खरसिया की तमीज़ और तहज़ीब पर सवाल नहीं,संदेश साफ है—‘हुजूर,शब्दों के साथ मर्यादा भी रखिए’

खरसिया।खरसिया सिर्फ एक नगर नहीं,बल्कि अपनी तमीज़,तहज़ीब, अपनत्व और सामाजिक सौहार्द के लिए पहचाना जाने वाला आपके और मेरे सपनों का नगर है। यहां असहमति की अपनी जगह है,सवाल पूछने की परंपरा भी है और व्यवस्था पर मुखर होकर बात रखने का अधिकार भी—लेकिन इन सबके बीच भाषा और व्यवहार की मर्यादा को हमेशा महत्व दिया जाता रहा है।
इन्हीं भावनाओं के बीच अब एक संदेश सोशल मीडिया पर चर्चा का विषय बन रहा है—“लिख रहे हैं आपके और मेरे खरसिया के लिए,तो ज़रा तमीज़ और तहज़ीब का ख्याल रखिएगा हुजूर।”
यह महज एक वाक्य नहीं,बल्कि खरसिया की सामाजिक पहचान की ओर इशारा करता हुआ संदेश है। धरम नगरी की समस्याओं,प्रशासनिक व्यवस्थाओं,राजनीतिक गतिविधियों अथवा सार्वजनिक मुद्दों पर सवाल उठाना लोकतांत्रिक व्यवस्था का हिस्सा है। लेकिन सवाल कितना भी तीखा क्यों न हो,उसकी भाषा में शालीनता और तथ्यों में विश्वसनीयता बनी रहना जरूरी है।
धरम नगरी के नागरिकों की अपेक्षा यही है कि नगर की आलोचना हो तो तथ्यों के आधार पर हो,सवाल हों तो जनहित में हों और शब्द ऐसे हों जिनसे धरम नगरी की गरिमा प्रभावित न हो। व्यक्तिगत टिप्पणी, अनावश्यक कटाक्ष या अपमानजनक भाषा किसी भी मुद्दे को मजबूत नहीं करती,बल्कि मूल सवाल को ही कमजोर कर देती है।
दरअसल,किसी नगर की पहचान केवल उसकी इमारतों,बाजारों और सड़कों से नहीं बनती। वहां के लोगों का व्यवहार, संवाद की संस्कृति और एक-दूसरे के प्रति सम्मान भी उसकी पहचान गढ़ता है। इस लिहाज से खरसिया की तमीज़ और तहज़ीब को बनाए रखना केवल किसी एक व्यक्ति की नहीं,बल्कि पूरे धरम नगरी की सामूहिक जिम्मेदारी है।
इसलिए हुजूर,आपके और मेरे सपनों के खरसिया पर लिखिए जरूर—बेबाक लिखिए,सवाल भी पूछिए,व्यवस्था को आईना भी दिखाइए; मगर इतना जरूर याद रखिए कि जिस नगर के लिए लिख रहे हैं, उसकी तहज़ीब भी आपके शब्दों में दिखाई देनी चाहिए।




