
माण्ड नदी पर जल दोहन और प्रदूषण ने बढ़ाई चिंता,उद्योग घरानों ने बिगाड़ी स्थिति…
खरसिया। मांड नदी छत्तीसगढ़ राज्य में बहने वाली एक नदी है, जो महानदी की उप नदी है. यह 241 किलोमीटर लंबी है और इसका उद्गम सरगुजा जिले के मैनपाट के पास की पहाड़ियों से होता है. यह नदी रायगढ़ जिले से गुजरते हुए जांजगीर-चांपा जिले में प्रवेश करती है और चंद्रपुर के पास महानदी में मिल जाती है.

खरसिया क्षेत्र में माण्ड नदी के घाटों पर अवैध रेत खनन और भंडारण का कारोबार दिन-ब-दिन बेतहाशा बढ़ता जा रहा है। यह अवैध व्यापार अब एक संगठित उद्योग का रूप ले चुका है, जिसमें रेत का उठाव, परिवहन, भंडारण और बिक्री एक सुनियोजित तरीके से की जा रही है। क्षेत्रीय पत्रकारों और पर्यावरण प्रेमियों ने इस पर गहरी चिंता जताई है, जबकि प्रशासन पूरी तरह से मूकदर्शक बना हुआ है।
घाटों की दुर्दशा देख चिंतित पर्यावरण प्रेमी
माण्ड नदी के किनारे स्थित घाटों की स्थिति अत्यंत दयनीय हो चुकी है। जहां एक समय प्राकृतिक सौंदर्य, जलीय जीवन और शांति का अनुभव होता था, अब वहां रेत से लदे ट्रैक्टर, ट्रक,खुदाई के गड्ढे और धूल भरे रास्ते दिखाई देते हैं। पर्यावरण प्रेमी, जो नियमित रूप से नदी के किनारे भ्रमण करते हैं, नदी की यह दुर्दशा देखकर अत्यंत व्यथित हैं।
प्राकृतिक जीवन चक्र पर प्रतिकूल असर की आशंका
अवैध रेत खनन केवल कानून का उल्लंघन नहीं है,बल्कि यह जलीय पारिस्थितिकी तंत्र के लिए भी एक गंभीर खतरा है। विशेषज्ञों के अनुसार:
- जलीय जीवों का आवास नष्ट हो रहा है। नदी की गहराई असंतुलित होने से मछलियों, कछुओं और अन्य जलीय जीवों के प्रजनन चक्र पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है।
- जल प्रवाह अवरुद्ध हो रहा है, जिससे निचले क्षेत्रों में जल संकट की स्थिति उत्पन्न हो सकती है।
- नदी के किनारों का कटाव बढ़ रहा है, जिससे आसपास की कृषि भूमि को भी खतरा है।
- स्थानीय जैव विविधता पर सीधा असर, जिससे आने वाले समय में पर्यावरणीय असंतुलन की स्थिति बन सकती है।
प्रशासनिक उदासीनता सवालों के घेरे में
स्थानीय पत्रकारों, अपने-अपने स्तर में इस मुद्दे को कई बार सोशल मीडिया और रिपोर्ट्स के माध्यम से उजागर किया है। बावजूद इसके, न तो खनिज विभाग और न ही जिला प्रशासन की ओर से कोई ठोस कार्यवाही की गई है। इससे यह संदेह गहराता जा रहा है कि कहीं इस अवैध कारोबार में कुछ अधिकारियों की मौन सहमति तो नहीं है।
जनजागरूकता और कार्यवाही की मांग
स्थानीय ग्रामीणों, पर्यावरण प्रेमियों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने मांग की है कि:
- माण्ड नदी के घाटों की सैटेलाइट और भौतिक जांच की जाए।
- अवैध खनन में संलिप्त लोगों के विरुद्ध कठोर दंडात्मक कार्यवाही हो।
- नदी की पारिस्थितिकी को पुनर्जीवित करने हेतु पुनर्वास योजना बने।
- पारदर्शी एवं न्यायसंगत रेत खनन नीति लागू की जाए।
माण्ड नदी पर जल दोहन और प्रदूषण ने बढ़ाई चिंता, फैक्ट्रियों और सीवेज ने बिगाड़ी स्थिति
माण्ड नदी,जो कभी क्षेत्र के लिए जीवनदायिनी जलधारा के रूप में जानी जाती थी,आज जल दोहन और प्रदूषण के संकट से जूझ रही है। नदी के किनारे स्थित कई औद्योगिक इकाइयों द्वारा किए जा रहे अनियंत्रित जल दोहन और बिना उपचार किए गए अपशिष्ट जल एवं सीवेज के सीधे नदी में प्रवाह से जल गुणवत्ता में भारी गिरावट आई है।

स्थानीय पर्यावरणविदों का कहना है कि माण्ड नदी में औद्योगिक इकाइयों से निकलने वाला रासायनिक युक्त पानी और रिहायशी क्षेत्रों से बहकर आने वाला घरेलू सीवेज सीधे नदी में मिल रहा है,जिससे जल का रंग,गंध और पारदर्शिता प्रभावित हो रही है। नतीजतन जलीय जीव-जंतु,मत्स्य पालन और नदी तटों पर निर्भर स्थानीय जनजीवन पर गंभीर खतरा मंडरा रहा है।
क्षेत्रीय ग्रामीणों की शिकायत है कि फैक्ट्रियों द्वारा अत्यधिक मात्रा में पानी खींचे जाने से नदी का जलस्तर लगातार चपले (राबर्टसन) आस-पास गिरता जा रहा है। वहीं दूसरी ओर, गंदे नालों का पानी सीधे नदी में गिरने से न केवल जल प्रदूषित हो रहा है, बल्कि आस-पास के भू-जल स्रोत भी प्रभावित हो रहे हैं।
प्रशासन मौन,पर्यावरण प्रेमी चिंतित

हालांकि, पर्यावरण संरक्षण कानूनों के तहत उद्योगों को अपशिष्ट शोधन संयंत्र (Effluent Treatment Plant) लगाना अनिवार्य है, लेकिन ज़मीनी हकीकत इससे बिल्कुल विपरीत है। कई फैक्ट्रियाँ बिना किसी शोधन के सीधा गंदा पानी नदी में बहा रही हैं। प्रशासन की ओर से कोई सख्त़ कार्यवाही अब तक सामने नहीं आई है, जिससे स्थिति दिन-ब-दिन और गंभीर होती जा रही है।
मांग उठी – हो वैज्ञानिक जांच और कठोर कार्यवाही
स्थानीय सामाजिक कार्यकर्ताओं एवं पर्यावरण संगठनों ने मांग की है कि माण्ड नदी की स्थिति की उच्चस्तरीय वैज्ञानिक जांच की जाए,दोषी उद्योगों पर सख़्त कार्यवाही की जाए और प्रदूषण नियंत्रण के लिए ठोस योजना बनाई जाए। साथ ही यह भी अपील की गई है कि नदी को बचाने के लिए आमजन भी जागरूक हों और इसके संरक्षण में भागीदारी निभाएं।
यदि समय रहते कदम नहीं उठाए गए,तो माण्ड नदी का अस्तित्व ही खतरे में पड़ सकता है, जिसका दुष्परिणाम पूरे क्षेत्र जलीय जीव जन्तु के साथ पशु पक्षी के साथ मनुष्यों को दुष्परिणाम भी भुगतना पड़ेगा।
नदी केवल जल का स्रोत नहीं,जीवन का आधार है। माण्ड नदी के इस निरंतर होते दोहन को रोकना आज समय की मांग है — वरना आने वाली पीढ़ियाँ हमें कभी माफ़ नहीं करेंगी।




