
खरसिया। यूँ तों आबकारी विभाग का नाम सामने आते ही सबसे पहले सरकारी राजस्व का आंकड़ा,शराब से मिलने वाली आय और उस पर होने वाली राजनीतिक बहस जेहन में आती है। सत्ता पक्ष हो या विपक्ष,आबकारी राजस्व को लेकर एक-दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप लगाते समय आंकड़ों की ‘गुगली’ और सियासी चटकारे खूब सुनाई देते हैं। लेकिन इन तमाम बहसों से अलग यदि कभी आबकारी विभाग के खरसिया स्थित अधिकारी कार्यालय की ओर एक नजर डाल ली जाए, तो तस्वीर कुछ ऐसी नजर आती है कि देखने वाला शायद अनायास ही कह उठे—“ओ माय गॉड!”
जिस विभाग से सरकार को बड़ी मात्रा में राजस्व प्राप्त होता है, उसी विभाग के स्थानीय कार्यालय की स्थिति व्यवस्था और रखरखाव को लेकर सवाल खड़े करती दिखाई देती है। कार्यालय की भव्यता की अपेक्षा यहां नजर आने वाली बदहाली व्यवस्था के उन दावों से अलग तस्वीर पेश करती है, जिनमें सरकारी विभागों को आधुनिक, व्यवस्थित और सुविधाजनक बनाने की बात कही जाती है।
प्रदेश के राजस्व बढाने वाला विभाग के हालत पर सवाल
आबकारी विभाग सरकार के महत्वपूर्ण राजस्व स्रोतों में शामिल है। शराब के उत्पादन, परिवहन, बिक्री और लाइसेंसिंग से जुड़े कार्यों की निगरानी के साथ विभाग पर राजस्व संग्रह की भी अहम जिम्मेदारी होती है। ऐसे में स्वाभाविक सवाल उठता है कि जिस विभाग से सरकार को करोड़ों रुपये का राजस्व प्राप्त होता है, उसके स्थानीय कार्यालय के रखरखाव और बुनियादी सुविधाओं की स्थिति कैसी होनी चाहिए?
खरसिया के आबकारी अधिकारी कार्यालय को देखने के बाद यही सवाल चर्चा में है कि क्या विभागीय कार्यालयों के रखरखाव और सुविधाओं के लिए भी कोई स्पष्ट मानक और नियमित निगरानी व्यवस्था है?
सियासत में आंकड़ों की चमक, जमीन पर तस्वीर अलग?
आबकारी राजस्व को लेकर जब राजनीतिक बयानबाजी होती है, तब करोड़ों-अरबों के आंकड़े सामने आते हैं। सत्ता पक्ष राजस्व वृद्धि को उपलब्धि बताता है तो विपक्ष उसी व्यवस्था पर सवाल उठाता है। आरोप-प्रत्यारोप के इस खेल में आंकड़ों की गेंद एक पाले से दूसरे पाले में जाती रहती है।
लेकिन जमीनी स्तर पर किसी विभाग की कार्यप्रणाली का आकलन केवल राजस्व के आंकड़ों से नहीं किया जा सकता। कार्यालय का वातावरण, कर्मचारियों के लिए सुविधाएं, रिकॉर्ड रखने की व्यवस्था, साफ-सफाई, भवन की स्थिति और आम नागरिकों के लिए उपलब्ध बुनियादी सुविधाएं भी प्रशासनिक दक्षता का हिस्सा हैं।
सवाल छोटा है,लेकिन जवाब जरूरी
खरसिया के आबकारी कार्यालय की स्थिति को लेकर उठ रहे सवाल किसी व्यक्ति विशेष के खिलाफ आरोप नहीं, बल्कि सरकारी संपत्ति और विभागीय व्यवस्था के रखरखाव से जुड़े सवाल हैं।
क्या कार्यालय के रखरखाव के लिए नियमित बजट उपलब्ध होता है?
क्या भवन की समय-समय पर मरम्मत और निरीक्षण किया जाता है?
क्या विभागीय कार्यालयों की भौतिक स्थिति का उच्च अधिकारियों द्वारा निरीक्षण किया जाता है?
और यदि व्यवस्था सुधार की आवश्यकता है, तो इसके लिए जिम्मेदारी किसकी है?
इन सवालों के जवाब सामने आना इसलिए भी जरूरी है क्योंकि सरकारी कार्यालय केवल कर्मचारियों के बैठने की जगह नहीं होते, बल्कि वे शासन की कार्यप्रणाली और प्रशासनिक संस्कृति का सार्वजनिक चेहरा भी होते हैं।
‘ओ माय गॉड’ से आगे चाहिए जवाब
राजस्व संग्रह की उपलब्धियों का उल्लेख जरूरी है, लेकिन उसके साथ यह भी जरूरी है कि उस राजस्व से संचालित सरकारी व्यवस्था की बुनियादी तस्वीर भी संतोषजनक हो। यदि किसी महत्वपूर्ण विभाग का स्थानीय कार्यालय ही उपेक्षा का शिकार दिखाई दे, तो सवाल केवल भवन का नहीं रहता—वह प्रशासनिक प्राथमिकताओं और निगरानी व्यवस्था तक पहुंच जाता है।
अब देखना यह होगा कि खरसिया के आबकारी कार्यालय की स्थिति पर संबंधित विभाग के अधिकारी क्या कहते हैं और क्या इसे सुधारने के लिए कोई ठोस पहल की जाती है।
क्योंकि आंकड़ों में राजस्व की चमक अपनी जगह है,लेकिन जमीन पर सरकारी कार्यालय की हालत भी शासन की कार्यशैली का आईना होती है।



