
खरसिया।शिक्षा विभाग द्वारा आयोजित शासकीय कार्यक्रमों में पारदर्शिता और जनभागीदारी की बात तो बड़े मंचों से की जाती है, लेकिन खरसिया विकासखंड में जमीनी तस्वीर कुछ अलग नजर आ रही है। हाल ही में आयोजित शाला प्रवेश उत्सव सहित अनेक महत्वपूर्ण शासकीय कार्यक्रमों में स्थानीय मीडिया को सूचना और आमंत्रण से दूर रखे जाने को लेकर सवाल खड़े होने लगे हैं।
क्षेत्र में चर्चा का विषय यह है कि जब सांसद, विधायक, जनप्रतिनिधि और प्रशासनिक अधिकारी शासकीय मंच साझा करते हैं, तब उन कार्यक्रमों की जानकारी आम जनता तक पहुंचाने वाले स्थानीय पत्रकारों को आखिर क्यों नजरअंदाज किया जा रहा है? स्थानीय मीडिया से जुड़े लोगों का कहना है कि शिक्षा विभाग के कई कार्यक्रमों की जानकारी उन्हें कार्यक्रम संपन्न होने के बाद सोशल मीडिया अथवा अन्य माध्यमों से मिलती है।
विशेष रूप से खरसिया विकासखंड शिक्षा अधिकारी लक्ष्मी नारायण पटेल की कार्यप्रणाली को लेकर सवाल उठ रहे हैं। आरोप है कि शाला प्रवेश उत्सव जैसे महत्वपूर्ण शासकीय आयोजनों में भी मीडिया को समय पर सूचना उपलब्ध नहीं कराई जाती, जबकि ऐसे कार्यक्रमों का उद्देश्य शिक्षा के प्रति जनजागरूकता बढ़ाना और शासन की योजनाओं को लोगों तक पहुंचाना होता है।
स्थानीय पत्रकारों का तर्क है कि मीडिया केवल समाचार प्रकाशित करने का माध्यम नहीं, बल्कि शासन और जनता के बीच संवाद का महत्वपूर्ण सेतु है। यदि मीडिया को ही कार्यक्रमों से दूर रखा जाएगा, तो योजनाओं की वास्तविक जानकारी आम नागरिकों तक कैसे पहुंचेगी?
मामले का दूसरा पक्ष यह भी है कि यदि सूचना देने की कोई स्पष्ट व्यवस्था नहीं है तो शिक्षा विभाग को इसे सार्वजनिक करना चाहिए। वहीं यदि जानबूझकर चुनिंदा लोगों तक ही जानकारी सीमित रखी जा रही है, तो यह पारदर्शिता और जवाबदेही के सिद्धांतों पर प्रश्नचिह्न खड़ा करता है।
शिक्षा विभाग के कार्यक्रम सार्वजनिक धन और जनहित से जुड़े होते हैं। ऐसे में यह अपेक्षा स्वाभाविक है कि सभी मान्यता प्राप्त मीडिया संस्थानों को समान रूप से सूचना उपलब्ध कराई जाए। शाला प्रवेश उत्सव जैसे आयोजनों का उद्देश्य केवल मंचीय उपस्थिति नहीं, बल्कि शिक्षा के प्रति व्यापक जनसंदेश देना भी है।
अब स्थानीय पत्रकारों और सामाजिक संगठनों के बीच यह मांग उठने लगी है कि शिक्षा विभाग कार्यक्रमों की सूचना प्रसारित करने के लिए एक पारदर्शी और समान व्यवस्था विकसित करे, ताकि किसी भी मीडिया संस्थान के साथ भेदभाव की आशंका समाप्त हो सके।
प्रश्न अब भी कायम है— यदि शिक्षा विभाग वास्तव में जनभागीदारी चाहता है, तो जनसरोकारों की आवाज़ मानी जाने वाली मीडिया को कार्यक्रमों से दूर रखने की आवश्यकता आखिर क्यों पड़ रही है?

