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कार्यकर्ता के सम्मान की लड़ाई में सत्ता-शासन से भिड़े,विधायक उमेश पटेल,12 घंटे थाने के बाहर डटे रहे समर्थक…

खरसिया@राम शर्मा की कलम से

खरसिया। राजनीति में पद,सत्ता और संगठन का अपना महत्व है,लेकिन लोकतंत्र में किसी जनप्रतिनिधी की वास्तविक पहचान इस बात से होती है कि वह अपने क्षेत्र की जनता और कार्यकर्ताओं के सुख-दुःख में कितनी मजबूती से खड़ा रहता है। खरसिया विधानसभा की राजनीति में कांग्रेस के लंबे जनाधार के पीछे भी यही जनसरोकार और कार्यकर्ताओं से जुड़ाव एक महत्वपूर्ण कारण माना जाता रहा है।

खरसिया विधानसभा क्षेत्र के ग्राम तारापुर के उपसरपंच राजु डनसेना और घनश्याम को पुलिस द्वारा कथित रूप से परिजनों को सूचना दिए बिना ले जाए जाने की घटना के बाद क्षेत्र की राजनीति अचानक गरमा गई। मामले की जानकारी मिलने पर खरसिया विधायक उमेश पटेल अपने समर्थकों और कांग्रेस कार्यकर्ताओं के साथ कोतरा रोड थाना पहुंचे थाना प्रभारी से पूरी जानकारी लेने पश्चात अविश्वास प्रस्ताव के बातों को लेकर सरपंच द्वारा अनर्गल आरोप पर ग्रामीणजनों के घेराव का समर्थन करने  वहीं धरने पर बैठ गए।

बताया गया कि विधायक सुबह करीब 11 बजे से रात 11 बजे तक लगभग 12 घंटे थाना परिसर डटे रहे। विधायक पटेल और उनके समर्थकों की मांग थी कि पूरे मामले में निष्पक्ष एवं न्यायपूर्ण कार्यवाही की जाए। देर रात पुलिस विभाग के वरिष्ठ अधिकारियों के साथ बातचीत के बाद कार्यवाही को लेकर सहमति बनने पर धरना स्थगित किया गया।

इस घटनाक्रम ने एक बार फिर खरसिया की राजनीति में नेता और कार्यकर्ता के रिश्ते को चर्चा के केंद्र में ला दिया है। समर्थकों का कहना है कि आज की राजनीति में जब सत्ता और पद को अक्सर प्राथमिकता मिलती दिखाई देती है,ऐसे समय में अपने कार्यकर्ता के लिए घंटों धरने पर बैठना राजनीतिक संदेश से कहीं अधिक व्यक्तिगत प्रतिबद्धता का संकेत है।

खरसिया विधानसभा को लंबे समय से कांग्रेस का मजबूत राजनीतिक आधार माना जाता है। नंदेली हाउस का प्रभाव इस क्षेत्र की राजनीति में दशकों से चर्चा का विषय रहा है। इस प्रभाव के पीछे केवल चुनावी समीकरण नहीं,बल्कि जनता से निरंतर संपर्क,स्थानीय मुद्दों पर सक्रियता और कार्यकर्ताओं के साथ संबंधों को भी महत्वपूर्ण कारक माना जाता है।

तारापुर मामलें में विधायक उमेश पटेल का रुख इसी राजनीतिक परंपरा की एक और तस्वीर के रूप में सामने आया है। एक जनप्रतिनिधि का थाने पहुंचना,12 घंटे तक धरने पर डटे रहना यह बताता है कि मामला उनके लिए राजनीतिक औपचारिकता से आगे बढ़कर कार्यकर्ता के सम्मान और अधिकार का प्रश्न बन गया था।

हालांकि,पूरे प्रकरण में पुलिस की कार्यवाही के कारणों और कानूनी प्रक्रिया को लेकर प्रशासन का पक्ष भी उतना ही महत्वपूर्ण है। किसी भी गिरफ्तारी या हिरासत की वैधानिकता का अंतिम आकलन उपलब्ध दस्तावेजों, पुलिस के आधिकारिक पक्ष और न्यायिक प्रक्रिया के आधार पर ही किया जाना चाहिए। राजनीतिक आरोप और प्रशासनिक कार्यवाही —दोनों को तथ्यों की कसौटी पर परखा जाना लोकतांत्रिक व्यवस्था की आवश्यकता है।

फिर भी, इस घटनाक्रम ने खरसिया की राजनीति का एक अहम पक्ष सामने रखा है—कार्यकर्ता को केवल चुनावी समय का साधन मानने और उसे राजनीतिक परिवार का हिस्सा मानकर उसके साथ खड़े होने के बीच का अंतर। विधायक उमेश पटेल के समर्थक इसी दूसरे मॉडल को उनकी राजनीति की पहचान के रूप में प्रस्तुत कर रहे हैं।

आने वाले दिनों में तारापुर मामले की जांच और पुलिस की कार्यवाही यह तय करेगी कि विवाद किस दिशा में आगे बढ़ता है। लेकिन इतना स्पष्ट है कि थाना परिसर में 12 घंटे चला यह धरना खरसिया की राजनीति में कार्यकर्ता के सम्मान,प्रशासनिक जवाबदेही और जनप्रतिनिधी की भूमिका को लेकर एक नई बहस जरूर छोड़ गया है।

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Gopal Krishna Naik

Editor in Chief Naik News Agency Group

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