
विधायक उमेश पटेल के प्रयासों के बीच ₹51.60 करोड़ के छह सड़क प्रस्ताव, फाइलों में दौड़ रहा बजट—सड़क पर इंतजार
खरसिया। खरसिया की जनता के लिए सड़कें केवल विकास की तस्वीर नहीं, बल्कि रोजमर्रा की जिंदगी की जरूरत हैं। लेकिन जब कागजों पर सड़क का प्रस्ताव आकार ले, विभागीय स्तर पर उसे आगे बढ़ाया जाए और फिर बजट की राह में वह ठहर जाए, तो सवाल उठना स्वाभाविक है—आखिर विकास की इस राह में रोड़ा कौन है?

लोक निर्माण विभाग, रायगढ़ संभाग के उपलब्ध दस्तावेज में खरसिया क्षेत्र की छह ग्रामीण सड़कों को वर्ष 2025-26 के प्रथम अनुपूरक बजट में शामिल करने के लिए प्रस्तावित किया गया था। इन छह कार्यों की कुल अनुमानित लागत ₹5,160 लाख यानी करीब ₹51.60 करोड़ दर्ज है। प्रस्ताव में वर्ष 2025-26 के लिए ₹510 लाख की मांग भी दर्ज है।
प्रस्तावित कार्यों में सोनबरसा से कलमी मार्ग 4.50 किलोमीटर, नवागांव से राजघट्टा मार्ग 2 किलोमीटर, राबर्टसन-डुमरपाली-भालुनारा मार्ग 7.50 किलोमीटर, सिंघनपुर से बरभौना-चंद्रशेखरपुर एप्रोच सड़क मार्ग 22.30 किलोमीटर,गोरपार से खड़गांव मार्ग 2.10 किलोमीटर(भूमि पूजन कर आधाअधुरा)और सोनबरसा पहुंच मार्ग 1.50 किलोमीटर शामिल हैं। दस्तावेज में इन सभी को ग्रामीण मार्ग के रूप में दर्ज किया गया है।
विधायक के प्रयास,फिर भी बजट की राह क्यों कठिन?
दस्तावेजों में इन प्रस्तावों के सामने खरसिया विधायक उमेश पटेल का नाम दर्ज है।

वहीं, 2025 में जर्जर सड़क को लेकर खरसिया क्षेत्र में ग्रामीणों के साथ विधायक उमेश पटेल के आंदोलन में शामिल होने की सार्वजनिक रिपोर्ट भी सामने आई थी।

उस समय ग्रामीणों ने भारी वाहनों के आवागमन से सड़क की बदहाली और स्कूली बच्चों सहित आम लोगों की परेशानी का मुद्दा उठाया था।
ऐसे में क्षेत्र के लोगों का सवाल है कि जब सड़क की मांग जमीन से उठी, विधायक स्तर पर प्रयास हुए और विभागीय फाइलों में प्रस्ताव तैयार होकर आगे बढ़ा, तो बजट की वास्तविक स्वीकृति और राशि जारी होने की प्रक्रिया आखिर किस मोड़ पर अटक गई?
यानी फाइल में सड़क निर्माण की पूरी तस्वीर कई वर्षों में पूरी होने वाली योजना के रूप में दिखाई देती है। लेकिन जनता के लिए सवाल योजना की अवधि से ज्यादा काम शुरू होने की तारीख का है।
बरसात के दिनों में सड़क की हालत और खराब होने पर यही रास्ते स्कूल जाने वाले बच्चों, किसानों, मजदूरों और रोजाना आवागमन करने वाले लोगों के लिए परेशानी का कारण बनते हैं। सड़क की मांग केवल राजनीतिक घोषणा नहीं, बल्कि स्थानीय जीवन की जरूरत बन चुकी है।
“किसकी कुदृष्टि?”—जनता के बीच उठता राजनीतिक सवाल

अब स्थानीय स्तर पर यह सवाल भी उठने लगा है कि क्या खरसिया के विकास कार्यों पर किसी की कुदृष्टि लग गई है? क्या राजनीतिक खींचतान के कारण जनता से जुड़े प्रस्ताव प्रभावित हो रहे हैं? या फिर मामला पूरी तरह विभागीय बजट प्रक्रिया और शासन के नियमों से जुड़ा हुआ है?
इन सवालों का उत्तर बिना आधिकारिक स्पष्टीकरण के किसी व्यक्ति या संस्था पर आरोप लगाकर नहीं दिया जा सकता। लेकिन इतना जरूर है कि दस्तावेज सामने आने के बाद जवाबदेही का सवाल अब टाला नहीं जा सकता।
यदि प्रस्ताव नियमों के अनुरूप है तो बजट में उसकी स्थिति क्या है? यदि प्रस्ताव में कोई तकनीकी या वित्तीय कमी है तो उसे दूर करने के लिए क्या कार्रवाई हुई? और यदि अनुपूरक बजट में इसे शामिल करना संभव नहीं था, तो संबंधित सड़कों को मुख्य बजट में शामिल करने की प्रक्रिया क्या है?
अब सवाल सिर्फ नेताओं के नहीं, बच्चों के भी हैं
इस पूरे घटनाक्रम का सबसे संवेदनशील पक्ष यह है कि सड़क की समस्या अब जनप्रतिनिधियों के भाषणों से निकलकर स्कूल जाने वाले बच्चों के सवालों तक पहुंच रही है।
जिस रास्ते से छात्राएं रोज स्कूल जाती हैं, यदि वही रास्ता जर्जर हो, बरसात में कीचड़ और गड्ढों से भर जाए तथा भारी वाहनों के बीच उनका आवागमन जोखिमपूर्ण हो, तो विकास का अर्थ उनके लिए फाइल नहीं, सुरक्षित रास्ता होता है।
आज सवाल स्कूली छात्राओं की जुबान पर है—हमारे रास्ते कब बनेंगे? हमारी परेशानी कब खत्म होगी? हमारी पढ़ाई और सुरक्षा की जिम्मेदारी किसकी है?

यह सवाल किसी एक दल या सरकार के खिलाफ नहीं,बल्कि उस व्यवस्था के सामने है जो कागज पर सड़क को मंजूरी की ओर ले जाती है, मगर जमीन पर सड़क बनने में वर्षों लगा देती है।
जनता के पास अब सवाल है,जवाब किसके पास?
खरसिया की जनता ने सड़क के लिए मांग रखी। विभागीय दस्तावेज में छह कार्यों का प्रस्ताव सामने आया। करोड़ों रुपये की अनुमानित लागत दर्ज हुई। जनप्रतिनिधि स्तर पर भी सड़क के मुद्दे उठे। इसके बावजूद यदि बजट और राशि जारी होने की प्रक्रिया अब भी अधूरी है,तो जिम्मेदार विभागों को स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए।
खरसिया की जनता सब देख रही है—फाइल किस टेबल से किस टेबल तक पहुंची,प्रस्ताव कहां रुका और बजट की राह में कौन-सी बाधा है।
लोकतंत्र में जनता का जवाब हमेशा चुनाव के दिन ही नहीं आता। कभी-कभी वह सड़क के गड्ढों में दिखाई देता है,कभी स्कूल जाती छात्राओं के सवालों में सुनाई देता है और कभी उस खामोशी में,जो लंबे इंतजार के बाद धीरे-धीरे सवाल में बदल जाती है।

अब खरसिया की जनता जवाब चाहती है—₹51.60 करोड़ की प्रस्तावित छह सड़कों का बजट आखिर कब आएगा,निर्माण कब शुरू होगा और जनता को इस इंतजार से मुक्ति कब मिलेगी?




