दिल्ली

खान मंत्रालय ने खनिज रियायत नियमावली में महत्वपूर्ण संशोधन अधिसूचित किए, जिनमें बीएचक्‍यू और बीएचजे सहित निर्धारित सीमा से नीचे के हेमेटाइट लौह अयस्क के एएसपी की प्रकाशन पद्धति का प्रावधान है

दिल्ली।खान मंत्रालय ने 10 अप्रैल, 2026 को खनिज (परमाणु और हाइड्रोकार्बन ऊर्जा खनिजों के अलावा) रियायत (तीसरा संशोधन) नियम, 2026 को अधिसूचित किया है, जिसमें सीमा मूल्य से नीचे हेमेटाइट लौह अयस्क के औसत विक्रय मूल्य (एएसपी) के प्रकाशन के लिए कार्यप्रणाली प्रदान की गई है। इसमें बैंडेड हेमेटाइट क्वार्टजाइट (बीएचक्यू) और बैंडेड हेमेटाइट जैस्पर (बीएचजे) भी शामिल हैं।

किसी खनिज का सीमा मान वह अधिकतम सीमा है जिसके नीचे खनन के बाद प्राप्त सामग्री को अपशिष्ट मानकर हटाया जा सकता है। हीमैटाइटिक लौह अयस्क के लिए अधिसूचित सीमा मान 45 प्रतिशत एफइ (न्यूनतम) है। देश में इस सीमा मान से नीचे लौह अयस्क की विशाल मात्रा विद्यमान है, जिसमें से कुछ बीएचक्‍यू या बीएचजे के रूप में है, जो लौह अयस्क की प्रमुख आधार चट्टानें हैं। प्रसंस्करण और संवर्धन की प्रौद्योगिकी में सुधार के साथ, बीएचक्‍यू और बीएचजे सहित सीमा मान से नीचे के लौह अयस्क संसाधनों का संवर्धन करके उच्च श्रेणी का लौह अयस्क प्राप्त किया जा सकता है, जिसका उपयोग इस्पात निर्माण के लिए कच्चे अयस्क के रूप में किया जा सकता है। इस प्रकार के निम्न श्रेणी के लौह अयस्क के संवर्धन को सुगम बनाने के लिए एक उपयुक्त नीति की आवश्यकता थी।

नियमों में वर्तमान संशोधन से पहले, 45 प्रतिशत से कम एफइ सामग्री वाले हेमेटाइट लौह अयस्क (जिसमें बीएचक्‍यू और बीएचजे भी शामिल हैं) के लिए एएसपी प्रकाशित करने की कोई कार्यप्रणाली नहीं थी। इस प्रकार, 45 प्रतिशत से 51 प्रतिशत एफइ से कम एफइ ग्रेड वाले हेमेटाइट लौह अयस्क के निम्नतम ग्रेड के लिए प्रकाशित एएसपी को ही इन ग्रेडों के लिए एएसपी माना जाता था। थ्रेशोल्ड से कम ग्रेड पर रॉयल्टी, नीलामी प्रीमियम आदि लगाने के लिए उच्च ग्रेड के एएसपी का उपयोग करने से ऐसे खनिजों का लाभकारीकरण अलाभकारी हो जाता था। नियमों में वर्तमान संशोधन इस समस्या का समाधान करता है। इस प्रकार, संशोधित नियम में यह प्रावधान है कि थ्रेशोल्ड से कम एफइ सामग्री वाले हेमेटाइट लौह अयस्क के एएसपी की निम्नलिखित तरीके से गणना की जाएगी:

(क) 35 प्रतिशत से 45 प्रतिशत से कम लौह अयस्क श्रेणी के लिए, औसत विक्रय मूल्य 45 प्रतिशत से 51 प्रतिशत से कम लौह अयस्क श्रेणी के औसत विक्रय मूल्य के पचहत्तर प्रतिशत के बराबर होगा;

(ख) 35 प्रतिशत से कम लौह अयस्क के लिए, औसत विक्रय मूल्य 45 प्रतिशत से 51 प्रतिशत से कम लौह अयस्क के औसत विक्रय मूल्य के पचास प्रतिशत के बराबर होगा।

निम्न श्रेणी के संसाधनों को उपयोग योग्य श्रेणी में लाने से उच्च श्रेणी के लौह अयस्क संसाधनों के क्षय की चिंता का समाधान होगा और इससे इस्पात उद्योग को खनिज की निरंतर आपूर्ति सुनिश्चित होगी। निम्न श्रेणी के लौह अयस्क संसाधनों का उपयोग खनिज संरक्षण के हित में होगा और साथ ही लौह अयस्क संसाधनों के वैज्ञानिक और इष्टतम खनन को बढ़ावा देगा। परिणामस्वरूप, देश लौह अयस्क में आत्मनिर्भर बना रहेगा।

नियमावली में संशोधन से यह भी स्पष्ट हुआ है कि यदि खदान से निकले कच्चे माल के प्रसंस्करण से उसके आर्थिक मूल्य में कमी आती है, तो प्रारंभिक जांच के बाद बचे हुए कच्चे माल और महीन कणों पर रॉयल्टी लागू होगी। खदान से निकला कच्चा माल, पट्टे वाले क्षेत्र के खनिज क्षेत्र से विस्फोट या खुदाई के बाद प्राप्त प्राकृतिक अवस्था में बिना संसाधित या बिना कुचले कच्चे पदार्थ को संदर्भित करता है। कच्चे बिना संसाधित खनिजों को संसाधित करना आवश्यक है ताकि लक्षित खनिज की सांद्रता बढ़ाई जा सके, अशुद्धियों को दूर किया जा सके और पदार्थ को ऐसे रूप में परिवर्तित किया जा सके जिसका उद्योग वास्तव में उपयोग कर सकें। नियमावली में वर्तमान संशोधन यह स्पष्ट करता है कि खदान से निकले अप्रसाधित अयस्‍क के प्रसंस्करण के नाम पर खनिज के आर्थिक मूल्य को कम नहीं किया जा सकता है।

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Gopal Krishna Naik

Editor in Chief Naik News Agency Group

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