विविध खबरें

समाज में पुरुषों की भावनाओं को लेकर उठी आवाज़: “मजबूती का मतलब भावनाओं का दमन नहीं”

होली के बहाने एक विचार

पहले बात कर लेते हैं,होली का त्यौहार रंगों का पर्व है,जो खुशियों और उल्लास का प्रतीक माना जाता है। लेकिन क्या हमने कभी सोचा है कि इस पर्व के पीछे कितनी गंभीर सच्चाइयाँ भी छुपी होती हैं?

रंगों के पीछे का दर्द अक्सर अनदेखा

रंगों में घुली खुशियाँ तो सबको नजर आती हैं, पर इन रंगों के पीछे का दर्द अक्सर अनदेखा रह जाता है। सोचिए, उन मजदूरों के बारे में जो दिन-रात मेहनत करके ये रंग तैयार करते हैं। उनकी हथेलियों पर रासायनिक रंगों का दाग और उनकी सेहत पर इसका असर शायद ही कोई देखता है।

इसके अलावा,होली के नाम पर जल और पर्यावरण की जो हानि होती है, वह भी चिंतनीय है। लाखों लीटर पानी व्यर्थ बहा दिया जाता है। क्या हम इतने लापरवाह हो गए हैं कि अपने आनंद के लिए प्राकृतिक संसाधनों को नष्ट कर दें?

नशे और हुड़दंग का दौर

और फिर आता है नशे और हुड़दंग का दौर। होली के नाम पर शराब और भांग का सेवन कर लोग अपनी सीमाओं को पार कर जाते हैं। इससे दुर्घटनाएँ होती हैं और रिश्तों में खटास भी पैदा होती है। क्या यही होली का असली मकसद है?

होली का मतलब है बुराई पर अच्छाई की जीत,रंगों के माध्यम से प्रेम और भाईचारे का प्रसार। लेकिन जब इन रंगों में विष घुल जाए और खुशियों में स्वार्थ समा जाए,तो हमें जरा रुककर विचार करना चाहिए।

इस होली पर संकल्प लें कि रंगों का त्यौहार केवल रंगों तक ही सीमित न हो। इसे मानवता और पर्यावरण की सुरक्षा का संदेश भी बनाएँ।

सोचिएगा,होली का असली रंग क्या है—खुशियाँ या खुदगर्जी?

आज के आधुनिक युग में जहाँ महिलाएं अपनी भावनाओं और अधिकारों के लिए मुखर हो रही हैं,वहीं पुरुषों की भावनाओं पर समाज का ध्यान कम ही जाता है। आम धारणा है कि पुरुष हमेशा मजबूत और कठोर बने रहें। लेकिन क्या सच में मजबूत होने का अर्थ भावनाओं का दमन है?

भावनाओं के बोझ तले दबे पुरुष

पुरुष समाज में अक्सर एक जिम्मेदार पुत्र, पति और पिता की भूमिका निभाते हुए खुद की भावनाओं को पीछे छोड़ देते हैं। बचपन से ही उन्हें सिखाया जाता है कि “मर्द बनो, मजबूत रहो।” इस सीख ने उनकी भावनाओं को अभिव्यक्त करने की स्वतंत्रता को छीन लिया है।

कोई मायका नहीं,कोई सहारा नहीं

पुरुषों के पास न तो कोई ऐसा मायका होता है जहाँ वे निःसंकोच लौट सकें,न ही कोई गोद जहाँ सिर रखकर सिसक सकें। जब मन भारी होता है,तो उन्हें अपनी भावनाओं को खुद में ही समेटना पड़ता है। समाज यह मानकर चलता है कि रोना केवल उनके हक़ में जिनका हाल ही में विशेष दिवस मनाएं है हम सभी।

समाज की सोच में बदलाव की आवश्यकता

विशेषज्ञों का मानना है कि समाज को यह समझने की आवश्यकता है कि पुरुष भी इंसान होते हैं और उनकी भी भावनाएं होती हैं। उन्हें भी कभी-कभी प्यार भरी थपकी और सहानुभूति की जरूरत होती है।

परिवर्तन की ओर कदम

समाजशास्त्रियों का कहना है कि शिक्षा और सामाजिक परिवेश में बदलाव लाकर पुरुषों को भी अपनी भावनाओं को अभिव्यक्त करने का अवसर देना चाहिए। सिर्फ मजबूत दिखने की अपेक्षा के बजाय उन्हें भी दिल की बातें कहने का हक़ मिलना चाहिए।

समान अधिकार मिलें

समाज को चाहिए कि वह पुरुषों की मजबूती को उनकी भावनाओं का दमन न समझे। उन्हें भी भावनाओं को जीने और व्यक्त करने का समान अधिकार मिले,ताकि वे भी बोझमुक्त स्वछंद जीवन जी सकें।

Show More

Gopal Krishna Naik

Editor in Chief Naik News Agency Group

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button
error: Content is protected !!