सड़क की उम्मीद और सरकारी फाइलों का सच:आरटीआई ने खोला विकास के इंतजार का पन्ना

पूछो तो ज़रा सरकार,कब जारी होगी,भालूनारा–राबर्टसन सड़क की राशि,
उम्मीद की राह तकते-तकते,अब राह भी सवाल करने लगी है।
खरसिया। सुदूर गांवों की पगडंडियों से लेकर विकास के सरकारी नक्शों तक, सड़क केवल डामर और गिट्टी की एक पट्टी नहीं होती—वह गांव की उम्मीद, किसान की पहुंच,विद्यार्थियों की राह और मरीज की जिंदगी से जुड़ी एक बुनियादी जरूरत होती है। लेकिन जब वर्षों से प्रतीक्षित सड़क का प्रस्ताव सरकारी फाइलों में घूमता रहे और बजट की पंक्तियों में आकर फिर मिट जाए, तब सवाल केवल सड़क का नहीं रह जाता; सवाल यह भी होता है कि विकास की प्राथमिकताओं में गांव आखिर किस पायदान पर खड़ा है?
रायगढ़ जिले के खरसिया क्षेत्र में राबर्टसन,डुमरपाली–भालुनारा मार्ग से जुड़े लगभग 07.50 किलोमीटर के सड़क निर्माण का मामला अब सूचना के अधिकार के जरिए सामने आया है। दस्तावेज बताते हैं कि ग्राम बड़े डुमरपाली,तहसील खरसिया निवासी नवीन दर्शन ने लोक निर्माण विभाग से संबंधित लंबित फाइलों और नोटशीट की प्रमाणित प्रतियां मांगी थीं। जानकारी उपलब्ध नहीं कराए जाने पर उन्होंने सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 की धारा 19(1) के तहत अपील की।
10अगस्त 2026 के अपीलीय आदेश में लोक निर्माण विभाग,बिलासपुर मंडल के अपीलीय अधिकारी ने मामले की सुनवाई के बाद संबंधित जनसूचना अधिकारी को निर्देश दिया कि मांगी गई सूचना—विशेषकर संबंधित फाइल/नोटशीट—की प्रमाणित प्रतियां सात दिवस के भीतर नि:शुल्क उपलब्ध कराई जाएं। आदेश में यह भी स्पष्ट किया गया कि सूचना देने के लिए आवेदक से किसी प्रकार का वित्तीय भार न लिया जाए।
यह आदेश इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि आरटीआई यहां महज कागज हासिल करने का माध्यम नहीं रह जाती। वह उस सरकारी प्रक्रिया पर रोशनी डालती है,जिसमें किसी सड़क की जरूरत को प्रस्ताव,बजट,स्वीकृति और निर्माण तक पहुंचना होता है।
दूसरे दस्तावेज में अनुविभागीय अधिकारी, लोक निर्माण विभाग, खरसिया की ओर से जिला पंचायत खरसिया के मुख्य कार्यपालन अधिकारी को भेजे पत्र में बताया गया है कि सुशासन तिहार 2025 के तहत ग्राम नवागांव निवासी रामेश्वर प्रसाद द्वारा भालुनारा से राबर्टसन रेलवे साइडिंग तक सड़क निर्माण की मांग रखी गई थी।

विभागीय पत्र के अनुसार संबंधित मार्ग निर्माण कार्य बजट वर्ष 2023-24 में शामिल था, लेकिन वर्तमान में उसे विलोपित किया जा चुका है।

दस्तावेज में यह भी उल्लेख है कि उक्त मार्ग के निर्माण के लिए ₹26 करोड़ का प्रावधान आगामी बजट में शामिल किए जाने हेतु उच्च कार्यालय को पत्र भेजा गया है। यानी सड़क की मांग कागज से गायब नहीं हुई है, लेकिन उसका रास्ता अभी भी बजट की मंजूरी से होकर गुजरना है।
यहीं से इस पूरे मामले का सबसे संवेदनशील पक्ष सामने आता है।

एक ओर गांव सड़क की प्रतीक्षा में है, दूसरी ओर सरकारी दस्तावेज बता रहे हैं कि प्रस्ताव पहले बजट में था,फिर विलोपित हुआ और अब दोबारा बजट में शामिल कराने का प्रयास किया जा रहा है। ग्रामीणों के लिए यह केवल फाइल की भाषा नहीं है। उनके लिए इसका अर्थ है—कच्ची या जर्जर राह,आवागमन की कठिनाई, बरसात में बढ़ती परेशानी और विकास की गति का थम जाना।
सवाल सड़क से बड़ा है
किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में सड़क निर्माण का निर्णय केवल मांग और घोषणा से पूरा नहीं होता। उसके लिए तकनीकी परीक्षण,प्रशासनिक स्वीकृति, वित्तीय प्रावधान,निविदा और निर्माण जैसी कई प्रक्रियाएं होती हैं। इसलिए किसी प्रस्ताव का बजट से हटना और फिर आगामी बजट में शामिल किए जाने का प्रयास अपने आप में अनियमितता का प्रमाण नहीं है।
लेकिन लोकतंत्र में प्रक्रिया जितनी महत्वपूर्ण है,उसकी पारदर्शिता भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। ग्रामीणों को यह जानने का अधिकार है कि उनकी सड़क का प्रस्ताव कब बना, किस स्तर पर विचार हुआ, किस कारण बजट से हटाया गया, वर्तमान में उसकी स्थिति क्या है और प्रस्तावित ₹26 करोड़ की राशि किस प्रक्रिया के तहत स्वीकृति की प्रतीक्षा में है।
आरटीआई इसी पारदर्शिता का रास्ता खोलती है।
अब निगाह अगले कदम पर
अपीलीय आदेश के बाद संबंधित फाइल और नोटशीट की प्रमाणित प्रतियां सामने आती हैं तो इस पूरे मामले की तस्वीर और स्पष्ट हो सकती है। उससे यह पता चल सकेगा कि सड़क निर्माण प्रस्ताव की वास्तविक स्थिति क्या रही, बजट से विलोपन का कारण क्या था और वर्तमान प्रस्ताव किस स्तर पर लंबित है।
गांव की सड़कें अक्सर सरकारी नक्शे पर कुछ किलोमीटर की रेखा होती हैं, लेकिन ग्रामीण जीवन में वही रेखा स्कूल,अस्पताल,बाजार,रेलवे स्टेशन रोजगार और भविष्य तक पहुंचने का रास्ता बनती है।
इसलिए बड़े डुमरपाली–भालुनारा–राबर्टसन मार्ग का सवाल केवल 07.50 किलोमीटर सड़क का सवाल नहीं है। यह उस भरोसे का सवाल है जो गांव सरकार की फाइलों और घोषणाओं से जोड़ता है।
फाइलें चलती रहें,प्रस्ताव बनते रहें—लेकिन गांव की राह कब बनेगी?
यही वह सवाल है,जिसका जवाब अब कागजों से निकलकर जमीन पर दिखाई देना चाहिए।




