जब बुलावा आया बाबा बर्फानी का…

आस्था,संघर्ष और आत्मबोध की अमर कथा — श्री अमरनाथ जी यात्रा 2026
✍: गोपाल कृष्ण नायक “देहाती”
खरसिया। कुछ यात्राएँ केवल मंज़िल तक पहुँचने के लिए नहीं होतीं,वे मनुष्य को स्वयं के भीतर उतरने का अवसर देती हैं।

श्री अमरनाथ जी यात्रा भी ऐसी ही एक आध्यात्मिक तपस्या है, जहाँ हर कदम शरीर की शक्ति से नहीं, श्रद्धा की गहराई से आगे बढ़ता है। हिमालय की गोद में स्थित वह पवित्र गुफा केवल हिम शिवलिंग का दर्शन नहीं कराती, बल्कि यह भी सिखाती है कि ईश्वर तक पहुँचने का मार्ग सुविधा का नहीं, समर्पण का होता है।

10 जुलाई 2026 को खरसिया से हमारा दल बाबा बर्फानी के बुलावे पर रवाना हुआ। उत्साह से भरे मन को यह अनुमान नहीं था कि आने वाले दिन जीवन के सबसे कठिन,सबसे रोमांचकारी और सबसे पावन अनुभवों में बदल जाएंगे।

धन्य हो विनोद का जिसके वजह से एसी डिब्बे में सुखद यात्रा हुआ। रेल यात्रा के बाद अमृतसर पहुँचे। राजेश डनसेना के तत्परता और कन्हैया का जुगाड़ ने देर रात अमृतसर से एसी बस में सोते हुए रात का सफ़र तै हुआ सुबह-सुबह हल्की-फुल्की ने जम्मू में स्वागत किया। बगैर पंजीयन के चल पड़े हम यात्रा के लिए,रायगढ़ डाक्टर भानु पटेल से मेडिकल कराए को लेकर तवी रिवर फ्रंट मे आरएफआईडी कार्ड बनवाने के लाइन पर लग गए कुछ घंटे मस्कट के पश्चात यात्रा पंजीयन कार्ड प्राप्त हो गया, सुरक्षा जांच,भगवती नगर बेस कैंप की औपचारिकताएँ और उपलब्ध संसाधनों के बीच विश्राम की व्यवस्था—यात्रा के पहले ही दिन यह स्पष्ट हो गया कि यहाँ मनुष्य की योजना नहीं, महादेव की इच्छा सर्वोपरि है।

रात विश्राम की तलाश में बीती। एसी हॉल नहीं मिला,एसी बस का टिकट भी हाथ नहीं आया। अंततः सामान्य व्यवस्था को ही प्रसाद मानकर स्वीकार किया। शायद बाबा पहले ही दिन यह सिखाना चाहते थे कि त्याग और संतोष ही इस यात्रा का पहला सोपान है।

भोर के तीसरे पहर सुरक्षा बलों की अभेद्य निगरानी में हमारा काफिला पहलगाम की ओर बढ़ा। सीआरपीएफ, पुलिस और ब्लैक कमांडो के जवानों के बीच पहाड़ी मार्गों से गुजरते हुए विश्वास और सुरक्षा का अद्भुत संगम दिखाई दिया। पहलगाम की शीतल वादियों ने थकान हर ली। वहीं साथी केदार का जन्मदिन साधारण कॉफी और कुछ पकवानों के साथ मनाया गया। कठिन यात्राओं में ऐसे छोटे-छोटे पल ही सबसे बड़ी पूँजी बन जाते हैं।

चंदनवाड़ी से वास्तविक परीक्षा आरंभ हुई। जैसे-जैसे ऊँचाई बढ़ती गई, साँसें भारी होने लगीं। कुछ ही दूरी पर मेरा शरीर जवाब देने लगा। कदम रुक गए, लेकिन साथियों का विश्वास नहीं। कन्हैया बाबू ने बिना विलंब पालकी की व्यवस्था कराई और मुझे शेषनाग तक पहुँचाया। उस क्षण समझ आया कि तीर्थ केवल भगवान के भरोसे नहीं, साथियों के कंधों पर भी पूरा होता है।
शेषनाग से पंचतरणी तक का सफर मानो धैर्य और विश्वास की अग्निपरीक्षा था। पीसू टॉप, गणेश टॉप और लगभग 14,500 फीट की ऊँचाई पर बर्फ से ढके दुर्गम मार्ग, हड्डियाँ जमा देने वाली ठंड, विरल होती हवा और बीच-बीच में गिरती फुहारें—प्रकृति हर मोड़ पर श्रद्धा की परीक्षा ले रही थी। लेकिन प्रत्येक कठिनाई के साथ मन में एक ही स्वर गूंजता रहा—”हर-हर महादेव।”
पंचतरणी के टेंट नंबर 820 में बिताई गई रात भी एक अलग अनुभव थी। बिना दरवाजों और तालों वाले टेंटों में विश्वास ही सबसे बड़ा प्रहरी था। आधी रात एक महिला भूलवश हमारे टेंट में आ गई। साथियों की सजगता और महिला की सहज क्षमा-याचना ने यह सिखाया कि तीर्थ केवल पूजा का नहीं, संस्कार और मर्यादा का भी विद्यालय है।
अगली सुबह केवल एक नया दिन नहीं, जीवन के सबसे पावन मिलन का क्षण लेकर आई। कोई घोड़े पर था, कोई पालकी में, कोई पिट्ठू के सहारे और कोई अपने पैरों के भरोसे। अंतिम छह किलोमीटर का मार्ग शरीर से अधिक आत्मा तय कर रही थी। कुछ साथी पहले पहुँच गए, कुछ पीछे रह गए, लेकिन किसी ने अकेले दर्शन नहीं किए। सबने एक-दूसरे की प्रतीक्षा की। यही इस यात्रा की सबसे बड़ी उपलब्धि थी—दर्शन से पहले साथ निभाने का धर्म।
जब पवित्र गुफा सामने थी, शब्द मौन हो गए। हिम शिवलिंग के प्रथम दर्शन ने सारी थकान, पीड़ा और संघर्ष को पलभर में विलीन कर दिया। ऐसा लगा मानो स्वयं महादेव कह रहे हों—”जो यहाँ तक पहुँचा है, वह पैरों से नहीं, विश्वास से चला है।”
किन्तु नियति की अंतिम परीक्षा अभी शेष थी। गुफा की सीढ़ियाँ चढ़ते समय अचानक ऑक्सीजन की कमी से मेरा शरीर फिर जवाब दे गया। साँसें तेज हो गईं, कदम डगमगा गए। सेवा में लगे डाक्टर,सुरक्षाकर्मियों और साथी कृष्ण कुमार पटेल ने तत्काल ऑक्सीजन उपलब्ध कराई। कुछ देर विश्राम के बाद जब चेतना लौटी,तब लगा जैसे महादेव स्वयं जीवन का स्पर्श देकर कह रहे हों—”अभी तुम्हारी यात्रा समाप्त नहीं हुई है।” उस क्षण यह अनुभव केवल चिकित्सा का नहीं, ईश्वरीय कृपा का था।
बालटाल मार्ग से वापसी के दौरान हिमालय का विराट सौंदर्य, बादलों से आलिंगन करते पर्वत, कल-कल बहते झरने और देश के कोने-कोने से आए श्रद्धालुओं का अपनापन यह बताता रहा कि भारत की आध्यात्मिक आत्मा आज भी उतनी ही जीवंत है। यहाँ जाति, भाषा, क्षेत्र और पहचान सब पीछे छूट जाते हैं; शेष रह जाता है केवल एक परिचय—भोलेनाथ का भक्त।
अमृतसर लौटकर श्री हरमंदिर साहिब में मत्था टेकते समय मन में एक अद्भुत शांति थी। शिव और गुरु परंपरा के इस आध्यात्मिक संगम ने यह अनुभूति कराई कि ईश्वर तक पहुँचने के मार्ग भिन्न हो सकते हैं, पर उनका संदेश सदैव एक ही रहता है—प्रेम, सेवा, समर्पण और मानवता।

आज जब पीछे मुड़कर देखता हूँ तो महसूस होता है कि मैंने अमरनाथ की यात्रा नहीं की; बाबा बर्फानी ने स्वयं मुझे बुलाया, परखा, गिराया, संभाला और अंततः अपने चरणों तक पहुँचा दिया। यही इस यात्रा का सबसे बड़ा चमत्कार है।

यह यात्रा केवल हिम शिवलिंग के दर्शन की कथा नहीं, बल्कि विश्वास की विजय, साथियों के समर्पण, सेवा की महिमा, प्रकृति की कठोरता और ईश्वर की असीम करुणा का जीवंत दस्तावेज़ है। जीवन में बहुत सी मंज़िलें मिलती हैं, लेकिन कुछ यात्राएँ जीवन को ही नया अर्थ दे जाती हैं। श्री अमरनाथ जी यात्रा मेरे लिए वही अमर अनुभव है।

बाबा बर्फानी की असीम कृपा,पूज्य गुरुजनों के आशीर्वाद,सभी साथियों के नि:स्वार्थ सहयोग, परिवार के विश्वास और शुभचिंतकों की मंगलकामनाओं को यह संपूर्ण यात्रा सादर समर्पित है।
हर-हर महादेव
जय बाबा अमरनाथ




