
खरसिया। खरसिया के बरगढ़ खोला के ग्राम पंचायत बर्रा के शासकीय उच्चतर माध्यमिक विद्यालय परिसर में खड़े हरे-भरे शीशम के पेड़ों की कटाई को लेकर ग्रामीणों में नाराजगी गहराती जा रही है। ग्रामीणों का आरोप है कि ग्राम पंचायत को पूर्व सूचना दिए बिना और आवश्यक अनुमति की प्रक्रिया स्पष्ट किए बिना जीवित शीशम के पेड़ों की कटाई कर दी गई। मामला अब केवल कुछ पेड़ों के कटने का नहीं, बल्कि सरकारी परिसर में पर्यावरणीय संवेदनशीलता,प्रशासनिक प्रक्रिया और स्थानीय समुदाय की भागीदारी से जुड़े सवालों का रूप ले चुका है।

ग्रामीणों के अनुसार बर्रा ग्राम पंचायत अनुसूचित क्षेत्र में आती है,जहां पेसा कानून लागू है। ऐसे में प्राकृतिक संसाधनों और ग्राम समुदाय के हितों से जुड़े विषयों में ग्रामसभा की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है। ग्रामीणों का कहना है कि यदि पेड़ों की कटाई के लिए कोई वैधानिक आदेश अथवा अनुमति जारी की गई थी,तो उसे सार्वजनिक रूप से स्पष्ट किया जाना चाहिए, ताकि किसी प्रकार का भ्रम न रहे।
सूखी डालियां हटानी थीं तो हरे पेड़ क्यों कटे?
इस पूरे मामले में सबसे अधिक बेचैनी उस सवाल को लेकर है,जिसका उत्तर ग्रामीण प्रशासन से चाहते हैं। बताया जा रहा है कि विद्यालय परिसर में कुछ पेड़ों की सूखी डालियां भवन के लिए खतरा बन रही थीं और उन्हें हटाने की आवश्यकता थी। यदि वास्तविक उद्देश्य केवल सूखी एवं खतरनाक डालियों को हटाना था,तो फिर हरे-भरे शीशम के पेड़ों की कटाई क्यों हुई—यह प्रश्न अब जांच के केंद्र में है।
पेड़ केवल लकड़ी नहीं होते। वे वर्षों की धूप,वर्षा और मिट्टी से जुड़ी हुई ऐसी जीवित स्मृतियां होते हैं, जिनकी छाया में पीढ़ियां बड़ी होती हैं। विशेषकर विद्यालय परिसर में खड़ा एक पेड़ बच्चों के लिए केवल हरियाली का हिस्सा नहीं, बल्कि उनके आसपास के पर्यावरण का जीवंत पाठ भी होता है।
प्राचार्य ने आरोपों से किया इनकार
मामले में विद्यालय के प्राचार्य महंत ने अपने ऊपर लगाए जा रहे आरोपों को सिरे से खारिज किया है। उनका कहना है कि पेड़ों की कटाई उनके द्वारा नहीं कराई गई।
प्राचार्य के इस बयान के बाद मामले में एक और महत्वपूर्ण सवाल खड़ा हो गया है—यदि कटाई प्राचार्य के निर्देश पर नहीं हुई,तो फिर विद्यालय परिसर में पेड़ों की कटाई किसके आदेश से हुई? क्या इसके लिए कोई लिखित अनुमति थी? कटाई के बाद निकली लकड़ी कहां गई? इन प्रश्नों का उत्तर जांच के माध्यम से ही सामने आ सकेगा।
‘एक पेड़ मां के नाम’ के बीच उठता विरोधाभास…
मामले का एक संवेदनशील पहलू यह भी है कि जिस क्षेत्र में हरियाली बढ़ाने और पर्यावरण संरक्षण के संदेश के साथ पौधरोपण अभियान चलाए जा रहे हैं, उसी क्षेत्र के एक सरकारी विद्यालय परिसर में हरे शीशम के पेड़ों की कटाई को लेकर सवाल उठ रहे हैं।
‘एक पेड़ मां के नाम’ जैसे अभियानों का मूल संदेश ही पेड़ को जीवन, स्मृति और संरक्षण से जोड़ना है। ऐसे में यदि किसी सरकारी परिसर में जीवित पेड़ों की कटाई हुई है, तो प्रशासन के लिए यह आवश्यक हो जाता है कि वह पूरे मामले को पारदर्शिता के साथ देखे और यह स्पष्ट करे कि कटाई पर्यावरणीय एवं वैधानिक मानकों के अनुरूप थी अथवा नहीं।
जांच से तय होगी सच्चाई
ग्रामीणों ने वन विभाग और शिक्षा विभाग से मामले की जांच कर कार्यवाही की मांग की है। उनका कहना है कि यदि स्थानीय स्तर पर उनकी शिकायत का समाधान नहीं हुआ,तो वे अनुविभागीय अधिकारी राजस्व खरसिया,जिला प्रशासन रायगढ़ और मुख्यमंत्री जनदर्शन/सीएम पोर्टल तक शिकायत पहुंचाएंगे।
अब जांच के सामने मूल प्रश्न स्पष्ट हैं—पेड़ों की कटाई किसके आदेश पर हुई? क्या सक्षम स्तर से अनुमति ली गई थी? ग्राम पंचायत अथवा ग्रामसभा को इसकी जानकारी दी गई थी? कटाई के बाद लकड़ी का क्या किया गया? यदि अनुमति केवल सूखी डालियों को हटाने की थी,तो हरे शीशम के पेड़ों की कटाई कैसे हुई?
इन सवालों का जवाब किसी आरोप या प्रत्यारोप से नहीं,बल्कि दस्तावेजों,स्थल निरीक्षण और निष्पक्ष जांच से मिलना चाहिए। बर्रा के ग्रामीणों की नाराजगी को केवल पेड़ों की कटाई पर प्रतिक्रिया मानकर टालना पर्याप्त नहीं होगा। यह मामला उस भरोसे से भी जुड़ा है,जो ग्रामीण सरकारी संस्थाओं और स्थानीय प्रशासन से रखते हैं।
आखिर पेड़ कटने के बाद उसकी छाया वापस नहीं आती। इसलिए बर्रा में अब जरूरत आरोपों की नहीं, बल्कि सच को सामने लाने वाली निष्पक्ष जांच की है—ताकि यह स्पष्ट हो सके कि विद्यालय परिसर में आरी नियमों के अनुसार चली थी या नियमों की अनदेखी करते हुए।




