टीकाकरण के बाद प्रतिकूल घटनाओं पर नजर रखना जरूरी है…
एक सराहनीय टीका: भारत का एचपीवी टीकाकरण अभियान
भारत द्वारा 14 वर्षीय लड़कियों के लिए राष्ट्रव्यापी ह्यूमन पेपिलोमावायरस (एचपीवी) टीकाकरण कार्यक्रम शुरू करने का कदम ऐसे समय में विज्ञान के समर्थन में सशक्त संदेश है जब पूरी दुनिया में टीकाकरण-विरोधी भावनाएं खतरनाक रूप से तेजी पकड़ रही हैं। टीकों से परहेज का असर अमेरिका में साफ दिख रहा है जहां वर्तमान में 26 राज्यों में खसरा की महामारी पांव पसार रही है। एचपीवी टीकाकरण केवल निर्धारित सरकारी स्वास्थ्य केंद्रों में और प्रशिक्षित स्वास्थ्य अधिकारियों की मौजूदगी में संचालित किया जायेगा। साथ ही, कुशल स्वास्थ्य-देखभाल टीमें वैक्सीन लगाने के बाद निगरानी और ‘टीकाकरण के पश्चात होने वाली प्रतिकूल घटनाओं’ (एईएफआई) से निपटने के लिए तैयार रहेंगी। विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा अनुशंसित एक खुराक वाली वैक्सीन इस्तेमाल में लायी जायेगी। इस बात के पर्याप्त सबूत मौजूद हैं कि गर्भाशय ग्रीवा (सर्विकल) कैंसर के लगभग सभी मामलों में एचपीवी की उच्च-जोखिम वाली किस्मों, खासकर 16 व 18, से लगातार संक्रमण ही कारण होता है। भारत में गर्भाशय ग्रीवा कैंसर के कुल मामलों में 80 फीसदी से ज्यादा हिस्सा इन्हीं दोनों किस्मों का है। साक्ष्य इस तथ्य की ओर भी इशारा करते हैं कि गर्भाशय ग्रीवा कैंसर को एचपीवी टीकाकरण और नियमित जांच के जरिए काफी हद तक रोका जा सकता है,और अगर जल्दी पता लग जाए और तुरंत इलाज शुरू हो जाए तो यह ठीक हो सकता है। वैश्विक स्तर पर, 90 से ज्यादा देश एक खुराक वाला एचपीवी टीकाकरण कार्यक्रम लागू कर रहे हैं। कई देशों में व्यापक टीकाकरण के बाद एचपीवी संक्रमण, कैंसर-पूर्व घावों (प्री-कैंसरस लीशन्स) और गर्भाशय ग्रीवा कैंसर की घटनाओं में काफी कमी देखी गयी है। गर्भाशय ग्रीवा कैंसर ऐसा विरल कैंसर है जिसमें टीका एक बेहतरीन निवारक साबित हुआ है।
भारत में ग्रीवा कैंसर का बोझ ही इस निर्णय को एक बेहद अहम जीवन-रक्षक हस्तक्षेप बनाने के लिए काफी है: डब्ल्यूएचओ से जुड़े क्षेत्रों में दक्षिण-पूर्व एशिया क्षेत्र का गर्भाशय ग्रीवा कैंसर की घटनाओं (नये मामलों) और मृत्यु दर में दूसरा सर्वोच्च स्थान है, जिसमें भारत का योगदान 65 फीसदी से ऊपर है। भारत में महिलाओं में यह दूसरा सबसे आम कैंसर है, जिस के बारे में अनुमान लगाया गया कि साल 2022 में देश में 127,526 नये मामले सामने आये और इससे 79,906 मौतें हुईं। राष्ट्रीय स्तर पर इसकी जांच का विस्तार चिंताजनक रूप से निम्न है, और 30-49 साल की केवल 1.9 फीसदी महिलाओं की जांच की जा रही है। हालांकि, एचपीवी वैक्सीन के काले अतीत को भुलाया नहीं जा सकता। साल 2009-10 में आंध्र प्रदेश और गुजरात में एक परीक्षण का हिस्सा रही सात लड़कियों की मौत हो गयी थी। आईसीएमआर की जांच में दावा किया गया कि जो कारण थे वो “शायद वैक्सीन से जुड़े नहीं थे। हालांकि, इन सभी मामलों में मौत की वजह पक्के तौर पर स्थापित नहीं की जा सकती”। इसने सभी एईएफआई की पहचान करने और उनकी छानबीन करने की जरूरत की ओर भी, एक प्रमुख चिंता के रूप में, ध्यान दिलाया। चूंकि सरकार स्वास्थ्य संबंधी कई फायदों वाली इस कवायद को शुरू करने जा रही है, अच्छा होगा कि वैक्सीन के भंडारण के लिए ठीक से काम कर रही कोल्ड चेन, पूर्ण पारदर्शिता और देशभर में एईएफआई की ध्यानपूर्वक रिपोर्टिंग सुनिश्चित कर ली जाए।
स्रोत-https://www.thehindu.com/hindi/




