खरसिया:डीजल की कतार में किसान या व्यवस्था की परीक्षा?

“डब्बे में डीजल नहीं दिया जाएगा और बार-बार लोहे के कैच व्हील को खोला नहीं जा सकता। रोज ट्रैक्टर में कैच व्हील लगाकर ही डीजल लेने जाएंगे, चाहे जो भी हो।”
— मनोज गवेल,ब्लॉक कांग्रेस अध्यक्ष, खरसिया

एक तरफ क्षेत्र के पंप में डीजल वितरण को लेकर उठा यह विवाद अब केवल ईंधन लेने की सुविधा का मुद्दा नहीं रह गया है,बल्कि यह प्रशासनिक व्यवस्था और किसानों की व्यावहारिक कठिनाइयों के बीच बढ़ती दूरी का प्रतीक बनता जा रहा है।
धान की खेती के मौसम में किसान का हर दिन समय से बंधा होता है। खेत में कीचड़ के लिए लगाए गए भारी-भरकम कैच व्हील को बार-बार खोलना और फिर लगाना कोई सामान्य प्रक्रिया नहीं है। इसमें समय,श्रम और अतिरिक्त खर्च लगता है। यदि पेट्रोल पंप पर डब्बे में डीजल देने से इनकार किया जाता है,तो किसान को मजबूर होकर उसी स्थिति में ट्रैक्टर लेकर सड़क पर आना पड़ता है।
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ब्लॉक कांग्रेस अध्यक्ष के साथ किसान मनोज गवेल का यह बयान केवल राजनीतिक प्रतिक्रिया नहीं,बल्कि उस असंतोष की अभिव्यक्ति है जो किसानों की दैनिक परेशानियों से जुड़ा है। यदि वास्तव में ऐसी स्थिति है कि किसान को बार-बार ट्रैक्टर की संरचना बदलनी पड़ रही है,तो यह व्यवस्था पर पुनर्विचार का विषय है।
दूसरी ओर,यह भी ध्यान रखना आवश्यक है कि पेट्रोल पंप संचालक और तेल कंपनियां सुरक्षा तथा नियामकीय दिशा-निर्देशों के तहत डीजल वितरण करती हैं। यदि डब्बे में डीजल देने पर प्रतिबंध या सीमाएं हैं, तो उनका पालन भी आवश्यक है। ऐसे में समाधान टकराव नहीं, बल्कि ऐसा व्यावहारिक तंत्र होना चाहिए जिसमें सुरक्षा नियमों का पालन भी हो और किसानों की वास्तविक कठिनाइयों का भी समाधान निकले।
आज आवश्यकता इस बात की है कि जिला प्रशासन, खाद्य एवं नागरिक आपूर्ति विभाग, तेल कंपनियां और किसान प्रतिनिधि एक साथ बैठकर ऐसा रास्ता निकालें जिससे खेती के मौसम में किसानों को अनावश्यक परेशानी न उठानी पड़े।
यदि प्रशासन और संबंधित विभाग ने किसानों की समस्याओं का शीघ्र समाधान नहीं किया, तो क्षेत्र में व्यापक किसान आंदोलन की स्थिति बन सकती है। किसानों के बीच बढ़ती नाराजगी को देखते हुए स्थानीय स्तर पर विरोध-प्रदर्शन की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता। अब सबकी निगाहें प्रशासन की आगामी कार्यवाही और निर्णय पर टिकी हैं।
किसान खेत में अन्न उगाने के लिए संघर्ष करता है। यदि उसे ईंधन प्राप्त करने के लिए भी संघर्ष करना पड़े, तो यह केवल एक व्यक्ति की समस्या नहीं, बल्कि व्यवस्था के लिए आत्ममंथन का विषय है। लोकतंत्र में समाधान संवाद से निकलता है, टकराव से नहीं। यदि समय रहते इस समस्या का व्यावहारिक समाधान नहीं खोजा गया, तो यह विवाद आने वाले दिनों में और व्यापक रूप ले सकता है।




