बाबरी मस्जिद फ़ैसले पर नरेंद्र मोदी और अमित शाह क्यों हैं मौन

30 सितंबर 2020 के जिस दिन बाबरी मस्जिद विध्वंस मामले में फ़ैसला आया, उस दिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी ट्विटर पर बधाई दी.
लेकिन उन्होंने ये बधाई दी वैज्ञानिकों और इंजीनियरों को, ब्रह्मोस सुपरसोनिक क्रूज़ मिसाइल के सफल परीक्षण के लिए.
प्रधानमंत्री ने ये ट्वीट करने के साथ-साथ, ठीक उसी समय पर
Participated in the Shree Somnath Trust meeting via video conferencing. We discussed a wide range of issues pertaining to the Temple, including the exceptional community service by the Trust during these times and harnessing of technology to enable more devotees to pray.
— Narendra Modi (@narendramodi) September 30, 2020
जिसमें उन्होंने जानकारी दी कि उन्होंने श्री सोमनाथ ट्रस्ट की बैठक में वीडियो कॉन्फ़्रेंसिंग के ज़रिए हिस्सा लिया और मंदिर से जुड़े व्यापक पहलुओं पर चर्चा की.
प्रधानमंत्री बाबरी फ़ैसले पर कुछ नहीं बोले.
अलबत्ता ये अलग बात है कि किसी अति-उत्साही शीतल भालोदिया नाम के यूज़र ने उनके ट्वीट के जवाब में गीता का यदा-यदा ही धर्मस्य वाले श्लोक के साथ उन राजनेताओं और धार्मिक नेताओं की तस्वीर चिपका दी, जिन्हें बाबरी मस्जिद विध्वंस मामले में बरी कर दिया गया है. प्रधानमंत्री का ट्वीट खोलते ही यही तस्वीर ज़्यादा ध्यान खींचती है.
प्रधानमंत्री मोदी की ही तरह गृह मंत्री अमित शाह ने भी ब्रह्मोस मिसाइल के परीक्षण के लिए बधाई दी, सोमनाथ ट्रस्ट पर प्रधानमंत्री के ट्वीट को रीट्वीट किया, और गांधीनगर के 100 कुम्हार परिवारों को बिजली से चलनेवाले चाक वितरण समारोह की तस्वीरें पोस्ट कीं.
बाबरी मस्जिद फ़ैसले पर वो ख़ुद भी मौन रहे.
कइयों के मन में शायद ये सवाल कौंध रहा होगा कि इस मौन का मतलब क्या है?
ये भी ख़याल आता होगा कि पिछले साल 9 नवंबर को राममंदिर पर आए फ़ैसले के समय भी क्या प्रधानमंत्री और गृह मंत्री ऐसे ही ख़ामोश थे?
इस दूसरे सवाल का जवाब तो स्पष्ट है. प्रधानमंत्री मोदी और गृह मंत्री शाह ने अयोध्या का फ़ैसला आने के बाद प्रतिक्रियाएँ दी थीं. प्रधानमंत्री ने न केवल ट्वीट किया था बल्कि टीवी पर देश को भी संबोधित किया था.
पीएम मोदी ने कहा था, “इस फ़ैसले को किसी की हार या जीते के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए. रामभक्ति हो या रहीमभक्ति, ये समय हम सभी के लिए भारतभक्ति की भावना को सशक्त करने का है. देशवासियों से मेरी अपील है कि शांति, सद्भाव और एकता बनाए रखें.”
गृह मंत्री अमित शाह ने भी तब ट्वीट किया था, “श्रीराम जन्मभूमि पर सर्वसम्मति से आए सर्वोच्च न्यायालय के फ़ैसले का मैं स्वागत करता हूँ. मैं सभी समुदायों और धर्म के लोगों से अपील करता हूँ कि हम इस निर्णय को सहजता से स्वीकारते हुए शांति और सौहार्द से परिपूर्ण ‘एक भारत-श्रेष्ठ भारत’ के अपने संकल्प के प्रति कटिबद्ध रहें.”
बाबरी मस्जिद विध्वंस फ़ैसले पर चुप्पी क्यों?
चुप्पी क्यों – राजनीतिक विश्लेषक इस सवाल में कोई उलझन नहीं देखते, उन्हें लगता है कि प्रधानमंत्री और गृह मंत्री ने एक सोची-समझी रणनीति की वजह से चुप्पी साध रखी है.
उसमें पहली वजह तो ये है कि 30 सितंबर को आए फ़ैसले को अंतिम फ़ैसला नहीं कहा जा सकता, क्योंकि इसमें अपील की गुंज़ाइश बची है.
विश्लेषक साथ ही ध्यान दिलाते हैं कि बाबरी मस्जिद विध्वंस का मामला अयोध्या के मामले से अलग था.
वरिष्ठ पत्रकार रशीद किदवई कहते हैं, “अयोध्या का मुद्दा शुरू से ही राजनीतिक था, उसमें मंदिर बनने से, संविधान की कोई अड़चन नहीं थी, तो उसके ऊपर खुलकर बोला गया, ज़िम्मेदारी ली गई. लेकिन ये मामला एक आपराधिक कार्रवाई का था.”
वरिष्ठ पत्रकार प्रदीप सिंह भी कहते हैं कि बाबरी मामला एक आपराधिक मामला है, जबकि अयोध्या विवाद एक दीवानी मामला था, जहाँ तय करना था कि ज़मीन का मालिकाना हक़ किसे मिले.
उन्होंने कहा, “बाबरी विध्वंस मामला एक ढाँचे को गिराने को लेकर है, जिसके बारे में सुप्रीम कोर्ट ने भी कहा था कि ये ग़ैर-क़ानूनी था, तो प्रधानमंत्री सार्वजनिक रूप से ग़ैर-क़ानूनी काम का समर्थन कैसे कर सकते हैं?”
विश्लेषक साथ-साथ ये भी मानते हैं कि पिछले साल अयोध्या मामले में जो फ़ैसला आया, उसके बाद शायद कई लोगों को लगता है कि असल मामला तो सुलझ गया.
प्रदीप सिंह कहते हैं, “पिछले साल सुप्रीम कोर्ट का फ़ैसला आया और इस मुद्दे का अंत हो गया, इसपर और बयानबाज़ी कर वो इस मुद्दे को शायद और जीवित नहीं करना चाहते.”
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आडवाणी पर भी चुप्पी
आडवाणी
बाबरी मस्जिद विध्वंस मामला पिछले 28 सालों से अभियुक्तों पर एक गहरे साए की तरह लिपटा हुआ था, इसमें भारतीय जनता पार्टी और संघ परिवार के कई दिग्गजों के नाम जुड़े थे. उनमें सबसे बड़ा नाम लालकृष्ण आडवाणी का है.
आडवाणी और दूसरे अन्य 31 अभियुक्तों को अदालत ने बरी कर दिया है, लेकिन इतने वरिष्ठ नेताओं को मिली इस राहत पर भी वैसी उत्साहित प्रतिक्रिया नहीं दिखी. मोदी सरकार के मंत्री रविशंकर प्रसाद ज़रूर उनके घर गए और पार्टी के वरिष्ठ नेता और केंद्रीय रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने फ़ैसले का स्वागत किया और कहा कि देर से ही सही लेकिन न्याय की जीत हुई है.
लेकिन प्रधानमंत्री और गृह मंत्री ने अपनी पार्टी के वरिष्ठतम नेताओं के बारे में कुछ नहीं कहा. विश्लेषक बताते हैं कि इसके पीछे भी कारण स्पष्ट हैं और ऐसा सोच-समझकर किया जा रहा है.
रशीद किदवई कहते हैं, “उन्हें पता है कि उनके जो मूल मतदाता हैं उसमें इसे लेकर कोई बेचैनी नहीं है, पता है कि जो राजनीतिक मिशन था, जो राममंदिर की परिकल्पना थी वो तो पूरी हो गई, तो अब उनके जो समर्थक हैं, उन्हें कोई अपेक्षा भी नहीं है कि वो आडवाणी जी को लेकर कुछ कहें या प्रतिक्रिया दें, जब आडवाणी जी को स्पीकर से लेकर राष्ट्रपति तक के पद दिए जा सकते थे, तो जब हर जगह उनको दरकिनार किया गया और उस समय भाजपा के भीतर भी कोई आवाज़ नहीं उठी, तो अब इस मामले का कोई महत्व ही नहीं लगता.”
प्रदीप सिंह कहते हैं, “आडवाणी जी की स्थिति जिन्ना पर दिए गए बयान के बाद ही कमज़ोर हो चुकी थी. 2009 में ज़रूर उनको प्रधानमंत्री के रूप में पेश किया गया, लेकिन उसके बाद वो साल-दर-साल हाशिए पर चले जाते रहे. अभी की जो सक्रिय राजनीति है, उसमें वो प्रासंगिक भी नहीं रह गए हैं.”
राहुल गांधी की चुप्पी
बाबरी मस्जिद मामले में फ़ैसले के बाद प्रधानमंत्री मोदी और गृह मंत्री अमित शाह ने तो चुप्पी रखी ही, कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष और पार्टी के सबसे प्रभावशाली नेता राहुल गांधी भी ख़ामोश रहे. हालाँकि, कांग्रेस पार्टी ने ज़रूर फ़ैसले की आलोचना की.
पार्टी प्रवक्ता रणदीप सुरजेवाला ने फ़ैसला आने के बाद कहा, “संविधान, सामाजिक सौहार्द्र में विश्वास करने वाला हर व्यक्ति उम्मीद करता है बाबरी मामले पर विशेष अदालत के इस तर्कहीन निर्णय के विरुद्ध प्रांत व केंद्र सरकारें उच्च अदालत में अपील दायर करेंगी व बग़ैर पक्षपात या पूर्वाग्रह देश के संविधान व क़ानून का अनुपालन करेंगी.”
लेकिन राहुल गांधी बाबरी मस्जिद के फ़ैसले पर चुप रहे, जबकि अयोध्या फ़ैसले के बाद उन्होंने लिखा था, “सुप्रीम कोर्ट ने अयोध्या मुद्दे पर अपना फ़ैसला सुना दिया है. कोर्ट के इस फ़ैसले का सम्मान करते हुए हम सब को आपसी सद्भाव बनाए रखना है. ये वक़्त हम सभी भारतीयों के बीच बंधुत्व, विश्वास और प्रेम का है.”
तो क्या राहुल गांधी भी कुछ ख़ास वजह से मौन हैं?
वरिष्ठ पत्रकार प्रदीप सिंह कहते हैं कि कांग्रेस की ये समस्या रही है कि वो समर्थन करे तो कितना करे, विरोध करे तो कहाँ तक जाए.
वो कहते हैं, “ये जो दो नावों पर सवारी की कांग्रेस ने, उसका बड़ा लंबा और बड़ा राजनीतिक नुक़सान उठाया है कांग्रेस ने. तो अगर वो कहते हैं कि ग़लत हुआ, तो अदालत के ख़िलाफ़ बोलते हैं, अगर कहते हैं कि सही हुआ तो संघ और बीजेपी के साथ खड़े नज़र आते हैं.”
वरिष्ठ पत्रकार रशीद किदवई भी मानते हैं कि उनकी चुप्पी सोची-समझी है क्योंकि उनको भी पता है कि ये तो पार्ट बी था, पार्ट वन तो आ चुका जब राममंदिर का फ़ैसला आया, और राहुल गांधी और कांग्रेस ने उसका स्वागत किया.
रशीद किदवई कहते हैं,” दरअसल राहुल गांधी कुछ बोलेंगे तो फिर पिटारा खुल जाएगा, कि नरसिम्हा राव ने क्या किया, 10 साल यूपीए ने क्या किया, तो वो तमाम चीज़ें उल्टी पड़ सकती हैं, अभी थोड़ी बहुत निंदा होगी कि राहुल गांधी नहीं बोले, लेकिन वो चाहेंगे कि सौ में से दस प्रतिशत नुक़सान हो, बजाय कि सौ में से अस्सी फ़ीसद नुक़सान हो.”




