आध्यात्ममाँ

सर पर रखे टोकरी तो काहे ढूंढ़े नौकरी…

सर पर रखे टोकरी तो काहे ढूंढ़े नौकरी

आज कल प्राय: देखने में आता है कि हजारों युवक रोजी-रोटी के लिए सरकार से नौकरी मांग रहे हैं। यह भावना राष्ट्र के लिए घातक भी हो सकती है। इस विषय में राष्ट्रनायकों के जो आश्वासन होते हैं वे निरर्थक सिद्ध होते दिखाई दे रहे हैं। जब मैं ग्राम में रहता था तो एकबार एक पुराने धनी काश्तकार के पास एक लखपति सज्जन अपनी पुत्रियों के विवाह का प्रस्ताव लेकर पधारे। जिसके घर में वे विवाह के सम्बन्ध में आये थे उसकी दालान में बैठकर उन्होंनें दो नवयुवकों को देखा। वे अपने सिर पर टोकरी रखे खर-पतवार और खाद-गोबर ढो-ढोकर खेतों में फेंक रहे थे। लखपति महोदय घंटो यह सब देखते रहे। कोई क्या देखता-सोचता है, इसकी परवाह किये बिना दोनों युवक टोकरी ढोने और खाद फेंकने का काम करते रहे। उन्होंने उस बड़े काश्तकार के लड़कों को भी देखा जो रंगरेलियां मनाने में लगे थे। उन्होंने अपने मेजबान से पूछा कि जो दोनों लड़के कई घंटो से गोबर ढो रहे थे, वे कौन थे। मेजबान ने कहा कि वे दोनों बड़े गरीब लड़के हैं। उनके पास दो बीघे खेत है, एक बैल है, मकान भी ठीक नहीं है। वे ओसारे में गुजर-बसर करते हैं, किन्तु दोनों बड़े परिश्रमी हैं। तब लखपति मेहमान ने अपने मेजबान बड़े काश्तकार से कहा कि वे अपनी पुत्रियों का विवाह उन लड़कों से ही करना चाहते हैं क्योंकि वे परिश्रमी युवक हैं। वे उन लड़कों के पास पहुंचे, उनके सामने विवाह का प्रस्ताव रखे और विवाह-सम्बंध स्थापित किए। विवाह के बाद वे दोनों युवक और अधिक लगन और परिश्रम से काम करना प्रारम्भ किये और कुछ ही समय बीतते-बीतते उन्होंने कई एकड़ जमीन खरीद ली, ट्रैक्टर भाड़े पर ले लिया और अच्छा मकान बना लिया। उनके पास आज लाखों की जायदाद है तब भी वे परिश्रम करते हैं और अपने जीवन को सार्थक बनाये हुए हैं। मैंने बड़े काश्तकार के लड़कों को भी देखा है जो रंगरेलियां मनाने में मस्त थे। बुरी आदतों के कारण उनकी पुश्तैनी जायदाद भी खत्म हो गई है। उनके पास कुछ भी नहीं है। घर की ईंटें बंची थी अब वे भी बिक रही हैं। उन लड़कों के साथ उनके पिता भी, जो कभी धनी थे, शराब और जुआ की लत पड़ जाने के कारण, आज अपना सब कुछ गंवा चुके हैं और दूसरे के दरवाजे अगोर रहे हैं। इसीलिए कहते हैं, ‘सिर पर रखे टोकरी तो काहे ढूंढे नौकरी।’ यदि हम भी परिश्रमी हैं तो हमें रोजी-रोटी के लाले नहीं पडेंगे और किसी का मुहताज नहीं होना पड़ेगा। इससे नौकरी की भावना भी उत्पन्न नहीं होगी। परिश्रम से सब कुछ साध्य है। इसमें बिध्न-बाधाएं होंगी किन्तु उन्हें हटा देना पड़ेगा।

मैने एक साधारण व्यक्ति को देखा है जो एक छोटी सी चाय की दुकान करता था। उसने परिश्रम से धीरे-धीरे धन कमाया और एक टंकण-मशीन खरीदी। टंकण कार्य कर कुछ और धन जुटाया। धीरे-धीरे दस टंकण-मशीनें खरीद लीं। दस टंककों को टंकण-कार्य पर नियोजित किया और अपने परिवार के साथ दस लोगों के परिवार का भरण-पोषण करने लगा। आज वह व्यक्ति धनाढय हो गया है परन्तु तब भी पूर्ववत परिश्रम करता है।

जब हमारे देश के नवयुवक, चाहे वे अधिक शिक्षा पाये हों या अल्प शिक्षित हों, सर पर टोकरी रखने लगेंगे तो उन्हें नौकरी नहीं ढूंढ़नी होगी। सिर पर टोकरी रख कर सरकार से नौकरी पाने की आशा अपने सामने परोसी थाली छोड़कर दूसरे से मांग कर खाने के बराबर है। कोई भी काम हाथ में लें और परिश्रम करें। जीवन में सुख मिलेगा। कोई काम छोटा या बड़ा नहीं है। उच्च प्रशासकीय कार्य सहित सभी कार्य समान हैं। सभी परिश्रम से ही साध्य हैं। काम ही आराम है। कुछ न कुछ करते रहना चाहिए। तभी सुख-सुविधा मिलेगी, स्वास्थ्य बना रहेगा और भविष्य उज्जवल होगा। कर्तव्य ही तो धर्म है। सिर पर टोकरी रखना कर्तव्य-पथ पर अग्रसर होना है, धर्माचरण है।

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इसीलिए कहा गया है–‘सर पर रखे टोकरी तब काहे ढूंढे नौकरी।’

।।प, पू, अघोरेश्वर।।
।।।अघोर पीठ जन सेवा अभेद आश्रम ट्रस्ट।।।
।।।पोंड़ी दल्हा अकलतरा।।।

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Gopal Krishna Naik

Editor in Chief Naik News Agency Group

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