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विश्व हाथी दिवस: जंगलों के प्रहरी, संरक्षण के सामने बढ़ती चुनौतियां

धरती के विशालकाय जीव के प्रति जागरूकता बढ़ाने का संदेश देने वाले विश्व हाथी दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं।

रायगढ़। हर साल 12 अगस्त को मनाया जाने वाला विश्व हाथी दिवस दुनिया के सबसे बड़े स्थलीय जीव के संरक्षण, उसके प्राकृतिक आवास की सुरक्षा और मानव-हाथी संघर्ष की बढ़ती चुनौती की ओर ध्यान आकर्षित करता है। विश्व हाथी दिवस की शुरुआत 12 अगस्त 2012 को हुई थी। इसका उद्देश्य एशियाई और अफ्रीकी हाथियों के सामने मौजूद आवास क्षरण, अवैध शिकार, मानव-हाथी संघर्ष और अन्य खतरों के प्रति वैश्विक जागरूकता बढ़ाना है।

केवल वन्यजीव नहीं, पूरे पारिस्थितिकी तंत्र के प्रहरी

हाथियों को वैज्ञानिक जगत में अक्सर ‘इकोसिस्टम इंजीनियर’ कहा जाता है। उनकी आवाजाही जंगल की संरचना को प्रभावित करती है। वे बीजों को दूर-दराज के क्षेत्रों तक पहुंचाने, वनस्पतियों के प्रसार और जंगल में प्राकृतिक रास्ते बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। उनके बनाए रास्तों और जलस्रोतों का लाभ अनेक अन्य वन्यजीवों को भी मिलता है।

इसलिए हाथियों का संरक्षण केवल एक प्रजाति की संख्या बनाए रखने का विषय नहीं है। यह जंगलों, जैव विविधता और उन प्राकृतिक प्रक्रियाओं की रक्षा से जुड़ा है जिन पर व्यापक पारिस्थितिकी तंत्र निर्भर करता है।

भारत में संरक्षण की बड़ी जिम्मेदारी

भारत एशियाई हाथियों के संरक्षण के लिए दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण देशों में है। केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय के अनुसार, एशिया के जंगली हाथियों की 60 प्रतिशत से अधिक आबादी भारत में पाई जाती है। भारत सरकार ने हाथियों, उनके आवास और प्रवास गलियारों की सुरक्षा तथा मानव-हाथी संघर्ष को कम करने के लिए वर्ष 1991-92 में प्रोजेक्ट एलीफेंट शुरू किया था।

हाथी को भारत का राष्ट्रीय धरोहर पशु भी घोषित किया गया है। इसके संरक्षण के लिए केंद्र और राज्य सरकारों की योजनाओं के साथ वन्यजीव संरक्षण कानूनों के तहत सुरक्षा व्यवस्था लागू है।

हालांकि, हाथियों की राष्ट्रीय आबादी के आंकड़ों को लेकर भी एक महत्वपूर्ण तथ्य सामने है। 2017 की पारंपरिक गणना में भारत में 29,964 हाथी दर्ज किए गए थे। इसके बाद देश में डीएनए आधारित समकालीन आकलन की दिशा में काम हुआ है, जिससे हाथियों की संख्या और उनके वितरण को अधिक वैज्ञानिक तरीके से समझने का प्रयास किया जा रहा है।

हाथी गलियारे संरक्षण की सबसे अहम कड़ी

हाथियों का जीवन केवल किसी एक जंगल या संरक्षित क्षेत्र तक सीमित नहीं रहता। भोजन, पानी और प्रजनन के लिए वे लंबी दूरी तय करते हैं और पारंपरिक मार्गों से एक वन क्षेत्र से दूसरे क्षेत्र तक जाते हैं। यही कारण है कि एलिफेंट कॉरिडोर हाथी संरक्षण की केंद्रीय कड़ी बन चुके हैं।

पर्यावरण मंत्रालय की Elephant Corridors of India 2023 रिपोर्ट के अनुसार, 2023 तक देश के 15 हाथी-बहुल राज्यों में 150 हाथी गलियारों की मैदानी स्तर पर पहचान और पुष्टि की गई थी। रिपोर्ट में पूर्व-मध्य क्षेत्र में 52, उत्तर-पूर्व में 48, दक्षिणी क्षेत्र में 32 और उत्तरी क्षेत्र में 18 गलियारे दर्ज किए गए।

सड़क, रेलवे, खनन, बिजली लाइन, औद्योगिक परियोजनाओं और बस्तियों का विस्तार यदि इन मार्गों को बाधित करता है तो उसका सीधा असर हाथियों की आवाजाही और मानव-हाथी संबंधों पर पड़ सकता है।

छत्तीसगढ़ में चुनौती और गंभीर

हाथी संरक्षण की चर्चा छत्तीसगढ़ के संदर्भ में विशेष महत्व रखती है। भारतीय वन्यजीव संस्थान और प्रोजेक्ट एलीफेंट से जुड़े 2025 के अध्ययन में राज्य के 321 गांवों में मानव-हाथी संघर्ष दर्ज किया गया। अध्ययन के अनुसार धरमजयगढ़, जशपुर, सुरगुजा और बलरामपुर जैसे क्षेत्र संघर्ष से विशेष रूप से प्रभावित रहे हैं। हाथियों की मृत्यु के कारणों में बिजली का करंट, वाहन दुर्घटनाएं, विषप्रयोग और अन्य मानवीय गतिविधियां शामिल बताई गई हैं।

रायगढ़ जिले का धरमजयगढ़,खरसिया  क्षेत्र भी इस चुनौती से अछूता नहीं है। अध्ययन में धरमजयगढ़ कॉरिडोर को महत्वपूर्ण संरक्षण क्षेत्र के रूप में चिन्हित किया गया है। रिपोर्ट ने प्रारंभिक चेतावनी प्रणाली, हाथी गलियारों की सुरक्षा, बिजली लाइनों में सुधार, यातायात नियंत्रण और समुदाय आधारित संरक्षण को मानव-हाथी संघर्ष कम करने के लिए महत्वपूर्ण उपाय बताया है।

विकास और संरक्षण के बीच संतुलन की परीक्षा

हाथियों के आवास वाले क्षेत्रों में सड़क, रेल, खनन और औद्योगिक परियोजनाएं आर्थिक विकास के लिए महत्वपूर्ण हो सकती हैं, लेकिन इनके निर्माण की योजना में वन्यजीवों की आवाजाही को नजरअंदाज करना दीर्घकाल में गंभीर पर्यावरणीय और सामाजिक जोखिम पैदा कर सकता है।

रेलवे और सड़क दुर्घटनाएं, बिजली के तारों से करंट लगना तथा कृषि क्षेत्रों में हाथियों का प्रवेश ऐसी परिस्थितियां हैं जिनमें वन्यजीव और मानव दोनों जोखिम में आते हैं। संवेदनशील क्षेत्रों में गति सीमा, चेतावनी प्रणाली, अंडरपास या अन्य उपयुक्त वन्यजीव-पारगमन संरचनाएं, बिजली लाइनों का सुरक्षित डिजाइन और वास्तविक समय निगरानी जैसे उपाय जरूरी हो जाते हैं।

मानव-हाथी संघर्ष का समाधान केवल मुआवजा नहीं

जब हाथी फसलों को नुकसान पहुंचाते हैं तो ग्रामीण परिवारों की आजीविका प्रभावित होती है। दूसरी ओर, हाथियों के साथ टकराव में मानव और वन्यजीव दोनों की जान जा सकती है। इसलिए इस समस्या का समाधान केवल मुआवजा देने तक सीमित नहीं रह सकता।

ग्रामीणों को समय पर चेतावनी, फसल क्षति का त्वरित आकलन और मुआवजा, सुरक्षित निकासी की व्यवस्था तथा स्थानीय स्तर पर प्रशिक्षित त्वरित प्रतिक्रिया दल जरूरी हैं। इसके साथ वन विभाग, स्थानीय प्रशासन और ग्रामीण समुदायों के बीच लगातार संवाद भी आवश्यक है।

तकनीक दे सकती है नई ताकत

कैमरा ट्रैप, जीपीएस/रेडियो कॉलर, ड्रोन, सेंसर और मोबाइल आधारित चेतावनी प्रणालियां हाथियों की गतिविधियों की निगरानी में उपयोगी साबित हो सकती हैं। किसी झुंड की दिशा और संभावित आवाजाही की जानकारी समय रहते मिल जाए तो संवेदनशील गांवों को पहले से सतर्क किया जा सकता है।

लेकिन तकनीक अकेले समाधान नहीं है। स्थानीय लोगों का अनुभव, वनकर्मियों की क्षेत्रीय जानकारी और आधुनिक निगरानी प्रणालियों का संयोजन ही अधिक प्रभावी संरक्षण मॉडल तैयार कर सकता है।

संरक्षण की सफलता का पैमाना क्या हो?

विश्व हाथी दिवस का सबसे बड़ा संदेश यही है कि संरक्षण का अर्थ केवल हाथियों की संख्या बढ़ाना नहीं है। असली चुनौती ऐसे प्राकृतिक परिदृश्य को सुरक्षित रखना है जहां हाथी अपने पारंपरिक मार्गों पर स्वतंत्र रूप से विचरण कर सकें, उन्हें पर्याप्त भोजन और पानी मिल सके और ग्रामीण समुदायों की सुरक्षा तथा आजीविका भी सुनिश्चित हो।

हाथियों के लिए जंगल बचाना, गलियारे बचाना और जलस्रोत बचाना—दरअसल उसी प्राकृतिक तंत्र को बचाना है जिस पर मनुष्य भी निर्भर है। आने वाले वर्षों में भारत में हाथी संरक्षण की सफलता इस बात से तय होगी कि विकास परियोजनाओं और वन्यजीवों के प्राकृतिक अधिकारों के बीच कितना व्यावहारिक संतुलन स्थापित किया जाता है।

विश्व हाथी दिवस इसलिए केवल हाथियों को याद करने का दिन नहीं, बल्कि यह तय करने का अवसर है कि जंगलों के इन प्रहरी जीवों के लिए हम कितनी जगह बचा पा रहे हैं।

आइए,हाथियों और उनके प्राकृतिक आवासों के संरक्षण के प्रति अपनी जिम्मेदारी निभाएं और प्रकृति के संतुलन को बनाए रखने में योगदान दें।

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Gopal Krishna Naik

Editor in Chief Naik News Agency Group

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