यादों के झरोखे से… एक साल बाद फिर केदारनाथ की राह पर

आप सबके हृदय में विराजमान मेरे महादेव को शत्-शत् साष्टांग प्रणाम,
हर सांस में शिव का नाम रहे, हर कदम पर बरसे भोलेनाथ का आशीर्वाद…
आज की ही तारीख़… बस फर्क इतना है कि एक वर्ष बीत गया है।
लेकिन कुछ यात्राएं कैलेंडर के पन्नों के साथ पुरानी नहीं होतीं। वे मन की स्मृतियों में ऐसी ठहर जाती हैं, जैसे पहाड़ों के बीच कोई घंटी बजकर हमेशा के लिए हवा में घुल गई हो।
आज जब बीते वर्ष की उस यात्रा को यादों के झरोखे से देखता हूं,तो आंखों के सामने सबसे पहले सोनप्रयाग उभरता है—चारों ओर हिमालय की विराटता, पहाड़ों की गोद में बसा वह पड़ाव और मन में एक ही पुकार—बाबा केदार के दर्शन।
साथ थे अपने लोग—
गेंद लाल श्रीवास,वासु श्रीवास, कृष्ण कुमार पटेल और मुकेश डनसेना; श्रीमती मंजु पटेल,कृष्णा पटेल एवं श्रीमती बुंद कुंवर पटेल;आशीष पटेल,भानु पटेल एवं श्रीमती सुकान्ती पटेल; कमलेश पटेल, श्रीमती शारदा पटेल एवं हेमन्त पटेल…

रिश्ते भले गांवों के नाम से जुड़े थे, लेकिन उस यात्रा में हम सबके बीच एक ही रिश्ता था—बाबा केदार की राह के सहयात्री होने का।
वह उड़ान… जिसमें आसमान से ज्यादा धड़कता था दिल
सोनप्रयाग से उस दिन गेंद लाल श्रीवास और देहाती, पवन हंस हेलीकॉप्टर से केदारनाथ की ओर रवाना हुए।

हेलीकॉप्टर के पंखों ने जैसे ही फाटा की धरती छोड़ी,दिल की धड़कनों ने कुछ पल के लिए अपनी गति बदल ली।
एक ओर बाबा के दर्शन की उत्कंठा थी, दूसरी ओर मन के किसी कोने में कई हेलीकॉप्टर हादसों की स्मृतियां भी दस्तक दे रही थीं।
भक्ति अपने स्थान पर थी और जीवन की अनिश्चितता अपने स्थान पर…
नीचे गहरी घाटियां थीं… ऊपर खुला आकाश… और बीच में हम।
कभी लगता—हम उड़ नहीं रहे, बल्कि हिमालय हमें अपनी गोद में लेकर शिवधाम की ओर ले जा रहा है।
बादलों की सफेद चादर के बीच से झांकती पर्वत श्रृंखलाएं, दूर-दूर तक फैली हरियाली और चट्टानों पर अडिग खड़ा हिमालय—उस दृश्य को शब्दों में बांधना शायद हिमालय के साथ अन्याय होगा।
वह कुछ क्षण ऐसे थे, जिन्हें आंखों ने देखा, दिल ने महसूस किया और स्मृतियों ने हमेशा के लिए संभाल लिया।
और उधर… अपने लोग पहाड़ों से संवाद करते हुए

हमारी उड़ान अपनी मंजिल की ओर बढ़ रही थी, वहीं हमारे अन्य साथी सोनप्रयाग से गौरीकुंड होते हुए पैदल और घोड़े की यात्रा पर निकल पड़े थे।
किसी के कदम तेज थे, किसी की चाल धीमी।
कहीं सांसें फूल रही थीं, कहीं पैर थक रहे थे।
लेकिन फिर किसी साथी की एक हंसी पूरे समूह की थकान हर लेती।
पहाड़ चढ़ते हुए हम केवल ऊंचाई नहीं नाप रहे थे, हम अपने भीतर की हिम्मत भी नाप रहे थे।
कभी किसी का मजाक,कभी किसी की चुटकी,कभी रास्ते की कोई छोटी-सी घटना और फिर ठहाका…
सच कहूं तो उस कठिन चढ़ाई में हमारी हंसी ही हमारी सबसे बड़ी ऊर्जा थी।
ऐसा लगता था मानो जिंदगी कह रही हो—
“रास्ता कठिन है तो क्या हुआ,
साथ अपने हों तो सफर खूबसूरत हो जाता है।”
जीवन और मृत्यु के बीच… मुस्कुराता हुआ सफर
केदारनाथ की राह केवल रास्ता नहीं है।
वह मनुष्य को उसकी सीमाओं से परिचित कराने वाली एक यात्रा है।

एक ओर खड़ी पहाड़ियां,दूसरी ओर गहरी खाइयां; कहीं तेज बहती मंदाकिनी, कहीं पथरीली चढ़ाई और कहीं प्रकृति की ऐसी अनुपम छटा कि कदम अपने आप रुक जाएं।
कभी-कभी मन में यह विचार भी आता था कि मनुष्य कितना छोटा है और प्रकृति कितनी विराट।
फिर अगले ही क्षण कोई साथी आवाज देता—
“चलो भाई… बाबा बुला रहे हैं!”
और हम फिर चल पड़ते।
यही तो उस यात्रा की खूबसूरती थी—
जीवन और मृत्यु से गलबहियां करते हुए भी चेहरे पर मुस्कान थी।
फिर आया वह क्षण… जब शब्द मौन हो गए
और आखिरकार वह घड़ी आई, जिसका इंतजार आंखें कर रही थीं और जिसके लिए कदम इतनी दूर तक चले थे।
केदारनाथ
बाबा केदार की धरती पर कदम रखते ही भीतर कुछ बदल-सा गया।
दिनभर की थकान जैसे किसी ने धीरे से कंधों से उतार ली।
सामने बाबा का धाम था…
आंखों में नमी थी…
हाथ अपने आप जुड़ गए थे…
उस क्षण न कोई शिकायत थी, न कोई प्रश्न।
बस मन में एक ही भाव—
“बाबा… आपने बुलाया, इसलिए हम आ सके।”
मंदिर के सामने खड़े होकर लगा कि हम बाबा के दर्शन करने नहीं आए हैं;
शायद बाबा ने ही हमें अपने दरबार में बुलाकर हमारी उपस्थिति स्वीकार की है।

उस क्षण की अनुभूति आज भी भीतर कहीं वैसी ही ताजा है।
व्हाइट हाउस की वह ठिठुरती रात
दर्शन के बाद रात्रि विश्राम केदारनाथ के व्हाइट हाउस में हुआ।

बाहर पहाड़ों की कड़कड़ाती ठंड थी।
हवा जैसे हड्डियों तक उतर रही थी।
लेकिन कमरे के भीतर हम सब थे—यात्रा की थकान के साथ, दिनभर की स्मृतियों के साथ और बाबा के दर्शन की संतुष्टि के साथ।
किसी के पास यात्रा की कोई कहानी थी, किसी के पास कोई मजेदार प्रसंग।
ठिठुरती रात थी, लेकिन बातचीत में गर्माहट थी।
उस रात नींद शायद कम आई होगी, मगर सुकून बहुत गहरा था।
बाहर हिमालय मौन खड़ा था और भीतर हम उस दिन को अपनी-अपनी स्मृतियों में सहेज रहे थे।
किसे पता था कि अगले वर्ष यही रात हमें इतनी दूर से पुकारेगी…
एक वर्ष बाद…
आज एक वर्ष बीत गया।
साथी अपने-अपने गांवों में हैं।
जिंदगी फिर अपनी रोजमर्रा की रफ्तार में लौट आई है।
लेकिन मन का एक हिस्सा आज भी वहीं है—
सोनप्रयाग की उस सुबह में,
हेलीकॉप्टर की उस उड़ान में,
गौरीकुंड की उस राह में,
मंदाकिनी की उस आवाज में,
केदारनाथ की उस ठंडी हवा में
और बाबा के उस दरबार में…
समय बहुत कुछ भुला देता है,
लेकिन कुछ यात्राएं समय की पकड़ से बाहर होती हैं।
केदारनाथ की वह यात्रा भी ऐसी ही थी।
वह सिर्फ चारधाम यात्रा का एक पड़ाव नहीं था।
वह दोस्ती का सफर था।
साथ का सफर था।
हंसी का सफर था।
थकान का सफर था।
जोखिम के बीच विश्वास का सफर था।
और सबसे बढ़कर—बाबा के बुलावे का सफर था।
आज पीछे मुड़कर देखता हूं तो मन कहता है—
हम उस दिन पहाड़ चढ़कर केदारनाथ नहीं पहुंचे थे,
शायद बाबा ने अपनी कृपा से हमें अपने तक पहुंचाया था।
और इसलिए उस यात्रा की सबसे खूबसूरत तस्वीर कैमरे में नहीं,
हम सबके दिलों में कैद है।

कुछ रास्ते पैरों से तय होते हैं,
कुछ रास्ते स्मृतियों से…
और कुछ रास्ते सीधे हृदय तक पहुंचते हैं।

✍ बाबा केदारनाथ की वह राह
आज भी मेरे भीतर चल रही है…
हर हर महादेव।
जय बाबा केदार।




