खरसियाछत्तीसगढ़

मानसून की राह ताकते खेत, आसमान पर टिकी किसानों की उम्मीदें

खरसिया।धरती की दरारों में इस समय केवल सूखे की रेखाएं नहीं हैं, बल्कि हजारों किसानों की प्रतीक्षा भी दर्ज है। हर वर्ष जून का मध्य आते-आते खेतों में हल की आवाज सुनाई देने लगती है, बैलों के कदमों से मिट्टी महकने लगती है और किसानों की आंखों में नए मौसम के सपने आकार लेने लगते हैं। लेकिन इस बार खरसिया अंचल सहित पूरे रायगढ़ जिले में मानसून की धीमी चाल ने खेती-किसानी की रफ्तार को थाम दिया है।

आमतौर पर 15 जून तक सक्रिय होने वाला मानसून इस वर्ष अब तक अपेक्षित रूप में नहीं पहुंच पाया है। प्री-मानसून की बारिश भी किसानों को राहत नहीं दे सकी। नतीजतन खेतों में नमी का अभाव है और जुताई, बियासी तथा धान की नर्सरी तैयार करने जैसे महत्वपूर्ण कार्य पिछड़ते जा रहे हैं।

खेत तैयार, लेकिन बादलों का इंतजार

खरसिया का किसान केवल खेती नहीं करता, वह मौसम के साथ अपना भविष्य भी बोता है। गांवों में किसान ट्रैक्टरों की मरम्मत करा चुके हैं, बीज घरों तक पहुंच चुके हैं, खाद समितियों में उपलब्ध है, लेकिन खेतों में पहली जुताई के लिए जिस बारिश की आवश्यकता है, वह अब तक नहीं हुई।

कई किसानों का कहना है कि बिना पर्याप्त नमी के जुताई करना अतिरिक्त खर्च और जोखिम दोनों है। यदि समय से बारिश नहीं हुई तो नर्सरी तैयार करने और रोपाई के पारंपरिक चक्र पर भी असर पड़ सकता है। यही कारण है कि किसान आसमान की ओर बार-बार निगाहें उठा रहे हैं।

धान की खेती पर बढ़ती चिंता

छत्तीसगढ़ को धान का कटोरा कहा जाता है और खरसिया क्षेत्र इसकी महत्वपूर्ण कृषि पट्टी में शामिल है। यहां अधिकांश किसान वर्षा आधारित खेती पर निर्भर हैं। सिंचाई सुविधाएं सीमित होने के कारण मानसून की प्रत्येक बूंद सीधे किसानों की आर्थिक स्थिति से जुड़ जाती है।

धान की खेती केवल एक फसल नहीं, बल्कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था की धुरी है। बीज विक्रेता से लेकर कृषि मजदूर तक, सभी की आजीविका खरीफ सीजन की सफलता पर निर्भर करती है। ऐसे में मानसून में विलंब केवल कृषि संकट नहीं, बल्कि ग्रामीण आर्थिक गतिविधियों की गति धीमी होने का संकेत भी है।

राहत की तैयारी, लेकिन बारिश सबसे बड़ा सहारा

सरकार ने खरीफ सीजन के लिए ऋण, खाद और बीज की उपलब्धता सुनिश्चित करने के प्रयास किए हैं। समितियों में उर्वरकों का भंडारण और बीज वितरण जारी है। कृषि विशेषज्ञ भी किसानों को पर्याप्त वर्षा के बाद ही बुआई और रोपाई शुरू करने की सलाह दे रहे हैं।

लेकिन ग्रामीण भारत का सबसे बड़ा सच यह है कि योजनाएं, ऋण और संसाधन अपनी जगह हैं, फिर भी किसान की असली पूंजी समय पर होने वाली बारिश ही है। जब तक बादल खेतों पर मेहरबान नहीं होंगे, तब तक तैयारियां केवल कागजों और गोदामों तक सीमित रहेंगी।

उम्मीद अभी बाकी है

मौसम वैज्ञानिकों का अनुमान है कि आने वाले दिनों में मानसून सक्रिय हो सकता है। यदि जल्द अच्छी बारिश होती है तो किसान तेजी से खेतों की तैयारी कर खरीफ सीजन को पटरी पर ला सकते हैं। अभी स्थिति चिंताजनक अवश्य है, लेकिन संकटपूर्ण नहीं।

फिर भी खरसिया के गांवों में इन दिनों एक ही चर्चा सुनाई देती है—”बस एक अच्छी बारिश हो जाए।”

क्योंकि किसान जानता है कि उसकी मेहनत, उसकी उम्मीदें और उसके परिवार का भविष्य अंततः उसी बारिश की बूंदों से जुड़ा है, जो सूखी धरती को जीवन देती हैं। खेत अभी शांत हैं, लेकिन इस सन्नाटे के भीतर हजारों किसानों की प्रार्थनाएं गूंज रही हैं। आसमान से बरसने वाली पहली फुहार केवल मिट्टी को नहीं भिगोएगी, बल्कि खरसिया अंचल के किसानों के चेहरों पर लौटती मुस्कान का कारण भी बनेगी।

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Gopal Krishna Naik

Editor in Chief Naik News Agency Group

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