
रायगढ़। जन्माष्टमी के पश्चात रायगढ़ जिले में आस्था ने फिर करवट ली है। गणेश उत्सव की तैयारियां जोर शोर शुरू हो चुकी हैं। शहर से लेकर सुदुर वनांचल क्षेत्र खरसिया,घरघोड़ा,तमनार लैलूंगा,धरमजयगढ़ तक… कुम्हार गली में अब चाक नहीं,श्रद्धा घूम रही है।

मूर्तिकारों की झोपड़ियों में सुबह होने से पहले ही दिया/बिजली जल जाता है। हाथों में सनी मिट्टी,आंखों में भक्ति और उंगलियों पर कला… वही हाथ जो साल भर बर्तन गढ़ते हैं, मआज गणपति को आकार दे रहे हैं।
अलग-अलग रूप,एक ही भाव
कहीं बाल गणेश अपनी नटखट मुस्कान लिए,तो कहीं 08 फीट के राजाधिराज गंभीर मुद्रा में। कोई प्रतिमा में पर्यावरण का संदेश – मिट्टी की सुगंध वाली,तो कोई आधुनिक थीम पर AI डिजाइन वाली। समितियां रोज मूर्तिकारों के द्वार पर हैं – “इस बार बप्पा का रूप थोड़ा और मनमोहक हो।”

ये सिर्फ मूर्ति निर्माण नहीं है,ये एक साधना है। एक मूर्तिकार दिन-रात मिट्टी को थपथपाता है,तो लगता है जैसे वो मिट्टी को नहीं,अपने ही भीतर के ईश्वर को पुकार रहा हो। पसीने की हर बूंद में मंत्र है,हर रेखा में प्रार्थना।
मिट्टी से मूरत तक का सफर
त्योहार बाजार में नहीं,इन छोटी-छोटी झोपड़ियों में जन्म लेते हैं। जब पूरा रायगढ़ जिला गणपति के स्वागत में झूमेगा,तब याद रखना – इस उत्सव की पहली आरती इन मूर्तिकारों ने अपने हाथों के छालों से की है।
आइए हम सब,इस बार हम सिर्फ मूर्ति न खरीदें,उस हाथ को प्रणाम करें जिसने मिट्टी में प्राण फूंके हैं। मिट्टी की मूर्ति अपनाएं,नदी को निर्मल रखें और कला को जीवित रखें।

क्योंकि जब तक रायगढ़ जिला की गांवो-नगर-शहर के गलियों में मिट्टी महकेगी,तब तक आस्था जिंदा रहेगी।
गणपति बप्पा मोरया,मंगल मूर्ति मोरया




