
चपले (राबर्टसन)— भक्ति की अनुपम गंगा में गोते लगाते हुए श्रद्धालुजन आज श्रीराम कथा के विश्राम दिवस पर भाव-विभोर हो उठे। कथा के पावन मंच से पंडित अजय उपाध्याय जी के श्रीमुख से रामकथा के अमृतमय प्रवचनों का रसपान कर रहे श्रद्धालुओं के मन में आज एक विशेष भावुकता का संचार हुआ — क्योंकि यह दिन था कथा-विराम का, स्मरण का, और प्रभु श्रीराम की अनुकंपा को हृदय में समेट लेने का।
कथा के इस विश्राम दिवस पर, करने वाला राम कराने वाला राम निवेदक श्रीवास परिवार द्वारा कथा के मुख्य अंशों और प्रवचनों का संक्षिप्त पुनरावलोकन किया गया। रामचरितमानस की उन घटनाओं को पुनः उजागर किया गया, जहाँ भगवान राम का आदर्श जीवन,उनका त्याग,उनकी मर्यादा और करुणा बार-बार श्रद्धालुओं के नेत्रों को अश्रुपूरित कर रही थी।

कुछ विश्राम दिवसों पर जैसे आज, रामचरितमानस की गूढ़ व्याख्या भी की गई, जिससे रामकथा का गूढ़ तत्व और अधिक स्पष्ट हुआ। यह दिन न केवल एक विराम का, बल्कि श्रद्धा और भक्ति के परिपूर्ण संयोग का भी रहा। भक्तगण पूरे मनोयोग से प्रभु श्रीराम की कथा सुनते हुए अपने हृदय को निर्मल कर रहे थे।
इस अवसर को भक्तों ने एक शुभ दिन के रूप में देखा — एक ऐसा दिन जब भगवान राम की कृपा प्राप्त करने के लिए संपूर्ण तन-मन से प्रार्थना की गई।

कथा के अंत में व्यासपीठ से पंडित अजय उपाध्याय जी ने अत्यंत भावभीने स्वर में कहा: “यदि मन, वचन या कर्म से किसी की भावना कभी आहत हुई हो, तो आपके शरीर में विराजमान प्रभु श्रीराम जी से क्षमा याचना करते हुए, हम विदाई लेते हैं।”
यह वाक्य जैसे साक्षात भगवान राम की करुणा का स्पर्श बनकर श्रोताओं के अंतर्मन को छू गया।
श्रद्धा,अश्रु और शांति के इस मिलनबिंदु पर कथा का विश्राम हुआ — पर रामकथा का प्रभाव, हृदयों में अमिट बन गया।
✍️जय सियाराम




