अधूरी कहानियाँ और यादों की चुप नदी…

ज़रूरी नहीं कि हर कहानी का सुखद अंत हो,
कुछ कहानियाँ बस दर्द के साथ खत्म होती हैं,
और यादों के साथ जीती जाती हैं।
कभी-कभी ज़िंदगी की किताब में कुछ पन्ने ऐसे होते हैं, जो अधूरे रह जाते हैं — न अंत मिलता है, न शुरुआत समझ आती है। कुछ रिश्ते, कुछ मुलाक़ातें, कुछ बातें… वो पूरी नहीं होतीं,मगर फिर भी दिल के किसी कोने में हमेशा ज़िंदा रहती हैं।

मेरे जीवन में भी एक ऐसी ही कहानी है। वो कोई प्रेम कहानी नहीं थी, न ही कोई फ़िल्मी किस्सा — बस एक सच्चा एहसास था,जो वक़्त की धूल में कहीं खो गया। हम दोनों ने एक-दूसरे को शायद कभी ‘मैं तुम्हारा हूँ’ कहकर नहीं जताया, लेकिन हमारी खामोशियाँ बहुत कुछ कहती थीं।
वो हँसी,वो किताबों के पन्नों में छुपे खत,वो अधूरी कॉफ़ी और वो स्टेशन पर बिना अलविदा के चला जाना — सब कुछ आज भी वैसा ही ताज़ा है, जैसे कल की ही बात हो। पर अफ़सोस, कुछ किस्से कहानियाँ नहीं बनते,बस यादों में ठहर जाते हैं…
कुछ अधूरे सवाल
हम अक्सर सोचते हैं — “क्या होता अगर…?”
क्या होता अगर हमने कुछ और वक्त साथ बिताया होता?
क्या होता अगर वो आख़िरी बार रुक जाता?
क्या होता अगर हमने डर को हरा दिया होता?
इन सवालों के जवाब कभी नहीं मिलते। और शायद यही अधूरेपन की खूबसूरती है — वो हमें पूरी कहानी कभी नहीं देते,बस एक एहसास छोड़ जाते हैं जो ज़िंदगी भर हमारे साथ चलता है।
यादों की चुप नदी
अब जब शाम होती है, और अकेलापन कमरे की दीवारों से उतरकर मेरी साँसों में घुलता है, तो वो टीस फिर से जागती है। उसकी यादें एक धीमी नदी की तरह बहती हैं — शांत, मगर भीतर से गहरी और बेचैन।

ना वो लौटते हैं,ना हम भूल पाते हैं।
बस एक मुस्कान ओढ़कर आगे बढ़ते रहते हैं,
क्योंकि ज़िंदगी ठहरी नहीं रहती किसी एक मोड़ पर।
अंत नहीं,एक स्वीकार
आज मैं उस अधूरी कहानी को कोई अंत नहीं देना चाहता। मैं उसे वैसे ही रहने देना चाहता हूँ — अधूरा, मगर सच्चा। क्योंकि शायद कुछ रिश्ते इसीलिए होते हैं, ताकि हमें सिखा सकें कि हर प्यार को नाम देना ज़रूरी नहीं, और हर कहानी को मुकाम।

अगर आपने कभी किसी को खोया है बिना कहे,
अगर कोई आपकी यादों में आज भी ज़िंदा है,
तो आप भी उस कहानी का हिस्सा हैं,
जो अधूरी रहकर भी पूरी लगती है।

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