चुनावी सीजन में नेताओं की भाषा कैसे-कैसे रंग दिखाती है!

खेतों में नहरों से पानी पहुंचाने के विषय पर सत्ताधारी मंत्री जी किसान में मतभेद…
अबकी चुनाव में भी नेताओं के वादों का कोई जवाब नहीं. 400-500 रुपये में सिलेंडर. भई,अभी ही पूछ लीजिए- खाली देंगे या भरा हुआ? किसान सम्मान निधि की राशि बढ़ाएंगे. चुनाव पश्चात वसूली का नोटिस पर इससे तो केवल निधि और उसके मम्मी-पापा को फायदा होगा ना, हम किसानों का क्या?
चुनावी सीजन है. वादों और दावों के बादल जहां-तहां उमड़-घुमड़ रहे हैं. बरसने वाले कम, आंखों को सुहाने वाले ज्यादा. आरोप-प्रत्यारोप के छींटों के बीच वार-पलटवार का गर्जन-तर्जन भी जारी है. इस चुनाव में भी नेताओं की बोली वैसी ही है, जैसी चुनावों के वक्त अक्सर हो जाया करती है. नेताओं की भाषा का स्तर कैसा है, जरा गहराई में उतरकर चेक कीजिए.नेताजी को भी हर तबके तक अपनी बात पहुंचानी थी, सो सीधा-सीधा मुंह खोल दिया. अंदर-बाहर एक कर दिया. पर्दा भी क्यों और किससे? पर्दा नहीं जब कोई खुदा से! खैर, तीर तेजी से निकल चुका था. तीर कमान से, बात जुबान से. बाद में महिलाओं ने कायदे से बताया कि शिक्षा केवल हमारे लिए ही नहीं, हमारे रहनुमाओं के लिए भी जरूरी है.
वादों की फटी झोली
वोटरों पर बेशुमार प्यार बरसाने के उदाहरण पिछले कुछ चुनावों में देखे जा चुके हैं. बताइए कितना दे दूं. इतने हजार करोड़, उतने हजार करोड़… पर कमाल है, इतनी दरियादिली, इसका भी विरोध! जब देने वाला दिल खोलकर दे ही रहा है, तो हमें क्या? ये क्या पूछना कि मामा के घर से लाया या ताऊ के घर से लाया.चाहे जहां से भी लाया.कल उसने दिया,आज हम भी देंगे. कल उसकी बारी,आज हमारी बारी…
आवास का अधिकार देंगे. हां, दे ही दीजिए. आप तो बरसों से देने को तैयार बैठे थे. जरूर हमारे बाप-दादों ने ही ये अधिकार लेने से इनकार किया होगा. जाति-जनगणना कराएंगे. कराइए. बाकी विश्व को भी जाति के हिसाब से अपना गुरु चुनने में सहूलियत रहेगी.
भाषा बहता नीर!
सुधी-सुजान लोग भाषा को ‘बहता नीर’ बताते हैं. माने भाषा हमेशा एक जैसी ठहरी नहीं होती. बहते पानी की तरह, समय के साथ बदलती रहती है. वक्त के मुताबिक खुद को ढालती रहती है. इस बात को आप सीधे-सीधे नेताओं की भाषा से जोड़कर भी समझ सकते हैं. वोट मांगते समय कुछ और. कुर्सी पाने के बाद कुछ और. कुर्सी न मिलने पर कुछ और. कहीं- कोई स्टैंड नहीं.
एक और खास बात…
पानी जितना नीचे की ओर बहता है, उसका बहाव उतना ही तेज होता है और नेताओं की भाषा का क्या? इन्हें तो और नीचे होकर बहना है.आखिर लहर जो पैदा करना है!
माण्ड नहर से खेतो में पानी पहुंचाने के विषय पर मंत्रीजी व जरूरतमंद किसान में मतभेद,भला बाथरूम के पानी से ज़रूरत मंद किसान का आवश्यकता पूरा होगा ?

घटनाक्रम और स्थान तों पूर्ण रूप से सत्य है परन्तु खबर तो 01अप्रैल के दोपहरी से पामगढ़ से निकल कर क्षेत्र के क़लमकारो के मध्य चर्चा में है किन्तु परन्तु मगर?
साहब सबूत के शौकिन जो है इसलिए घटनाक्रम को हमारी टीम भी प्रमाणित नहीं करता की घटनाक्रम सत्य ही है।
सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार खरसिया विधानसभा क्षेत्र के पामगढ़ के किसान उस समय अजीबो-गरीब स्थिति पैदा हो गई जब साहब से नेताजी ने यह सोचने को मजबूर कर दिया कि वह किसकी बात को मानें।
वाकया कुछ इस तरह हुआ कि मोबाइल में चर्चा के दौरान जिले हीं नहीं प्रदेश के पावरफुल मंत्री से उम्मीद लगाए सत्ताधारी दल के किसान ने यह पूछा डाला कि खेतों में खड़ी फसल के लिए पानी की जरूरत है। अधिकारियों को बोल दीजिएगा तों हम किसानों का फसल नुकसान होने से बच जाए,
इस पर सहज और सरल स्वभाव के धनी मंत्रीजी ने माण्ड के अधिकारियों को बोलने के बजाए,मोबाइल पर बात करने वाले अपने ही पार्टी के जरुरतमंद किसान को मंत्री जी नेक सलाह दे डालें… मेरे बाथरूम का पानी ले जाना और आपने खेत का सिंचाई कर लेना किसान अब करें तो क्या करें…?
सोशल मीडिया पर खुब हो रहा है वायरल…




