खड़गांव–गोरपार को DMF राशि, भालुनारा–राबर्टसन अब भी इंतजार में—दस्तावेजों ने खड़े किए कई सवाल…

खरसिया। सड़क विकास के नाम पर सामने आए दस्तावेजों ने खरसिया क्षेत्र में एक नया सवाल खड़ा कर दिया है—जब खड़गांव से गोरपार बस्ती सड़क के लिए राशि और निर्माण की प्रक्रिया आगे बढ़ सकती है,तो भालुनारा से राबर्टसन सड़क के मामले में DMF,बजट का रास्ता आखिर क्यों नहीं खुल रहा?
मामला इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि सोशल मिडिया में वायरल दस्तावेजों में खड़गांव–गोरपार बस्ती सड़क को लेकर अलग-अलग चरणों की तस्वीर सामने आती है। 29 अप्रैल 2025 के लोक निर्माण विभाग,रायगढ़ संभाग के पत्र में गोरपार से खड़गांव मार्ग की लंबाई 2.10 किलोमीटर और अनुमानित लागत 200.50 लाख रुपये दर्शाते हुए इसे वर्ष 2025-26 के प्रथम अनुपूरक बजट में शामिल करने के लिए प्रस्तावित किया गया था। बाद के भूमि-पूजन शिलालेख में इसी मार्ग की लंबाई 2.00 किलोमीटर और लागत 151.38 लाख रुपये दर्ज है तथा इसे डीएमएफ मद से स्वीकृत सड़क का भूमि पूजन ठेकेदार सुनील राम दास LLP चांदनी चौक रायगढ़ …
यहीं से सवाल और गहरा जाता है—एक ही सड़क के नाम,लंबाई,मद और लागत के अलग-अलग चरणों की आधिकारिक तस्वीर सामने आ रही है,तो पूरी प्रक्रिया की स्पष्टता जनता के सामने क्यों नहीं रखी जा रही?
13 नवंबर के आंदोलन से 21 मार्च के भूमि-पूजन तक

सोशल मिडिया में वायरल जिला पंचायत अध्यक्ष श्रीमती शिखा रविन्द्र गबेल के लेटरहेड पर जारी पत्र में ग्रामीणों की समस्याओं को लेकर 13 नवंबर 2025 को हुए धरना-प्रदर्शन का उल्लेख है। पत्र में कहा गया है कि प्रशासन ने सड़क निर्माण कार्य 15 दिनों के भीतर प्रारंभ कराने का आश्वासन दिया था,लेकिन निर्धारित अवधि बीतने के बाद भी काम शुरू नहीं हुआ। इसके बाद सात दिन के भीतर सड़क निर्माण प्रारंभ नहीं होने पर पुनः धरना-प्रदर्शन और चक्काजाम की चेतावनी दी गई थी?
इसके कुछ महीनों बाद 21 मार्च 2026 को खड़गांव–गोरपार बस्ती सड़क के भूमि-पूजन का शिलालेख सामने आता है। यानी आंदोलन,आश्वासन,विभागीय प्रस्ताव और अंततः भूमि-पूजन—पूरी प्रक्रिया एक क्रम में दिखाई देती है।
लेकिन इसी क्रम में

भालुनारा–राबर्टसन मार्ग का सवाल और अधिक मुखर होकर सामने आता है।
वायरल पत्र ने बढ़ाई शंका,लेकिन सवाल का जवाब अभी बाकी…
सोशल मीडिया में वायरल हो रहे एक पत्र को लेकर भी चर्चा है। पत्र पर जिला पंचायत अध्यक्ष का लेटरहेड दिखाई देता है,लेकिन उसमें तारीख का स्थान रिक्त और क्रमांक ओवर राइटिंग नजर आता है और पत्र पर कार्यालयीन सील को लेकर भी सवाल उठाए जा रहे हैं।
हालांकि केवल लेटरहेड पर तारीख अथवा सील दिखाई नहीं देने के आधार पर दस्तावेज को फर्जी अथवा वास्तविक घोषित करना उचित नहीं होगा। इसकी पुष्टि संबंधित कार्यालय के रिकॉर्ड,डायरी क्रमांक और जारी प्रति से ही हो सकती है।
फिर भी यह सवाल जरूर उठता है कि यदि कोई आधिकारिक पत्र है तो उसकी प्रमाणिक प्रति सार्वजनिक क्यों नहीं की जा रही? और यदि वह अधिकृत पत्र नहीं है तो संबंधित कार्यालय इसकी स्थिति स्पष्ट क्यों नहीं करता?
क्या नाम बदलने से बदली सड़क की किस्मत?

अब चर्चा का सबसे संवेदनशील पहलू है—खड़गांव–गोरपार बस्ती मार्ग के नाम और लंबाई में दिखाई देने वाला अंतर…

29 अप्रैल 2025 के विभागीय प्रस्ताव में मार्ग “गोरपार से खड़गांव मार्ग”, लंबाई 2.10 किमी और लागत 200.50 लाख रुपये है।

वहीं भूमि-पूजन शिलालेख में “खड़गांव से गोरपार बस्ती”, लंबाई 2.00 किमी और लागत 151.38 लाख रुपये दर्ज है।

क्या यह केवल विभागीय पुनरीक्षण, डीपीआर अथवा स्वीकृति प्रक्रिया के दौरान हुआ सामान्य परिवर्तन है? या इसके पीछे कोई अन्य प्रशासनिक कारण है? इसका जवाब लोक निर्माण विभाग और संबंधित स्वीकृति एजेंसी को देना चाहिए।
बिना आधिकारिक रिकॉर्ड के यह कहना कि नाम बदलने का उद्देश्य किसी राजनीतिक श्रेय को रोकना या दिलाना था,अभी आरोप की श्रेणी में होगा। लेकिन दस्तावेजों में आए बदलाव इतने स्पष्ट हैं कि उनकी सार्वजनिक व्याख्या जरूरी हो जाती है।
फिर भालुनारा–राबर्टसन क्यों पीछे?
सबसे बड़ा सवाल यही है।
यदि अनुपूरक बजट में सड़क प्रस्ताव शामिल किए जा सकते हैं,यदि बाद में किसी सड़क को दूसरे मद से राशि उपलब्ध कराकर भूमि-पूजन तक पहुंचाया जा सकता है, तो भालुनारा से राबर्टसन तक प्रस्तावित सड़क के लिए वित्तीय स्वीकृति और राशि जारी होने में अड़चन कहां है?
क्या प्रस्ताव तकनीकी स्तर पर अटका है?
क्या प्रशासनिक स्वीकृति बाकी है?
क्या बजट मद उपलब्ध नहीं है?
क्या डीपीआर अथवा तकनीकी स्वीकृति में कमी है?
या फिर प्रस्ताव को प्राथमिकता सूची में पीछे कर दिया गया है?
इन सवालों का जवाब राजनीतिक बयान से नहीं,फाइल की नोटशीट और विभागीय आदेश से मिलना चाहिए।
इन्हीं जानकारीयो को जन सूचना के अधिकार में बड़े डुमरपाली के युवक नवीन दर्शन ने विभाग से मांग किया गया तो विभाग समय से उपलब्ध नहीं कराया जाने कि बाते युवक ने बताया …
पर्दे के पीछे की कहानी धीरे-धीरे सामने आने लगी है?
सड़क के मामले में अब राजनीतिक श्रेय और प्रशासनिक प्रक्रिया की चर्चा भी तेज हो रही है। जनता के बीच यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि विकास कार्यों का निर्धारण जरूरत और तकनीकी प्राथमिकता से हो रहा है या राजनीतिक श्रेय की प्रतिस्पर्धा भी कहीं भूमिका निभा रही है।
लेकिन किसी व्यक्ति या जनप्रतिनिधि पर सीधे आरोप लगाने से पहले संबंधित विभाग से यह स्पष्ट होना चाहिए कि भालुनारा–राबर्टसन सड़क की वर्तमान स्थिति क्या है और फाइल किस स्तर पर लंबित है।
जनता को श्रेय की राजनीति नहीं, सड़क चाहिए।
किसके प्रयास से राशि आई—यह बाद की बात है; गांवों के लिए सड़क कब बनेगी,यह पहला सवाल है।
अब जरूरत है कि जिला पंचायत,लोक निर्माण विभाग और जिला प्रशासन दोनों सड़कों की स्वीकृति,बजट मद, प्रस्तावित लागत,तकनीकी स्वीकृति और वर्तमान स्थिति का तुलनात्मक विवरण सार्वजनिक करें।
क्योंकि दस्तावेजों की भाषा भले सरकारी हो, लेकिन जनता का सवाल बिल्कुल सीधा है—
“खड़गांव–गोरपार की फाइल मंजिल तक पहुंच गई,तो भालुनारा–राबर्टसन की फाइल रास्ते में आखिर किस मोड़ पर रुक गई?”
और अगर पर्दे के पीछे वास्तव में कोई कहानी है,तो वह आरोपों से नहीं, सरकारी फाइल के अगले पन्ने से सामने आनी चाहिए।




