गौवंश का हाल देखकर भी क्यों खामोश है हमारा नगर? कचरे के ढेर में भोजन तलाशती गौ वंश,व्यवस्था पर गंभीर सवाल…

खरसिया। नगर की सड़कों और गलियों में घूमता गौवंश अब केवल यातायात की समस्या नहीं,बल्कि नगर की स्वच्छता व्यवस्था,पशु संरक्षण और प्रशासनिक संवेदनशीलता पर सीधा सवाल बनता जा रहा है। सामने आई तस्वीर में एक गौ वंश कचरे और प्लास्टिक से भरे ढेर के बीच भोजन तलाशता दिखाई दे रहा है। यह दृश्य किसी एक पशु की मजबूरी नहीं, बल्कि उस व्यवस्था का आईना है जिसमें कचरा खुले में पहुंचता है और बेजुबान पशु उसी में अपना पेट भरने को विवश हैं।
कचरा इंसान फैलाता है,कीमत गौ वंश चुकाता है

नगर में खुले में फेंके जाने वाले प्लास्टिक,घरेलू कचरे और खाद्य अपशिष्ट का सीधा असर गौवंश पर पड़ता है। भोजन की तलाश में ये पशु कचरे के ढेर तक पहुंचते हैं और कई बार खाने योग्य सामग्री के साथ प्लास्टिक भी निगल लेते हैं। इसके परिणाम गंभीर हो सकते हैं।
सवाल यह है कि जब गौ वंश की रक्षा और स्वच्छता दोनों की जिम्मेदारी व्यवस्था के सामने स्पष्ट है,तो फिर खुले कचरे और गौ वंश की समस्या लगातार क्यों दिखाई देती है?
गौ सेवा केवल भाषणों और आयोजनों तक सीमित क्यों?
गौवंश के संरक्षण को लेकर धार्मिक और सामाजिक स्तर पर लगातार बातें होती हैं। पर्व-त्योहारों पर गौ सेवा के संकल्प लिए जाते हैं, लेकिन नगर की गलियों में यदि वही गौ वंश कचरे के बीच भोजन तलाशता नजर आए तो इन संकल्पों की जमीन पर पड़ताल जरूरी है।
गौ सेवा का वास्तविक अर्थ केवल पूजा नहीं,बल्कि उसके लिए सुरक्षित भोजन,स्वच्छ पानी,आश्रय और सुरक्षित वातावरण सुनिश्चित करना भी है।
प्रशासन के सामने कुछ सीधे सवाल
- खुले में कचरा फेंकने पर प्रभावी कार्यवाही क्यों नहीं हो रही?
- गौ वंश के लिए सुरक्षित आश्रय और चारा व्यवस्था कितनी प्रभावी है?
- प्लास्टिकयुक्त कचरे को गौ वंश की पहुंच से दूर रखने की व्यवस्था क्या है?
- सड़कों पर विचरण करने वाले गौ वंश के लिए नगर निकाय की कार्ययोजना क्या है?
- क्या केवल दुर्घटना के बाद कार्यवाही होगी, या उससे पहले स्थायी समाधान किया जाएगा?
यह तस्वीर किसी राजनीतिक आरोप का आधार नहीं, बल्कि एक सार्वजनिक सवाल है—जिसका जवाब व्यवस्था को देना चाहिए।

गौवंश के प्रति संवेदना तभी सार्थक होगी, जब वह तस्वीरों और नारों से निकलकर नगर की सड़कों, कचरा प्रबंधन और पशु संरक्षण की जमीन पर दिखाई दे।



