तस्वीरों की राजनीति और ज़मीनी सवालों के बीच बढ़ती दूरी
✍️खरसिया। छत्तीसगढ़ के रायगढ़ जिले में स्थित खरसिया विधानसभा क्षेत्र राज्य की उन चुनिंदा सीटों में गिना जाता है जहाँ राजनीति की अपनी अलग परंपरा और इतिहास रहा है। आजादी के बाद से यह सीट कांग्रेस का मजबूत गढ़ मानी जाती रही है और अब तक के चुनावों में कांग्रेस उम्मीदवारों का वर्चस्व कायम रहा है। अन्य दलों,विशेषकर भाजपा के लिए यह सीट हमेशा चुनौतीपूर्ण रही है।
राजनीतिक दृष्टि से खरसिया की पहचान शहीद नंदकुमार पटेल के नाम से जुड़ी रही है, जिन्होंने इस सीट से लगातार छह बार विधानसभा चुनाव जीतकर क्षेत्रीय राजनीति में मजबूत आधार स्थापित किया। वर्तमान में उनके छोटे पुत्र उमेश नंदकुमार पटेल इस क्षेत्र का प्रतिनिधित्व तीसरी बार कर रहे हैं। उनके कार्यकाल में ओवरब्रिज निर्माण, सड़क विस्तार और अन्य आधारभूत सुविधाओं के विकास के प्रयास भी सामने आए हैं।
यह क्षेत्र मूलतः कृषि प्रधान है। अधिकांश मतदाता खेती-किसानी पर निर्भर हैं और धान सहित अन्य फसलें यहाँ की अर्थव्यवस्था का आधार हैं। वहीं हाल के वर्षों में कुछ औद्योगिक इकाइयों की स्थापना के कारण खरसिया धीरे-धीरे उभरते औद्योगिक क्षेत्र के रूप में भी पहचान बना रहा है।
सांस्कृतिक और पर्यटन दृष्टि से भी खरसिया का अपना महत्व है। यहाँ स्थित रामझरना को भगवान श्रीराम के वनवास काल से जुड़ा स्थल माना जाता है, जो स्थानीय आस्था का प्रमुख केंद्र है। इसके अलावा बोतल्दा रॉक गार्डन भी क्षेत्र का एक आकर्षक पर्यटन स्थल है। राजनीतिक इतिहास में यह क्षेत्र तब राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा में आया था जब मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री स्व कुंवर अर्जुन सिंह ने वर्ष 1988 में यहाँ से उपचुनाव लड़ा था। वहीं 2018 के विधानसभा चुनाव में पूर्व आईएएस अधिकारी ओ.पी. चौधरी और उमेश पटेल के बीच मुकाबले ने भी इस सीट को राज्य की चर्चित सीटों में शामिल कर दिया।
वर्तमान परिदृश्य: ‘क्लिक’ की राजनीति
वर्तमान समय में खरसिया की राजनीति में एक नया दृश्य उभरता दिखाई दे रहा है। कार्यक्रमों, बैठकों, उद्घाटन और निरीक्षणों से अधिक चर्चा अब उन तस्वीरों की हो रही है जो सोशल मीडिया पर तेजी से प्रसारित होती हैं। किसी भी आयोजन के बाद कैमरे की फ्लैश चमकती है और कुछ ही देर में तस्वीरें डिजिटल मंचों पर पहुँच जाती हैं। राजनीतिक गलियारों में इसे लेकर हल्के व्यंग्य और कटाक्ष भी सुनाई देने लगे हैं।
पिछले कुछ समय में क्षेत्र में कई ऐसे घटनाक्रम सामने आए हैं जिनमें जनप्रतिनिधियों और कार्यकर्ताओं की मौजूदगी से अधिक चर्चा फोटो साझा करने की रही। सड़क निरीक्षण से लेकर किसी कार्यक्रम में भागीदारी तक, हर गतिविधि के साथ तस्वीरों की श्रृंखला सामने आती है। स्थानीय लोग इसे मजाकिया अंदाज में “क्लिक वाली राजनीति” कहने लगे हैं।
इधर क्षेत्र के कुछ हालिया मुद्दों ने इस व्यंग्य को और हवा दी है। औद्योगिक क्षेत्र में मजदूरों के वेतन को लेकर उभरा असंतोष, राष्ट्रीय राजमार्ग-49 पर बढ़ती दुर्घटनाओं को लेकर चिंता, तथा आस-पास के गांवों में सड़क, पानी और बुनियादी सुविधाओं से जुड़े सवाल लगातार चर्चा में बने हुए हैं। स्थानीय लोगों का कहना है कि इन मुद्दों पर भी उतनी ही सक्रियता दिखाई देनी चाहिए जितनी किसी कार्यक्रम की तस्वीर साझा करने में दिखाई देती है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि डिजिटल युग में जनप्रतिनिधियों के लिए दृश्य उपस्थिति भी एक तरह की राजनीतिक रणनीति बन चुकी है। सोशल मीडिया के माध्यम से संदेश तेजी से पहुँचता है और समर्थकों के बीच संवाद का नया मंच बनता है। लेकिन इसके साथ ही जनता की अपेक्षा भी बढ़ जाती है कि तस्वीरों में दिखने वाली सक्रियता जमीनी बदलाव में भी दिखाई दे।
फिलहाल खरसिया की राजनीति ऐसे दौर से गुजर रही है जहाँ कैमरे की क्लिक और जनता की अपेक्षाएँ आमने-सामने खड़ी दिखाई देती हैं। तस्वीरें राजनीतिक संदेश जरूर देती हैं, लेकिन मतदाताओं के लिए अंततः वही तस्वीर स्थायी होती है जो सुख- दुःख और सुरक्षा जैसे मुद्दों के समाधान में दिखाई दे। आने वाले समय में यह देखना दिलचस्प होगा कि खरसिया की राजनीति ‘क्लिक’ से आगे बढ़कर ‘परिणाम’ की तस्वीर भी उतनी ही स्पष्ट बना पाती है या नहीं।
शब्दों की मर्यादा का स्मरण
यदि कहीं मेरे शब्द अपनी मर्यादा से भटकते प्रतीत हों तो कृपया अवगत अवश्य कराएँ।
संवाद का मूल्य तभी है जब उसमें विनम्रता और आत्मसुधार की गुंजाइश बनी रहे।
मानवीय भूल-चूक स्वाभाविक है,उन्हें स्वीकार करना ही परिपक्वता का संकेत है।
सुधार के लिए आपका संकेत सदा सिरोधार्य रहेगा।
✍️ देवाधिदेव की कृपा सब पे बनी रहे।🙏🏻



