
रायगढ़ । मीडिया सूत्रों से मिली जानकारी अनुसार तमनार ब्लॉक के सराईटोला, मूड़ागांव, कुजेमुरा और आसपास के कई गांवों में आदिवासी समुदाय और स्थानीय ग्रामीण इन दिनों बेहद आक्रोशित हैं। कारण है – खनन कंपनी महाजेंको द्वारा प्रस्तावित कोल ब्लॉक के लिए बड़े पैमाने पर जंगल की कटाई। बारिश के इस मौसम में जब धरती हरी चादर ओढ़ रही है, पेड़ों की डालियों पर नई कोपलें मुस्कुरा रही हैं, तब हजारों हरे-भरे पेड़ों को सिर्फ कोयले के लालच में काटा जा रहा है।
ग्रामीणों के सवाल – जवाब कौन देगा?
ग्रामीणों का साफ सवाल है –
“महाजेंको को बताना चाहिए कि कोयला निकालने के लिए जितना जंगल उजाड़ा जाएगा, उतना जंगल कहाँ लगाया जाएगा?”
यह कोई भावनात्मक बात नहीं, बल्कि एक ठोस पर्यावरणीय सवाल है। तमनार क्षेत्र में हजारों एकड़ घने जंगल हैं, जहां वन्य जीवों का प्राकृतिक आश्रय, लाख, तेंदूपत्ता, महुआ, साल जैसे वनोपज का भंडार और ग्रामीणों की जीवनरेखा बसती है। अब जब जंगल कटेंगे तो—
- जितनी ऑक्सीजन की कमी आएगी, उसकी भरपाई कहाँ से होगी?
- जंगल में मिलने वाले वनोपज का नुकसान कैसे पूरा किया जाएगा?
- वन्य जीव जो इस जंगल में रहते हैं, वे उजड़ कर किस जंगल में जाएंगे? क्या उनके लिए कोई वैकल्पिक वन क्षेत्र तय किया गया है?
पूरी पारदर्शिता होनी चाहिए
पर्यावरणविदों का मानना है कि किसी भी खनन परियोजना से पहले “पर्यावरणीय प्रभाव आकलन रिपोर्ट (EIA Report)” सार्वजनिक रूप से उपलब्ध होनी चाहिए। लेकिन इस मामले में ग्रामीणों को अभी तक स्पष्ट जानकारी नहीं दी गई है। “पर्यावरण स्वीकृति, पुनर्वनीकरण योजना, विस्थापन नीति, और वन्य जीवन संरक्षण की योजना”—इन सब पर सरकार और कंपनी को जवाबदेह होना चाहिए।
क्या सिर्फ मुनाफा ही मकसद?
महाजेंको को लेकर ग्रामीणों में यह भावना गहराती जा रही है कि कंपनी को केवल मुनाफे की चिंता है, न कि स्थानीय जीवन, पर्यावरण और सांस्कृतिक अस्तित्व की। आदिवासी समाज,जो पीढ़ियों से जंगल पर निर्भर है, उनके लिए जंगल केवल पेड़ नहीं, बल्कि आस्था, जीविका और पहचान है।
सरकार और प्रशासन की भूमिका पर सवाल
ग्रामीणों ने यह भी सवाल उठाया कि –
क्या राज्य सरकार, केंद्र सरकार और वन विभाग ने इस खनन योजना को मंजूरी देते समय स्थानीय लोगों की राय ली?
क्या वन अधिकार अधिनियम (FRA 2006) और पंचायत (अनुसूचित क्षेत्र विस्तार) अधिनियम (PESA) का पालन किया गया?
जंगल कटने के बाद सिर्फ ज़मीन नहीं उजड़ती – जीवन उजड़ता है।
तमनार के ग्रामीण चाहते हैं कि महाजेंको और शासन मिलकर यह स्पष्ट करें कि—
- पुनः वनीकरण कहाँ होगा?
- वनोपज का मुआवजा कैसे मिलेगा?
- वन्य प्राणियों के लिए संरक्षण कैसे होगा?
- और सबसे अहम – स्थानीय लोगों की सहमति कहाँ है?
जब तक इन सवालों के जवाब पारदर्शी रूप से नहीं मिलते,तब तक इस परियोजना को आगे बढ़ाना एकतरफा और अन्यायपूर्ण निर्णय माना जाएगा।
“जंगल हमारा है,जीवन हमारा है – कोई नहीं छीन सकता” – यही आवाज़ आज तमनार की घाटियों में गूंज रही है।




