आज से शुरू हो रहे हैं होलाष्टक,इन आठ दिनों में भूलकर भी न करें ये काम…

होलाष्टक आज से शुरू,होलिका दहन तक बंद रहेंगे ये 16 संस्कार,क्यों वजह जानें
होलिका दहन से आठ दिन पहले यानी आज (17 मार्च) से होलाष्टक शुरू हो चुका है. शास्त्रों में फाल्गुन शुक्ल अष्टमी से लेकर होलिका दहन तक की अवधि को होलाष्टक
कहा गया है. होलाष्टक लगते ही शुभ व मांगलिक कार्य वर्जित हो जाते हैं.

इस साल होलिका दहन 24 मार्च को होगा. इसके अगले दिन 25 मार्च को रंग वाली होली खेली जाएगी. होलिका दहन से 8 दिन पहले यानी आज से होलाष्टक की शुरुआत हो गई है. शास्त्रों में फाल्गुन शुक्ल अष्टमी से लेकर होलिका दहन तक की अवधि को होलाष्टक कहा गया है. होलाष्टक लगते ही शुभ व मांगलिक कार्य वर्जित हो जाते हैं. आइए जानते हैं कि होलाष्टक से होलिका दहन तक कौन से प्रमुख संस्कार बंद रहेंगे.
होलाष्टक में भूल से भी न करें ये काम
कहा जाता है कि होलाष्टक में कभी भी विवाह,मुंडन,नामकरण, सगाई समेत 16 संस्कार नहीं करने चाहिए।
साथ ही इस दौरान नए मकान का निर्माण कार्य प्रारंभ न कराएं और न ही गृह प्रवेश करें।
होलाष्टक के समय में नए मकान, वाहन, प्लॉट या दूसरे प्रॉपर्टी की खरीदारी से बचना चाहिए।
होलाष्टक के समय में कोई भी यज्ञ, हवन आदि कार्यक्रम नहीं करना चाहिए। आप चाहें तो ये कार्य होली के बाद या उससे पहले कर सकते हैं।
साथ ही होलाष्टक के दौरान नौकरी परिवर्तन से बचना चाहिए।
यदि नई जॉब ज्वाइन करनी है, तो उसे होलाष्टक के पहले या बाद में करें।
साथ ही ये भी कहा जाता है कि होलाष्टक के समय में कोई भी नया बिजनेस शुरू करने से बचना चाहिए, क्योंकि नए बिजनेस की शुरुआत के लिए ये समय अच्छा नहीं माना जाता है।
बनारस में चिता की राख से 21 मार्च को मनाई जाएगी मसाने होली

वाराणसी जिसे लोग बनारस के नाम से भी जानते हैं, ये एक ऐसी जगह है जो दुनियाभर में मशहूर है. विश्वभर से लोग यहां आते हैं और कहते हैं कि यहां आने से उन्हें मोक्ष का अनुभव होता है. इस शहर का हर अनुभव अनोखा है, चाहे वो वहां के सुंदर गंगा घाट हो, वहां का खाना हो या वहां की गलियां, लेकिन इन सब के बावजूद एक और बात बेहद निराली है और वो है वहां की होली, दरअसल वहां मसाने की होली के नाम से होली बेहद ही मशहूर है, इस दिन लोग खास तौर से रंगों के बजाय चिताओं की राख से होली खेलते हैं, ऐसे में आइए जानते हैं क्या है ये अनोखी संस्कृति.
सदियों पुरानी है चिता की राख से खेले जाने वाली होली

वाराणसी में सदियों से एक परंपरा चली आ रही है जिसे आज भी जीवित रखा गया है, इसके तहत बनारस के मशहूर मणिकर्णिका घाट और हरिश्चंद्र घाट पर जलती हुई चिताओं के भस्म से स्थानीय लोग होली खेलते हैं, इसमें कम उम्र से लेकर बुजुर्गों तक, हर वर्ग के लोग सम्मिलित होते हैं. इस खास दिन से एक दिन पहले रंगभरी एकादशी मनाई जाती है और इसी दिन चिता की राख को एकत्र किया जाता है और एकादशी के ठीक एक दिन बाद लोग उसी राख से होली खेलते हैं, ये होली सबसे ज्यादा मणिकर्णिका घाट पर खेली जाती है.
क्यों लगता है होलाष्टक?
पौराणिक मान्यता के अनुसार, होली से आठ दिन पहले यानी अष्टमी से लेकर पूर्णिमा तक विष्णु भक्त प्रह्लाद को काफी यातनाएं दी गई थीं. हिरण्यकश्यप ने फाल्गुन शुक्ल अष्टमी को ही भक्त प्रह्लाद को बंदी बनाया था. इस दौरान प्रह्लाद को जान से मारने के लिए तरह-तरह की यातनाएं दी गई थीं. यातनाओं से भरे उन आठ दिनों को ही अशुभ मानने की परंपरा बन गई. आठ दिन बाद भक्त प्रह्लाद को जलाने के लिए होलिका उसे अपनी गोद में लेकर अग्नि में बैठ गई थीं. लेकिन देवकृपा से वह स्वयं जल गई और प्रह्लाद को कुछ नहीं हुआ. तभी से भक्त पर आए इस संकट के कारण इन आठ दिनों को होलाष्टक के रूप में मनाया जाता है.




