मादा बया को रिझाने के लिए पांच सौ से 1000 बार उड़कर सुंदर घोसला बनाता है नर बया

मादा बया को रिझाने के लिए पांच सौ बार उड़कर सुंदर घोसला बनाता है नर बया

वह अपना घोंसला बनाता है तो घर बसाने के लिए, मगर कुछ दिन तक ही उसमें रह पाता है। हालांकि इस दौरान संघर्ष की लंबी दास्तां छोड़ जाता है। सुंदर-से दिखने वाले बया पक्षी को अपने आंगन में घोंसले के लिए पांच सौ बार उड़ान भरनी पड़ती है। इस काम में उसे कई घंटे से कई दिन लग जाते हैं अपने घोंसले के लिए उपयुक्त घास के उपलब्धता के कारण। पेड़ से बार-बार उड़कर घास और पत्तियों को चुनकर लाता है और चोंच से तिनकों और लंबी घास को बुनकर सुंदर घोंसले का निर्माण करता है।

नर पक्षी मादा को रिझाने के लिए सुंदर घोंसला बनाता है। मादा घोंसले का पहले निरीक्षण करती है और जो घोंसला उसे पसंद आता है, उसके नर के साथ ही जोड़ी बनाती है। अभी इस पक्षी का प्रजनन काल चल रहा है। बया पक्षी जून से जुलाई माह के बीच सिर्फ एक बार कांटेदार बबूल, ताड़, खजूर या नारियल के पेड़ पर घोंसला बनाता है, परन्तु हमारे आंगन के आंवला और बेल के पेड़ों मे संपेरे के बीन के आकार का दिखता है।
पेड़ पर रस्सी की तरह लटका रहता है और इतना मजबूत होता है कि तेज आंधी में भी डाली से नीचे नहीं गिरता।
प्रजननकाल में बदल जाता है रंग

नर बया का प्रजनन काल में सिर और छाती पीले रंग का होता है। मादा बया का रंग भूरा होता है। अन्य दिनों में नर और मादा का रंग भूरा ही होता है और गौरैया पक्षी की तरह दिखता है, लेकिन इसका चोंच मोटा होता है। पिछले साल की तुलना में इस बार बया पक्षियों ने भागलपुर में तीन गुना घोंसले बनाए हैं। एक पेड़ पर 15-20 घोंसले हैं। यह पक्षी समूह में रहना पसंद करता है। एशिया और अफ्रीका महाद्धीप के अलावा देश के विभिन्न जगहों पर पाया जाता है।

संघर्ष करने की प्रेरणा देता है बया पक्षी
बया पक्षी संघर्ष करने की प्रेरणा देता है। एक-एक पत्ती को लाने के लिए काफी मेहनत करता है। इंसानों के लिए यह पक्षी प्रेरणा का काम करता है। हिम्मत, लगन व ईमानदारी से कार्य करने पर एक दिन सफलता अवश्य मिलती है।
विज्ञान के युग में कितना यक़ीन किया जा सकता कहावत तों कहावत है …
गांव के बड़े बुढ़े कहते है कि घोंसले को विधि विधान से पूजा कर सही जानकार के द्वारा साटिका से लेकर विभिन्न औषधियों से तंत्र-मंत्र के काम आते है जिस घर पर इनका वास होता है वहां किसी प्रकार के नकारात्मक ऊर्जा नही रहता और न ही तंत्र-मात्र का प्रभाव होता है।




