
खरसिया। राष्ट्रीय राजमार्ग-49, जिसे क्षेत्र की आर्थिक धुरी और हजारों यात्रियों की जीवन रेखा माना जाता है, आज स्वयं अपनी बदहाली की कहानी बयां करता नजर आ रहा है। चपले बायंग -सेन्द्रीपाली चौक के पास सड़क किनारे सुरक्षा संरचना के नीचे का हिस्सा बुरी तरह धंस चुका है। कंक्रीट की परतें टूटकर हवा में लटकी हुई हैं और नीचे गहरी खाली जगह साफ दिखाई दे रही है। तस्वीर देखकर सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है कि यदि समय रहते मरम्मत नहीं हुई तो यह स्थान किसी बड़े हादसे का कारण बन सकता है।
विडंबना यह है कि जिस स्थान के आस-पास आरटीओ के जिम्मेदार अधिकारी कर्मचारी माह के प्रथम सप्ताह भर दिन-रात वाहनों की निगरानी और जांच का माहौल दिखाई देता है, वहीं कुछ कदम दूर सड़क की वास्तविक स्थिति प्रशासनिक प्राथमिकताओं पर प्रश्नचिन्ह खड़ा कर रही है। भारी वाहनों के दस्तावेजों की जांच जितनी आवश्यक है, उससे कहीं अधिक आवश्यक उन सड़कों की सुरक्षा सुनिश्चित करना है, जिन पर रोज हजारों लोग अपनी जान का भरोसा रखकर सफर करते हैं।

क्षेत्र के ग्रामीणों और नियमित यात्रियों को इस खतरनाक स्थिति की जानकारी है, इसलिए वे सावधानी बरत लेते हैं। लेकिन रायगढ़, बिलासपुर, रायपुर अथवा अन्य जिलों से गुजरने वाले अनजान वाहन चालकों के लिए यह स्थान किसी अदृश्य खतरे से कम नहीं। विशेषकर रात के समय, बारिश के मौसम में या तेज रफ्तार यातायात के बीच यह क्षतिग्रस्त हिस्सा दुर्घटना की आशंका को कई गुना बढ़ा देता है।
राष्ट्रीय राजमार्ग केवल कंक्रीट की पट्टी नहीं होते, वे क्षेत्र के विकास, व्यापार और जनजीवन की धड़कन होते हैं। जब उन्हीं धमनियों में दरारें पड़ने लगें और जिम्मेदार विभाग मौन साध ले, तब चिंता केवल सड़क की नहीं बल्कि व्यवस्था की भी होती है। प्रश्न यह है कि क्या किसी दुर्घटना के बाद ही मरम्मत की फाइलें खुलेंगी? क्या किसी परिवार के उजड़ने की कीमत पर ही खतरे को स्वीकार किया जाएगा?
क्षेत्रवासियों का कहना है कि संबंधित विभाग को तत्काल निरीक्षण कर क्षतिग्रस्त हिस्से की मरम्मत करानी चाहिए तथा वहां चेतावनी संकेतक और सुरक्षा बैरिकेड लगाए जाने चाहिए। क्योंकि प्रशासनिक संवेदनशीलता की सबसे बड़ी पहचान दुर्घटना के बाद कार्यवाही नहीं, बल्कि दुर्घटना से पहले रोकथाम होती है।
फिलहाल क्षेत्र के लोग एक-दूसरे को चेतावनी दे रहे हैं—”एनएच-49 से गुजर रहे हैं तो सावधान रहिए, सड़क की यह दरार केवल जमीन में नहीं, जिम्मेदार व्यवस्था की जवाबदेही में भी दिखाई दे रही है।”
“खरसिया है मेरी जान” कहने वाले इस अंचल के लोगों को सुरक्षित सड़कें भी मिलनी चाहिए। विकास की तस्वीर केवल बड़े वाहनों की आवाजाही से नहीं, बल्कि उन मार्गों की मजबूती से बनती है जिन पर आम नागरिक निश्चिंत होकर सफर कर सके। आज आवश्यकता निरीक्षण की नहीं, तत्काल सुधारात्मक कार्यवाही की है।



