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आश्वासन नहीं,अब सड़क चाहिए:धरना स्थल पर उमेश पटेल की दो टूक,कल प्रवीण भगत SDM क्या लेकर आते हैं—नजरें टिकीं

दूध का जला छाछ भी फूंक-फूंक कर पीता है

खरसिया। भालुनारा से राबर्टसन सड़क की बदहाली को लेकर नवागांव में जारी ग्रामीणों के धरना-प्रदर्शन ने अब उस मोड़ को छू लिया है,जहां वर्षों की परेशानी और बार-बार के आश्वासनों के बीच ग्रामीणों ने साफ शब्दों में कह दिया है—अब आश्वासन नहीं,सड़क चाहिए। पेंचवर्क नहीं,पूरी सड़क चाहिए।

आज खरसिया विधायक उमेश पटेल स्वयं धरना स्थल पहुंचे। अस्वस्थता के बावजूद उन्होंने ग्रामीणों के साथ खुले मंच पर रिमझीम फूहारो के बीच घंटों जमीन पर बैठकर उनकी बात सुनी। जनप्रतिनिधि के इस सहज व्यवहार और ग्रामीणों के बीच जमीन पर बैठकर संवाद करने की तस्वीर ने यह संदेश जरूर दिया कि जनप्रतिनिधित्व केवल कुर्सी तक सीमित नहीं,बल्कि जनता के बीच बैठकर उसकी पीड़ा सुनने का नाम भी है।

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इसी दौरान अनुविभागीय अधिकारी राजस्व खरसिया प्रवीण भगत और अनुविभागीय अधिकारी पुलिस खरसिया सतीश भार्गव भी धरना स्थल ढ़लती शाम को पहुंचे। विधायक उमेश पटेल और एसडीएम प्रवीण भगत के बीच ग्रामीणों की मौजूदगी में खुले मंच पर सड़क को लेकर सीधी बातचीत हुई। चर्चा का केंद्र कोई आरोप-प्रत्यारोप नहीं,बल्कि एक ही सवाल रहा—भालुनारा से राबर्टसन सड़क आखिर कब बनेगी?

विधायक उमेश पटेल ने ग्रामीणों की मांग को स्पष्ट रूप से सामने रखते हुए कहा कि सड़क नई चाहिए। इसके लिए सीएसआर,बजट अथवा किसी अन्य उपलब्ध माध्यम से राशि की व्यवस्था कराई जाए,लेकिन समाधान ठोस होना चाहिए। उन्होंने सड़क निर्माण के नाम पर केवल औपचारिक मरम्मत या पेंचवर्क को पर्याप्त नहीं माना।

ग्रामीणों की नाराजगी के पीछे भी यही अनुभव है। उनका कहना है कि खराब सड़क पर समय-समय पर मरम्मत के नाम पर पेंचवर्क होता रहा,लेकिन समस्या जस की तस बनी रही। बरसात में गड्ढे,कीचड़ और जलभराव तथा भारी वाहनो का आवागमन की कठिनाइयों ने सड़क को महज एक निर्माणाधीन समस्या नहीं,बल्कि रोजमर्रा के जीवन का संकट बना दिया है।

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ग्रामीणों के बीच यह कहावत भी चर्चा में रही—“दूध का जला छाछ भी फूंक-फूंक कर पीता है।” कई आश्वासन सुनते आए ग्रामीण अब किसी मौखिक भरोसे से आगे बढ़कर स्वीकृत राशि,स्पष्ट योजना और समयबद्ध निर्माण की जानकारी चाहते हैं। यही वजह है कि ग्रामीणों की मांग है कि सड़क का समाधान कागजों और आश्वासनों से नहीं,धरातल पर दिखाई देना चाहिए।

वहीं विधायक उमेश पटेल की भूमिका की चर्चा भी ग्रामीणों के बीच सकारात्मक ढंग से हुई। क्षेत्रवासियों का कहना था कि मांग के वक्त जनता के बीच खड़े होना और अस्वस्थता के बावजूद घंटों जमीन पर बैठकर उनकी बात सुनना एक अलग संदेश देता है। सड़क बने तो फीता काटें,नारियल फोड़ें या लोकार्पण करें—ग्रामीणों को इससे परहेज नहीं; लेकिन उससे पहले सड़क का निर्माण होना चाहिए।

चर्चा के दौरान यह भी तय हुआ कि कल दोपहर एक बजे धरना स्थल पर प्रशासन की ओर से सड़क को लेकर स्पष्ट जानकारी खुले मंच पर दी जाएगी। इसमें यह बताया जाना अपेक्षित है कि राशि किस मद से आएगी,कितनी राशि उपलब्ध है अथवा प्रस्तावित है और सड़क निर्माण की दिशा में अगला ठोस कदम क्या होगा?

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अब निगाहें कल के सूरज पर हैं। भालुनारा से राबर्टसन सड़क के लिए वह अपने साथ केवल एक और आश्वासन लेकर आता है या फिर राशि, योजना और निर्माण की स्पष्ट राह—यह देखने वाली बात होगी।

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लोकतंत्र में जनता की आवाज तब सार्थक होती है,जब वह सत्ता और प्रशासन के दरवाजे तक पहुंचकर निर्णय की मेज पर जगह बनाती है। नवागांव का यह धरना फिलहाल उसी जनदबाव की कहानी कह रहा है। यहां ग्रामीणों की मांग बहुत बड़ी नहीं है—वे कोई विशेष सुविधा नहीं मांग रहे,वे केवल ऐसी सड़क मांग रहे हैं जिस पर उनका जीवन सुरक्षित और सुगम हो सके।

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और शायद इस पूरे घटनाक्रम का सबसे सरल निष्कर्ष भी यही है—आश्वासन रास्ता नहीं बनाता,सड़क बनती है तो रास्ता बनता है।

तब तक के लिए क़लम को थोड़ा इन्तज़ार…

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Gopal Krishna Naik

Editor in Chief Naik News Agency Group

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