
आस्था,विकास और पर्यावरण के बीच उलझा सवाल
क्षेत्र में केलो नदी और मांड नदी के संरक्षण को लेकर लंबे समय से आवाज उठाने वाले शिव राजपूत के शिवलोक गमन के बाद अब यह सवाल उभरने लगा है कि इन नदियों की चिंता आगे कौन करेगा? स्थानीय स्तर पर उन्हें नदी संरक्षण और पर्यावरणीय मुद्दों को लगातार उठाने वाले व्यक्ति के रूप में याद किया जा रहा है।

केलो और मांड नदी केवल जलधाराएँ नहीं, बल्कि इस पूरे क्षेत्र की जीवनरेखा मानी जाती हैं। खेती, पेयजल और स्थानीय पर्यावरण का संतुलन काफी हद तक इन्हीं नदियों पर निर्भर करता है। बीते वर्षों में रेत उत्खनन, अतिक्रमण और प्रदूषण के कारण इन नदियों के अस्तित्व पर लगातार सवाल उठते रहे हैं।
इन्हीं मुद्दों को लेकर शिवलोक वासी केलो कपूत शिव राजपूत अक्सर सार्वजनिक मंचों और सामाजिक गतिविधियों में आवाज उठाते रहे। नदी की धारा,तटों की सुरक्षा और पर्यावरण संरक्षण को लेकर उनकी चिंता कई लोगों के लिए प्रेरणा का कारण बनी।

खरसिया क्षेत्र की जीवनरेखा मानी जाने वाली माण्ड नदी इन दिनों अपने अस्तित्व के संकट से जूझ रही है। अवैध उत्खनन, प्रदूषण, अतिक्रमण और अनियोजित विकास के दबाव ने नदी की प्राकृतिक धारा को कमजोर कर दिया है। विडंबना यह है कि जिस समाज में नदियों को देवी का दर्जा दिया जाता है, वहीं उसी समाज की गतिविधियाँ नदी के अस्तित्व पर प्रश्नचिह्न खड़े कर रही हैं। स्थानीय स्तर पर यह व्यंग्यात्मक टिप्पणी अब आम सुनाई देने लगी है—“भगवान को खुश रखना है तो माण्ड नदी जिंदा रखो।”
हमारी सांस्कृतिक परंपरा में नदियों को केवल जल स्रोत नहीं,बल्कि आस्था और सभ्यता का आधार माना गया है।गंगा,नर्मदा,गोदावरी या महानदी की तरह क्षेत्रीय नदियाँ भी स्थानीय समाज की आर्थिक और सामाजिक संरचना को पोषित करती हैं। माण्ड नदी भी लंबे समय से आस-पास के गांवों की कृषि, जलापूर्ति और पारिस्थितिकी का आधार रही है।
लेकिन पिछले कुछ वर्षों में नदी की स्थिति लगातार कमजोर होती गई। नदी तटों पर बढ़ते अतिक्रमण,रेत खनन और औद्योगिक घरानों अपशिष्ट के अनियंत्रित प्रवाह ने इसके प्राकृतिक संतुलन को प्रभावित किया है। कई स्थानों पर नदी की धारा सिकुड़ती दिखाई देती है और गर्मियों में इसका जलस्तर चिंताजनक रूप से कम हो जाता है।
“भगवान को खुश रखना है तो माण्ड नदी जिंदा रखो”—यह वाक्य केवल भावनात्मक अपील नहीं,बल्कि समाज और व्यवस्था दोनों पर एक तीखा व्यंग्य भी है।
मंदिरों में पूजा,आरती और बड़े धार्मिक आयोजनों के बीच यह सवाल उठता है कि क्या प्रकृति की रक्षा भी उसी आस्था का हिस्सा है? यदि नदियाँ ही सूख जाएँगी तो पूजा में चढ़ाया जाने वाला जल कहाँ से आएगा?
व्यंग्य यही संकेत देता है कि आस्था केवल अनुष्ठानों से नहीं,बल्कि प्रकृति के संरक्षण से भी सिद्ध होती है।
पर्यावरण और अर्थव्यवस्था पर प्रभाव
नदी के कमजोर होने का प्रभाव केवल पर्यावरण तक सीमित नहीं रहता। इससे कृषि उत्पादन,भू-जल स्तर और स्थानीय आजीविका पर भी असर पड़ता है। माण्ड नदी के किनारे बसे गांवों में किसानों के लिए सिंचाई के विकल्प सीमित होते जा रहे हैं।
विशेषज्ञों के अनुसार यदि नदी का प्राकृतिक प्रवाह बाधित होता रहा तो क्षेत्र में जल संकट और मिट्टी की उर्वरता पर भी दीर्घकालिक असर पड़ सकता है।
प्रशासन और समाज की भूमिका
नदी संरक्षण केवल सरकारी योजनाओं से संभव नहीं है। इसके लिए प्रशासनिक नियंत्रण के साथ-साथ सामाजिक सहभागिता भी जरूरी है। अवैध खनन पर सख्ती,नदी तटों पर अतिक्रमण हटाना और जल स्रोतों के संरक्षण की ठोस योजना आवश्यक मानी जा रही है।
साथ ही स्थानीय समुदायों की भागीदारी से ही नदी पुनर्जीवन के प्रयास टिकाऊ बन सकते हैं।
पर्यावरण विशेषज्ञों का मानना है कि यदि समय रहते नदी संरक्षण की व्यापक रणनीति लागू की जाए तो माण्ड नदी को पुनर्जीवित किया जा सकता है। जलस्रोतों का संरक्षण, वृक्षारोपण और वैज्ञानिक प्रबंधन इसके लिए महत्वपूर्ण कदम हो सकते हैं।
अंततः सवाल आस्था का नहीं,अस्तित्व का है।
यदि नदी बचेगी तो संस्कृति भी बचेगी,खेती भी और समाज भी। शायद इसी सच्चाई को याद दिलाया जा रहा है—
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शिवलोक वासी शिव राजपूत की स्मृति शायद इसी बात की याद दिलाती है कि नदी बचाने की लड़ाई किसी एक आवाज पर निर्भर नहीं होनी चाहिए। असली सवाल यही है कि क्या समाज उस चिंता को आगे बढ़ाएगा,या फिर नदियों की पुकार भी धीरे-धीरे खामोश हो जाएगी।
भगवान को खुश रखना है तो माण्ड नदी जिंदा रखो।




