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मीठे जामुन का कड़वा सच: बरगढ़ खोला के आदिवासियों की मेहनत पर मोलभाव का अन्याय

खरसिया।बरसात की आहट के बीच जंगलों और खेत-खार की गोद में पके मीठे, रसीले जामुन इन दिनों बरगढ़ खोला क्षेत्र के आदिवासी परिवारों के लिए केवल एक मौसमी फल नहीं, बल्कि अतिरिक्त आजीविका का महत्वपूर्ण सहारा हैं। किंतु दुखद यह है कि जिन हाथों ने चिलचिलाती धूप में अपनी जान जोखिम में डालकर ऊंचे-ऊंचे वृक्षों पर चढ़कर इन जामुनों को तोड़ा, उन्हीं मेहनतकश हाथों की उपज आज बिचौलियों और बाहरी व्यापारियों के शोषण का शिकार बनती दिखाई दे रही है।

सुबह से जंगलों और खेतों में पसीना बहाकर आदिवासी महिलाएं, पुरुष और बच्चे जामुन एकत्र करते हैं। कई बार फिसलन भरी डालियों और ऊंचाई के कारण दुर्घटना का खतरा भी बना रहता है। लेकिन जब यही मेहनत बाजार तक पहुंचती है, तब उसकी कीमत तय करने वाले हाथ मेहनतकश नहीं, बल्कि दलाल और व्यापारी होते हैं।

क्षेत्र के ग्रामीणों का आरोप है कि गांवों में पहुंचने वाले कुछ पिकअप वाहन सवार व्यापारी स्थानीय बिचौलियों के साथ मिलकर पहले जामुन की गुणवत्ता पर सवाल उठाते हैं। फल को “गीला”, “खराब” या “कमजोर माल” बताकर उत्पादकों का मनोबल तोड़ा जाता है और फिर 25 से 30 रुपये प्रति किलो का भाव प्रस्तावित कर दिया जाता है। जबकि यही जामुन कुछ समय पहले तक 50 रुपये प्रति किलो या उससे अधिक मूल्य पर बिक रहा था।

यह केवल कीमत का सवाल नहीं है, बल्कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था में असमान शक्ति संतुलन का प्रतीक भी है। एक ओर आदिवासी परिवार हैं, जिन्हें तत्काल नकदी की आवश्यकता रहती है, दूसरी ओर संगठित खरीदार हैं, जिनके पास परिवहन, भंडारण और बाजार की जानकारी का पूरा तंत्र मौजूद है। परिणामस्वरूप सौदे की मेज पर कमजोर पक्ष हमेशा उत्पादक ही बन जाता है।

विडंबना यह है कि जंगल और खेत-खार की इस प्राकृतिक संपदा का वास्तविक लाभ उस व्यक्ति तक नहीं पहुंच रहा, जिसने उसे अपने श्रम से बाजार योग्य बनाया। गांव से सस्ते में खरीदा गया जामुन शहरों में पहुंचते-पहुंचते कई गुना कीमत पर बिकता है, लेकिन मूल्यवृद्धि का लाभ आदिवासी परिवारों को नहीं मिलता।

जानकार मानते हैं कि यदि वनोपज संग्रहण के लिए सहकारी व्यवस्था, न्यूनतम समर्थन मूल्य जैसी प्रणाली या स्थानीय संग्रहण केंद्र विकसित किए जाएं, तो उत्पादकों को उनकी मेहनत का उचित प्रतिफल मिल सकता है। साथ ही ग्रामीणों को बाजार भाव की जानकारी उपलब्ध कराना भी आवश्यक है, ताकि वे मजबूरी में अपनी उपज औने-पौने दाम पर बेचने को विवश न हों।

खरसिया के बरगढ़ खोला के जामुन केवल एक फल नहीं हैं; वे उन मेहनतकश आदिवासी परिवारों के सपनों, श्रम और उम्मीदों का प्रतीक हैं।

यदि उनकी मेहनत का मूल्य बाजार की चालाकियों में खोता रहा, तो यह केवल आर्थिक अन्याय नहीं होगा, बल्कि उस श्रम-संस्कृति के प्रति भी अन्याय होगा जिसने पीढ़ियों से जंगल और प्रकृति के साथ संतुलन बनाकर जीवन जिया है।

आज आवश्यकता इस बात की है कि जामुन की मिठास केवल बाजार तक न पहुंचे, बल्कि उस आदिवासी किसान और वनोपज संग्राहक के जीवन में भी घुले, जिसकी हथेलियों की मेहनत से यह फल हमारे सामने पहुंचता है।

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Gopal Krishna Naik

Editor in Chief Naik News Agency Group

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