन में सक्रिय है, तो क्या जांच एजेंसियां निष्क्रिय हैं, या फिर प्रभाव इतना मजबूत है कि सवाल पूछने की हिम्मत ही कमजोर पड़ गई है।

हालांकि किसी भी व्यक्ति को केवल जन-चर्चा के आधार पर दोषी मान लेना न्यायसंगत नहीं होगा। कानून का मूल सिद्धांत यही कहता है कि आरोप और प्रमाण अलग-अलग चीजें हैं। लेकिन उतना ही महत्वपूर्ण यह भी है कि सार्वजनिक जीवन में पारदर्शिता दिखाई दे। यदि कोई संदेह है,तो उसका निष्पक्ष परीक्षण होना चाहिए, ताकि सच सामने आए और अफवाहों की राजनीति खत्म हो।

खरसिया जैसे तेजी से बदलते क्षेत्र में यह सवाल केवल एक व्यक्ति का नहीं, बल्कि उस सामाजिक व्यवस्था का है, जहां प्रभाव, राजनीति और कथित अवैध नेटवर्क के बीच की दूरी लगातार धुंधली होती जा रही है। सबसे बड़ा प्रश्न अब भी वही है — जांच होगी तो करेगा कौन, और यदि करेगा भी, तो क्या निष्पक्षता बची रह पाएगी?

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Gopal Krishna Naik

Editor in Chief Naik News Agency Group

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