
चौथे वर्ष की कांवड़ यात्रा में उमड़ा शिवभक्ति का सैलाब,सावन के तीसरे सोमवार पर कोसमनारा बाबा धाम में हुआ जलाभिषेक
✍गिरीश राठिया @खरसिया। क्षेत्र कि जीवन दायिनी मांड नदी के तट से उठी आस्था की एक बूंद जब कांवड़ में सवार हुई, तो वह केवल जल नहीं रही—वह श्रद्धा,संकल्प और शिवभक्ति की ऐसी धारा बन गई,जिसने दर्रामुड़ा से लेकर कोसमनारा बाबा धाम तक की राह को भक्तिमय कर दिया। सावन मास के तीसरे सोमवार पर चौथे वर्ष आयोजित दर्रामुड़ा–कोसमनारा कांवड़ यात्रा जलाभिषेक के साथ संपन्न हुई। रास्तेभर गूंजते “हर-हर महादेव” के जयघोष और शिवभक्तों की पदचाप ने पूरे मार्ग को मानो शिवमय कर दिया।
मांड नदी से शुरू हुई आस्था की यात्रा
16 अगस्त की शाम ग्राम दर्रामुड़ा से कांवड़ यात्रा का शुभारंभ हुआ। इससे पहले मांड नदी के पवित्र तट पर विधिवत पूजा-अर्चना और मंत्रोच्चारण के बीच कांवड़ में जल भरा गया। शाम करीब पांच बजे भक्ति गीतों और साउंड सिस्टम की मधुर धुनों के बीच शिवभक्तों का जत्था कोसमनारा बाबा धाम के लिए रवाना हुआ।
यह यात्रा केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि ग्रामीण समाज की सामूहिक आस्था और सहभागिता का जीवंत स्वरूप भी बनी। युवा समिति, ग्रामवासियों और क्षेत्रवासियों के सहयोग से निकली यात्रा में श्रद्धालुओं ने पूरे उत्साह और अनुशासन के साथ लंबी पदयात्रा पूरी की।
गांवों और शहर की राह से गुजरता रहा शिवभक्ति का कारवां
दर्रामुड़ा से निकली कांवड़ यात्रा सारडा कंपनी गेट बिंजकोट, गिंडोला, नहरपाली,सिंघनपुर,रामझरना, बिलासपुर, भूपदेवपुर,कुशवाबहरी,केराझर, परसदा,चिराईपानी,पतरापाली (जिंदल), भगवानपुर,ढिमरापुर चौक से कोतरा रोड रायगढ़ ओवरब्रिज होते हुए कोसमनारा बाबा धाम पहुंची।
लंबे मार्ग में जगह-जगह श्रद्धा का स्वागत दिखाई दिया। कांवड़ियों के कदम आगे बढ़ते रहे और उनके साथ शिवनाम की गूंज भी चलती रही। थकान के बीच भी चेहरे पर उत्साह और मन में भोलेनाथ के प्रति अटूट विश्वास दिखाई देता रहा।
तीसरे सोमवार को कोसमनारा में हुआ जलाभिषेक
17 अगस्त की सुबह कांवड़ यात्री कोसमनारा बाबा धाम पहुंचे। सावन के तीसरे सोमवार के अवसर पर यहां पहले से ही श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ी हुई थी। धाम में पहुंचने के बाद सत्यनारायण बाबा जी के सानिध्य में युवाओं और कांवड़ यात्रियों ने शिवलिंग पर मांड नदी से लाए पवित्र जल से जलाभिषेक किया।
जल की प्रत्येक बूंद के साथ मानो यात्रा का संकल्प पूर्ण हुआ। घंटियों की ध्वनि, हर-हर महादेव के जयघोष और श्रद्धालुओं की आस्था से कोसमनारा धाम का वातावरण देर तक भक्तिमय बना रहा।
सेवा ने यात्रा को दिया मानवीय स्पर्श
कांवड़ यात्रा की सफलता केवल कांवड़ियों की पदयात्रा में नहीं, बल्कि रास्तेभर उनके लिए की गई सेवा में भी दिखाई दी। विभिन्न स्थानों पर श्रद्धालुओं के लिए भोजन और जलपान की व्यवस्था की गई। कहीं पूरी-सब्जी, कहीं चाय-बिस्किट,तो कहीं केला और पानी उपलब्ध कराया गया।
यह सेवा-भाव इस बात का प्रमाण रहा कि धार्मिक यात्राएं केवल पूजा और अनुष्ठान तक सीमित नहीं होतीं; वे समाज में सहयोग, संवेदना और सहभागिता की भावना को भी मजबूत करती हैं। यात्रा पूर्ण होने के बाद बाबा धाम से वापस लौटने वाले कांवड़ यात्रियों के लिए वाहनों की व्यवस्था भी की गई।
एक सप्ताह की तैयारी,एक दिन की यात्रा नहीं—सामूहिक संकल्प
चौथे वर्ष की इस कांवड़ यात्रा की तैयारियां करीब एक सप्ताह पहले से शुरू हो गई थीं। यात्रा मार्ग, पूजा-अर्चना, जलपान, भोजन और वापसी की व्यवस्था को लेकर आयोजन समिति एवं ग्रामवासियों ने मिलकर जिम्मेदारियां संभालीं।
पिछले तीन वर्षों से चली आ रही इस परंपरा ने अब एक सामुदायिक धार्मिक आयोजन का स्वरूप ले लिया है। इसकी सबसे बड़ी विशेषता यही रही कि आयोजन किसी एक व्यक्ति का नहीं, बल्कि युवा समिति, ग्रामवासियों और क्षेत्रवासियों की सामूहिक भागीदारी का परिणाम बना।
आस्था की यह परंपरा आगे भी चलती रहे

यात्रा के सफल समापन पर ग्राम दर्रामुड़ा की समस्त युवा समिति, ग्रामवासियों और क्षेत्रवासियों ने कांवड़ यात्रियों तथा सहयोग करने वाले सभी लोगों के प्रति आभार व्यक्त किया। आयोजकों ने भगवान भोलेनाथ से सभी श्रद्धालुओं के जीवन में सुख,शांति और समृद्धि की कामना की तथा अगले वर्ष भी इसी श्रद्धा और उत्साह के साथ कांवड़ यात्रा जारी रखने का संकल्प व्यक्त किया।
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दर्रामुड़ा से कोसमनारा तक चली यह यात्रा एक बार फिर यह संदेश छोड़ गई कि जब आस्था कदमों में उतरती है, तो दूरी छोटी पड़ जाती है। मांड नदी का पवित्र जल कांवड़ में था,लेकिन उसके साथ हजारों भावनाएं चल रही थीं—और कोसमनारा बाबा धाम पहुंचकर वे सभी एक ही स्वर में विलीन हो गईं—हर-हर महादेव।



