
पांच दिनों के धरने के बाद बनी सहमति,विधायक उमेश पटेल की मौजूदगी में प्रशासन को लिखित आश्वासन; ग्रामीणों ने कहा—अब बात नहीं,सड़क चाहिए…
खरसिया। नवागांव में बदहाल सड़क को लेकर पिछले कई दिनों से चल रहा ग्रामीणों का आंदोलन आखिरकार लिखित आश्वासन और त्रिपक्षीय सहमति के बाद फिलहाल स्थगित हो गया है।
सड़क की दुर्दशा से परेशान ग्रामीणों ने लगातार पांच दिनों तक धरना देकर प्रशासन के सामने अपनी पीड़ा और नाराजगी रखी।

आंदोलन के दौरान ग्रामीणों की एकजुटता ने यह स्पष्ट कर दिया कि सड़क अब केवल आवागमन का साधन नहीं,बल्कि क्षेत्रवासियों की सुरक्षा, सम्मान और रोजमर्रा के जीवन से जुड़ा बुनियादी सवाल बन चुकी है।

आदोलन स्थल से ग्रामीणजनों ने विधायक पटेल को अवगत कराया कि रायगढ़ जिला पुलिस दल बल के साथ आंदोलन स्थल पहुंचे है की सूचना पर खरसिया विधायक उमेश नंदकुमार पटेल की मौजूदगी में ग्रामीणों,जनप्रतिनिधियों और प्रशासन के बीच चर्चा हुई।

लंबी बातचीत के बाद लिखित आश्वासन सामने आया,जिसके आधार पर ग्रामीणों ने अपना आंदोलन कुछ समय के लिए स्थगित करने पर सहमति जताई। लिखित दस्तावेज में सड़क निर्माण और गड्ढों की समस्या को लेकर प्रशासन के समक्ष स्पष्ट अपेक्षा दर्ज की गई है।दस्तावेज पर विधायक उमेश पटेल,सरपंच,ग्रामीणजनों की सहमति के साथ अनुविभागिय अधिकारी राजस्व प्रवीण भगत,अनुविभागिय अधिकारी पुलिस सतीश भार्गव,प्रशासनिक अधिकारी के हस्ताक्षर और मुहर भी दिखाई दे रही है। यही लिखित आश्वासन अब पूरे मामले की अगली कसौटी बन गया है।
आश्वासन से आगे—अब जमीन पर दिखना चाहिए काम

ग्रामीणों की मांग का मूल स्वर बेहद स्पष्ट है—उन्हें आश्वासन नहीं,सड़क चाहिए। लंबे समय से खराब सड़क के कारण ग्रामीणों को आवागमन में परेशानी,वाहनों को नुकसान और दुर्घटना की आशंका का सामना करना पड़ रहा है। बारिश के दौरान सड़क की स्थिति और अधिक गंभीर हो जाने से समस्या केवल असुविधा तक सीमित नहीं रहती, बल्कि ग्रामीणों की सुरक्षा से भी जुड़ जाती है।

धरने के दौरान ग्रामीणों ने जिस धैर्य और अनुशासन के साथ अपनी मांग रखी,वह इस आंदोलन की सबसे महत्वपूर्ण विशेषताओं में रहा। पांच दिनों तक चले धरने के बावजूद ग्रामीणों की मांग में कोई अस्पष्टता नहीं रही—सड़क की वास्तविक मरम्मत और निर्माण कार्य जमीन पर दिखाई देना चाहिए।
विधायक उमेश पटेल की मौजूदगी से बनी सहमति

विधायक उमेश पटेल का आंदोलन स्थल पर पहुंचना और ग्रामीणों के बीच बैठकर प्रशासनिक अधिकारियों के साथ बातचीत करना इस पूरे घटनाक्रम का महत्वपूर्ण पक्ष रहा। जनप्रतिनिधि की मौजूदगी में लिखित सहमति बनने के बाद ग्रामीणों ने आंदोलन स्थगित किया।
यह स्थिति जनप्रतिनिधित्व की उस भूमिका को भी रेखांकित करती है, जिसमें जनता और प्रशासन के बीच संवाद का सेतु बनना आवश्यक होता है। हालांकि अब इस सहमति की वास्तविक सफलता कागज पर नहीं, बल्कि सड़क पर दिखाई देने वाले काम से तय होगी।
प्रशासन ने शुरू किया गड्ढों की मरम्मत
लिखित समझौते के बाद सड़क के गड्ढों की तत्काल मरम्मत का काम शुरू किया जाना ग्रामीणों के लिए राहत की पहली तस्वीर बनी है। अनुविभागीय अधिकारी राजस्व प्रवीण भगत,अनुविभागिय अधिकारी पुलिस सतीश भार्गव,प्रभारी तहसीलदार उज्जवल पाण्डेय,खरसिया थाना प्रभारी सीताराम ध्रुव,चौकी प्रभारी त्रिनाथ त्रिपाठी थाना,चौकी के बल साथ जिला बल से आरक्षक द्वारा मौके पर खड़े होकर सड़क के गड्ढों की मरम्मत शुरू कराया जाना यह संकेत देता है कि आंदोलन के दबाव के बाद प्रशासन ने तत्कालिक समस्या को गंभीरता से लिया है।

हालांकि ग्रामीणों की नजर अब अस्थायी मरम्मत से आगे की कार्यवाही पर है। उनका सवाल सड़क के स्थायी और गुणवत्तापूर्ण निर्माण को लेकर है। गड्ढे भरना तत्काल राहत दे सकता है, लेकिन लंबे समय से चली आ रही समस्या का स्थायी समाधान सड़क का समुचित निर्माण और रखरखाव ही होगा।
आंदोलन ने प्रशासनिक जवाबदेही का सवाल भी उठाया

नवागांव का यह आंदोलन केवल एक सड़क के गड्ढों की कहानी नहीं है। यह उस व्यापक सवाल को सामने लाता है कि विकास कार्यों के लिए स्वीकृत योजनाएं और प्रशासनिक आश्वासन आखिर जमीन तक कितनी तेजी और प्रभावी ढंग से पहुंचते हैं।

ग्रामीणों ने आंदोलन के माध्यम से यह संदेश दिया है कि लोकतांत्रिक तरीके से अपनी मूलभूत मांगों को लेकर आवाज उठाना जनता का अधिकार है। वहीं प्रशासन के सामने अब चुनौती यह है कि लिखित आश्वासन को समयबद्ध कार्यवाही में बदला जाए,ताकि ग्रामीणों को दोबारा आंदोलन की राह न पकड़नी पड़े।
अब असली परीक्षा तय समय की

लिखित आश्वासन के बाद आंदोलन भले ही स्थगित हो गया हो,लेकिन ग्रामीणों का संघर्ष समाप्त नहीं माना जा सकता। दस्तावेज पर दर्ज आश्वासन अब प्रशासन और संबंधित विभाग के लिए जवाबदेही का आधार बन चुका है।
ग्रामीणों का रुख भी स्पष्ट है—यदि निर्धारित समयसीमा में सड़क निर्माण की दिशा में ठोस कार्यवाही नहीं हुई,तो आंदोलन दोबारा शुरू हो सकता है। इसलिए आने वाले दिन इस पूरे समझौते की विश्वसनीयता तय करेंगे।

नवागांव क्षेत्र के ग्रामीणों ने पांच दिनों तक धरने में बैठकर जिस एकजुटता का परिचय दिया,उसने यह साबित किया कि जब किसी क्षेत्र की बुनियादी समस्या सामूहिक पीड़ा बन जाती है, तो उसकी आवाज को लंबे समय तक अनदेखा करना आसान नहीं होता।
अब ग्रामीणों की निगाहें उस सड़क पर हैं,जहां वे वर्षों से गड्ढों के बीच सफर करने को मजबूर रहे हैं। कागज पर लिखे आश्वासन से आंदोलन जरूर थमा है,लेकिन सड़क पर दिखाई देने वाला निर्माण कार्य ही इस समझौते की असली सफलता होगी।




