सेवाभावी गुरुजनों का बढ़ाएं हौसला

आज 5 सितंबर है, देश के पूर्व राष्ट्रपति डॉक्टर सर्वपल्ली राधाकृष्णन जी का जन्मदिन जिसे हम सभी शिक्षक दिवस के रूप में मनाते हैं। आज के दिन राष्ट्र के भविष्य निर्माता शिक्षकों को सम्मानित करने की परंपरा है और अब तक हम ऐसा ही करते आये हैं।

इस वर्ष वैश्विक महामारी की वजह से सबसे अधिक नुकसान विद्यार्थियों को हुआ है क्योंकि पिछले कई महीनों से स्कूलों के पट बंद हैं जिससे अध्ययन-अध्यापन कार्य पूरी तरीके से प्रभावित हुआ है मगर संकट के इस दौर में शासन के मंशानुरूप शिक्षक/शिक्षिकाओं ने एक बार फिर यह साबित कर दिया कि भले ही परिस्थिति विपरीत ही क्यों ना हो पर विद्या दान की परिपाटी कभी खत्म नहीं हो सकती। इस दौरान शिक्षकगण ऑन लाईन, ऑफ लाईन तथा अन्य माध्यमों से लगातार बच्चों को पढ़ा रहे हैं जो काबिले तारीफ है और ऐसा करके खासकर सरकारी विद्यालयों के शिक्षक/शिक्षिकाओं ने उन लोगों का मुँह बन्द कर दिया है जो यह कहते नहीं थकते थे कि सरकारी शिक्षक ईमानदारी से पढ़ाते नहीं हैं, स्कूल आकर टाइम पास करके वापस चले जाते हैं। अब ऐसे लोगों को समझ आ गया होगा कि आखिर में सरकारी स्कूल और वहाँ के शिक्षक/शिक्षिका ही काम आते हैं जो हर स्थिति में पूरी ईमानदारी से अपने कर्तव्यों का पालन करना जानते हैं। वर्तमान में एक तरफ संक्रमण के डर से जहां लोग एक दूसरे से मिलने से भी कतरा रहे हैं तो वहीं दूसरी तरफ ऐसे सेवाभावी गुरुजन अपना और अपने परिवार की परवाह किये बगैर बच्चों के भविष्य की चिंता करते हुए लगातार अध्यापन करा रहे हैं।

ऐसा नहीं है कि पहले ऑन लाईन पढ़ाई नहीं होती थी पर पहले और अब की स्थिति में जमीन आसमान का अंतर है। पहले शिक्षक चाहे वे निजी विद्यालय के हों या सरकारी विद्यालय के हों, वे स्कूल में स्थित सर्वसुविधायुक्त डिजिटल क्लास से ऑन लाईन पढ़ाया करते थे पर आज सभी शिक्षकों के घरों में डिजिटल क्लास रूम बन गए हैं बस फर्क इतना है कि यहां सुविधाओं का अभाव है। ना तो उनके पास प्रोजेक्टर है, ना साउंड सिस्टम है, ना व्हाइट बोर्ड है और यहां तक कि अधिकांश शिक्षक/शिक्षिकाओं के पास तो मोबाईल का स्टैंड भी नहीं है। वे पूरी तरह से जुगाड़ टेक्नोलॉजी के भरोसे पढ़ा रहे हैं।
खासकर ग्रामीण क्षेत्र के शिक्षक/शिक्षिकाओं को भारी परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है क्योंकि संसाधनों के अभाव के अलावा उन्हें नेटवर्क की समस्या से भी दो-चार होना पड़ रहा है परंतु इसके बावजूद भी वे पूरी ईमानदारी से अपने कर्तव्यों का पालन कर प्रतिदिन 2 से 3 क्लास ले रहे हैं।
आज अगर आप किसी शिक्षक/शिक्षिका के घर पहुंच जाओ तो आपको एक कमरे में दीवाल पर अस्थायी ब्लेक बोर्ड बना दिख जाएगा जिसे पेंट से पोताई करके बनाया गया होता है। इसी प्रकार मोबाईल स्टैंड के अभाव में कोई रस्सी की सहायता से तो कोई लड़की का स्टैंड बनाकर रखे हुए हैं। कोई तो कुर्सी के ऊपर किताब रखकर उसमें अपना मोबाइल टिकाकर पढा रहा होता है तो किसी शिक्षक/शिक्षिका के परिजन सामने मोबाइल लेकर वीडियो बना रहे होते हैं।
इसमें सबसे ज्यादा परेशानी उन वरिष्ठ शिक्षकों को हो रही है जो अब तक बमुश्किल बटन वाला मोबाइल उपयोग कर रहे थे जिन्हें मैसेज देखने के लिए भी दूसरों का सहारा लेना पड़ता था पर आज वे भी सेवानिवृति के करीब पहुंचकर भी किसी न किसी से सीखकर एंड्राइड मोबाइल चलाना सीखकर उसके माध्यम से कई दौर के कठिन प्रक्रिया से गुजरते हुए बकायदा क्लास जनरेट कर ऑन लाईन क्लास ले रहे हैं।
कुल मिलाकर सभी शिक्षकगण इस संकट के दौर में संसाधनों का अभाव होते हुए भी जैसे-तैसे करके अपने कर्तव्यों का पालन पूरी ईमानदारी से करते हुए विद्यार्थियों को शिक्षा प्रदान करने का सराहनीय और पुनीत कार्य कर रहे हैं और इसके लिए वे निश्चित रूप से साधुवाद के पात्र हैं। शिक्षक/शिक्षिकाओं ने यह साबित कर दिया है कि वे असली मायने में राष्ट्र निर्माता हैं और बच्चों का भविष्य संवारने के लिए वे हमेशा प्रयासरत रहते हैं।
आज शिक्षक दिवस के अवसर पर हम ऐसे सभी सेवाभावी गुरुजनों का मनोबल बढ़ाकर, उन्हें प्रोत्साहित कर, हौसला अफजाई कर उनका दिल से सम्मान करें जो संकट के इस बुरे दौर में दिन-रात मेहनत कर शिक्षा का अलख जगा रहे हैं। इस वजह से एक ओर जहां अनेक शिक्षक/शिक्षिका खुद भी संक्रमित हो गए वहीं कुछ ने तो अपने प्राणों का बलिदान तक दे दिया। अपनी परवाह ना कर बच्चों के भविष्य की चिंता करने वाले वे सभी गुरुजन सम्मान के हकदार भी हैं क्योंकि उनके द्वारा किया जा रहा प्रयास सराहनीय और वंदनीय तो है ही साथ ही यह बच्चों के लिए काफी कारगर भी साबित होगा।
प्रवीण चतुर्वेदी
खरसिया (छत्तीसगढ़)




