अजीत सिंह नगर में श्रीमद्भागवत कथा की बही भक्ति-धारा, रास-महारास के आध्यात्मिक रहस्य में डूबे श्रद्धालु

खरसिया। अजीत सिंह नगर में आयोजित श्रीमद्भागवत कथा के षष्ठम दिवस कथा पंडाल मानो वृंदावन की उस भावभूमि में परिवर्तित हो गया, जहां शब्द कथा बनते हैं, संगीत भक्ति बन जाता है और कृष्ण का स्मरण मन को भीतर तक स्पर्श कर जाता है। कथा व्यास आचार्य मृदुल कृष्ण गोस्वामी महाराज के मुखारविंद से जब भगवान श्रीकृष्ण की रास एवं महारास लीला का आध्यात्मिक रहस्य प्रवाहित हुआ तो श्रद्धालु भक्ति के भाव-सागर में देर तक डूबे रहे।
कथा के आरंभ में नंद बाबा को वरुण लोक ले जाने और भगवान श्रीकृष्ण द्वारा उन्हें वापस लाने की लीला का मार्मिक वर्णन हुआ। इसके पश्चात कथा महारास के उस दिव्य प्रसंग की ओर बढ़ी, जिसे सुनते ही कथा पंडाल में एक अद्भुत आध्यात्मिक वातावरण निर्मित हो गया।
रासलीला को समझने के लिए दृष्टि नहीं,भक्ति चाहिए
आचार्य मृदुल कृष्ण गोस्वामी महाराज ने कहा कि रासलीला को सांसारिक दृष्टि से नहीं,बल्कि भक्ति और आध्यात्मिक दृष्टि से समझना चाहिए। गोपियों का श्रीकृष्ण के प्रति प्रेम किसी लौकिक अपेक्षा का नहीं, बल्कि पूर्ण समर्पण और निष्काम भक्ति का प्रतीक है।
महारास के आध्यात्मिक रहस्य को स्पष्ट करते हुए उन्होंने बताया कि जब जीव अपने अहंकार,स्वत्व और सांसारिक आसक्तियों का विसर्जन कर स्वयं को भगवान के श्री चरणों में समर्पित करता है,तभी उसके भीतर वास्तविक भक्ति का उदय होता है। गोपी और सखी केवल कथा के पात्र नहीं,बल्कि उस अनन्य प्रेम और समर्पण के प्रतीक हैं, जिसमें भक्त और भगवान के बीच कोई भेद शेष नहीं रहता।
भगवान भोलेनाथ के गोपी भाव धारण कर महारास के दर्शन करने के प्रसंग ने भी श्रद्धालुओं को भाव-विभोर कर दिया। इसके बाद श्रीकृष्ण का मथुरा गमन,गोपियों का विरह,कंस उद्धार, उद्धव-गोपी संवाद और द्वारिका गमन जैसे प्रसंगों ने कथा को भावनाओं की नई ऊंचाई प्रदान की।
गोपी गीत में छलका विरह,रुक्मिणी मंगल में प्रेम का माधुर्य
गोपी गीत के प्रसंग में आचार्य श्री ने उस विरह की अनुभूति कराई,जिसमें श्रीकृष्ण से दूर होकर भी गोपियों का प्रत्येक श्वास कृष्णमय था। उनके लिए कृष्ण केवल आराध्य नहीं,बल्कि जीवन का आधार थे।
वहीं श्रीकृष्ण-रुक्मिणी विवाह का प्रसंग आया तो कथा पंडाल में मंगल और माधुर्य का भाव छा गया। आचार्य श्री ने रुक्मिणी जी को माता लक्ष्मी का स्वरूप बताते हुए उनके श्रीकृष्ण के प्रति अटूट प्रेम,विश्वास और पूर्ण समर्पण की कथा सुनाई।
कथा के दौरान भक्ति गीतों की स्वर-लहरियों ने वातावरण को और अधिक कृष्णमय कर दिया। ‘नख पै गिरवर लीन्हों धार’, ‘दूर नगरी बड़ी दूर नगरी’, ‘ये तो प्रेम की बात है ऊधौ’ और ‘वंशी बजाय गयो श्याम’ जैसे भजनों पर श्रद्धालु भाव-विभोर होकर झूम उठे।
कथा सुनने नहीं,भीतर उतरने का अवसर मिला
षष्ठम दिवस की कथा ने श्रद्धालुओं को केवल कृष्ण की लीलाओं का श्रवण ही नहीं कराया,बल्कि प्रेम,त्याग,निष्काम भक्ति और पूर्ण समर्पण का संदेश भी दिया। कथा समाप्ति के बाद भी अजीत सिंह नगर का वातावरण ‘राधे-राधे’ और ‘जय श्रीकृष्ण’ के जयघोष से गुंजायमान रहा।
इस भक्तिमय आयोजन में दास को भी अपने साथियों के साथ कथा-रस में गोता लगाने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। ऐसा लगा मानो कुछ समय के लिए संसार की आपाधापी पीछे छूट गई और मन वृंदावन की उसी पावन गलियों में पहुंच गया,जहां हर धड़कन में राधा-कृष्ण का नाम और हर श्वास में भक्ति का संगीत सुनाई देता है।
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कथा का यह दिवस श्रद्धालुओं के मन को भीतर से स्पर्श कर जाने वाली कृष्ण-भक्ति की अनुभूति बन गया।




