
चपले। खरसिया विकास खण्ड के चपले राबर्टसन में चल रही
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संगीतमय श्रीराम कथा के पाँचवें दिन पंडित अजय उपाध्याय जी ने जब राम और भरत मिलाप का प्रसंग सुनाया, तो पूरा पंडाल भावुक हो उठा। कथा स्थल पर उपस्थित सैकड़ों श्रोता उस दृश्य को सुनते हुए अपने आँसू नहीं रोक सके।
पंडित जी ने कहा –
“राम-भरत मिलाप केवल अतीत की कथा नहीं, बल्कि आज के समाज के लिए एक दर्पण है। यह प्रसंग हमें सिखाता है कि त्याग, सम्मान और भाई-चारे से बड़ा से बड़ा संघर्ष भी प्रेम में बदल सकता है।”
कथा में बताया गया कि कैसे भरत ने अपने भाई राम को अयोध्या लौटने का आग्रह किया, लेकिन जब प्रभु राम ने धर्म पालन के लिए वन में रहने का निर्णय लिया, तो भरत ने उनकी खड़ाऊँ को सिंहासन पर रखकर स्वयं एक तपस्वी का जीवन अपनाया।

श्रोताओं में बैठे जनपद पंचायत सदस्य देव डनसेना ने कहा,
“मैंने अपने जीवन में कई बार रामायण सुनी है, लेकिन आज जो भाव उत्पन्न हुए, वैसा अनुभव पहले कभी नहीं हुआ। भरत जैसा भाई आज के समय में भी एक आदर्श है।”

कई लोगों ने यह दृश्य आंखों में आँसू लेकर देखा और कथा के समापन पर पंडाल में कुछ समय के लिए गहन मौन छा गया।

इस आयोजन में स्थानीय युवाओं ने भी बढ़-चढ़कर सेवा कार्यों में भाग लिया। कथा के आयोजकों ने बताया कि श्रीराम कथा का उद्देश्य केवल धार्मिक आयोजन नहीं,


बल्कि समाज में प्रेम,त्याग और मर्यादा के मूल्यों को पुनर्स्थापित करना है।
प्रभु श्रीराम ने किया जटायु का अंतिम संस्कार,वीरगति को प्राप्त पक्षीराज को दी भावभीनी श्रद्धांजलि

लंका की ओर अपहृत सीता माता की खोज में निकले श्रीराम को आज उस समय अत्यंत दुःखद समाचार मिला जब उन्हें पता चला कि सीता माता के रक्षक बने पक्षीराज जटायु ने रावण से युद्ध करते हुए वीरगति प्राप्त की।
प्राप्त जानकारी के अनुसार, जब रावण माता सीता का हरण कर लंका ले जा रहा था, तब रास्ते में जटायु ने उसका विरोध किया। वृद्ध होने के बावजूद जटायु ने रावण से घमासान युद्ध किया। इस संघर्ष में उन्हें गहरी चोटें आईं, और अंततः वे पंचवटी के समीप भूमि पर गिर पड़े।
श्रीराम जब उस स्थान पर पहुँचे, तो घायल जटायु ने अपने अंतिम समय में पूरी घटना का वर्णन किया। यह सुनकर श्रीराम अत्यंत व्यथित हो उठे। उन्होंने जटायु को अपने पिता तुल्य मानते हुए उन्हें गोद में उठाया और उनके प्राण त्यागने के बाद विधिपूर्वक अंतिम संस्कार किया।
पंडित जी ने कहा: “जटायु ने अपने प्राणों की आहुति देकर धर्म और नारी की रक्षा का अद्वितीय उदाहरण प्रस्तुत किया है। वे केवल एक पक्षी नहीं, बल्कि धर्म के प्रहरी थे।”

श्रीराम द्वारा स्वयं अग्नि प्रज्वलित कर जटायु का अंतिम संस्कार करना दर्शाता है कि इस संसार में धर्म के लिए किए गए त्याग को देवतुल्य सम्मान मिलना चाहिए।
धार्मिक और सामाजिक संगठनों ने भी जटायु के बलिदान को नमन करते हुए इसे युगों तक याद रखने योग्य बताया है।
आगामी दिन हनुमान जी द्वारा लंका-दहन प्रसंग और राम-रावण युद्ध का वर्णन किया जाएगा।
आयोजन- करने वाला राम कराने वाले राम निवेदक श्रीवास परिवार समस्त ग्राम चपले राबर्टसन ग्रामवासी क्षेत्रवासियों ने श्रद्धालुओं से अपील है कि वे समय पर पधारकर पुण्य लाभ लें।




