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रोटी कमाने निकला था परदेस, लौटी सिर्फ मौत की खबर; बुझ गया एक और घर का चिराग…

खरसिया। रोज़ी-रोटी की तलाश में सैकड़ों किलोमीटर दूर अपने घर-आंगन से निकलकर औद्योगिक क्षेत्रों में काम करने वाले श्रमिकों की जिंदगी अक्सर संघर्षों की लंबी दास्तान होती है। इन संघर्षों के बीच जब पारिवारिक रिश्तों में तनाव की परछाइयाँ गहराने लगती हैं,तब कई बार परिणाम इतने दुखद होते हैं कि पीछे केवल सवाल,सन्नाटा और आंसू ही शेष रह जाते हैं।

ऐसा ही एक मार्मिक मामला खरसिया थाना क्षेत्र के ग्राम टेमटेमा स्थित एस के वाई कंपनी के आवासीय परिसर से निकलकर सामने आया है, जहां उत्तर प्रदेश के फतेहपुर जिले थाना बिन्दकी ग्राम जरौली के निवासी 28 वर्षीय बाबू पाल ने कथित रूप से फांसी लगाकर अपनी जीवनलीला समाप्त कर ली। परिवार और साथियों के अनुसार वह कंपनी में असिस्टेंट फिटर के रूप में कार्यरत था और अपने भाइयों के साथ कंपनी द्वारा उपलब्ध कराए गए आवास टेमटेमा में रहता था।

मीडिया को मिली तथ्यों के अनुसार घटना के दिन दोपहर में उसकी पत्नी शिवानी का मोबाइल पर रिंग आया था। मोबाइल पर व्यक्त चिंता केवल एक सूचना नहीं थी,बल्कि शायद एक ऐसे मन की पीड़ा का संकेत थी जो भीतर ही भीतर टूट रहा था। औद्योगिक परिसर से मझला भाई जब तक आवास पहुंचे,तब तक बाबू पाल फंदे पर झूलता मिला। सांसें अभी बाकी थीं,उम्मीद भी शेष थी। उसे तत्काल अस्पताल पहुंचाया गया, फिर खरसिया रेफर किया गया, लेकिन चिकित्सकों के प्रयासों के बीच जिंदगी की डोर टूट चुकी थी।

यह घटना केवल एक युवक की मृत्यु नहीं है। यह उन अनगिनत प्रवासी श्रमिकों की मौन व्यथा भी है, जो रोजगार की मजबूरियों के कारण परिवार से दूर रहते हैं। आर्थिक जिम्मेदारियों का बोझ, कार्यस्थल का दबाव, पारिवारिक अपेक्षाएं और भावनात्मक अकेलापन कई बार मनुष्य को ऐसी मानसिक स्थिति में पहुंचा देता है, जहां वह अपने दर्द को किसी से साझा नहीं कर पाता।

सबसे पीड़ादायक तथ्य यह है कि इस पूरे घटनाक्रम में कहीं कोई शोर नहीं था। न कोई विवाद, न कोई सार्वजनिक हंगामा। केवल एक परिवार था जो टूट रहा था,एक पत्नी थी जो चिंता में मोबाइल पर रिंग कर रही थी और भाई थे जो अपने छोटे भाई को बचाने की अंतिम कोशिश कर रहे थे।

समाज के लिए यह घटना एक गंभीर चेतावनी भी है। मानसिक तनाव और पारिवारिक समस्याओं को अक्सर निजी मामला मानकर नजर अंदाज कर दिया जाता है, जबकि यही समस्याएं धीरे-धीरे व्यक्ति को भीतर से खोखला कर सकती हैं। समय रहते संवाद, संवेदनशीलता और भावनात्मक सहयोग किसी भी संकटग्रस्त व्यक्ति के लिए जीवनदायी साबित हो सकता है।

आज बाबू पाल नहीं है। पीछे छूट गए हैं उसके अधूरे सपने, परिजनों की स्मृतियां और कई अनुत्तरित प्रश्न। परदेस की उस मकान में बुझा यह जीवन एक बार फिर हमें याद दिलाता है कि आर्थिक प्रगति के इस दौर में मानसिक स्वास्थ्य और पारिवारिक संवाद की आवश्यकता पहले से कहीं अधिक महत्वपूर्ण हो गई है।

खरसिया पुलिस ने मर्ग कायम कर मामले की जांच प्रारंभ कर दी है। एक युवा जीवन के असमय अवसान ने कई प्रश्न अनुत्तरित छोड़ दिए हैं। बाबू पाल को आखिर किन परिस्थितियों ने इस दर्दनाक कदम तक पहुंचाया, इसका जवाब अब जांच और पोस्टमार्टम रिपोर्ट से ही मिल सकेगा। फिलहाल खरसिया पुलिस हर पहलू की पड़ताल में जुटी है,

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Gopal Krishna Naik

Editor in Chief Naik News Agency Group

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