Kharsiaआध्यात्मखरसियाछत्तीसगढ़

आस्था के पथ पर: खरसिया से बाबा बर्फानी की शरण तक…

खरसिया।माँ गुरु कापालिक धर्म रक्षित राम जी का स्नेह दुलार आर्शीवाद लेकर

आप भी आएं आपने संगी साथीयो संग

10 जुलाई 2026 को खरसिया रेलवे स्टेशन केवल एक प्रस्थान स्थल नहीं था, बल्कि आस्था,विश्वास और उत्साह से भरे उन कदमों का साक्षी था, जो हिमालय की गोद में विराजमान बाबा बर्फानी के दिव्य धाम की ओर बढ़ रहे थे। हीराकुंड एक्सप्रेस के वातानुकूलित कोच में श्रद्धा, उल्लास और आध्यात्मिक ऊर्जा का अद्भुत संगम दिखाई दे रहा था।


यात्रा दल में कृष्ण कुमार पटेल, हीरा पटेल, पवन डनसेना, केदार पटेल, ओमप्रकाश पटेल गुरुजी, ओमप्रकाश पटेल, राजेश डनसेना, पप्पू पटेल, राजू पटेल, भीष्मा पटेल, अवितेश (बंटी) राठौर और राहुल पटेल सहित सभी श्रद्धालु एक ही उद्देश्य लेकर निकले थे—देवाधिदेव महादेव के पवित्र धाम में शीश नवाने का सौभाग्य प्राप्त करना।
रेल की खिड़कियों से बदलते दृश्य, सहयात्रियों के साथ होती आत्मीय चर्चाएँ, बीच-बीच में गूंजते “हर-हर महादेव” के उद्घोष और बाबा बर्फानी के दर्शन की कल्पना ने लंबी रेल यात्रा को भी सहज और आनंदमय बना दिया। समय जैसे अपनी गति भूल गया और हर पड़ाव श्रद्धा की एक नई अनुभूति लेकर आता रहा।


लंबी यात्रा के बाद देर रात अमृतसर रेलवे स्टेशन पहुँचना भी अपने आप में एक अनुभव था। थकान शरीर पर अवश्य थी, किंतु मन में बाबा के बुलावे का उत्साह कहीं अधिक प्रबल था। स्टेशन से बाहर निकलते ही आगे की यात्रा की व्यवस्था का प्रश्न सामने था। ऐसे समय में राजेश डनसेना ने तत्परता दिखाते हुए ऑटो की व्यवस्था की और सभी श्रद्धालु सुरक्षित बस अड्डे तक पहुँचे। थोड़े प्रयास और आवश्यक जुगाड़ के बाद एसी स्लीपर बस मिल गई। रात का शेष सफर बस की शांत गति और गहरी नींद के बीच बीता, मानो प्रकृति स्वयं अगले चरण की यात्रा के लिए यात्रियों को विश्राम दे रही हो।

प्रातःकाल जब बस जम्मू पहुँची, तब हल्की-हल्की फुहारों ने पूरे वातावरण को अद्भुत ताजगी से भर दिया। पर्वतीय हवाओं की शीतलता,बादलों की छाया और वर्षा की महीन बूंदों ने ऐसा आभास कराया मानो स्वयं प्रकृति बाबा के भक्तों का स्वागत कर रही हो। यात्रा की थकान पलभर में गायब हो गई और मन नई ऊर्जा से भर उठा।


जम्मू में सबसे पहले आरएफआईडी (RFID) कार्ड बनवाने की प्रक्रिया पूरी की गई। अपेक्षाकृत कम समय में लगभग तीन घंटे के भीतर सभी औपचारिकताएँ पूर्ण हो गईं। यह आधुनिक व्यवस्था सुरक्षा और सुव्यवस्थित यात्रा का महत्वपूर्ण आधार है, जिससे प्रत्येक श्रद्धालु की यात्रा अधिक सुरक्षित और सुगम बनती है।
निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार अगले दिन, 14 जुलाई की यात्रा के लिए पहलगाम बेस कैंप पहुँचा गया। पंजीकरण, स्वास्थ्य परीक्षण और अन्य आवश्यक औपचारिकताएँ पूर्ण करने के बाद सभी श्रद्धालुओं ने वहीं रात्रि विश्राम किया। बेस कैंप का वातावरण किसी साधना स्थल से कम नहीं था। चारों ओर “बम-बम भोले” और “हर-हर महादेव” के जयघोष, दूर-दूर तक फैले तंबू, हिमालय की ठंडी हवा और हजारों श्रद्धालुओं की अटूट आस्था इस यात्रा को केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि आध्यात्मिक महाकुंभ का स्वरूप प्रदान कर रहे थे।
रात्रि का अंधकार अभी पूरी तरह समाप्त भी नहीं हुआ था कि प्रातः 3:00 बजे सभी श्रद्धालु निर्धारित काफिले (कॉन्वॉय) की बसों में सवार हो गए। जम्मू से लगभग 250 से 300 किलोमीटर की यह पर्वतीय यात्रा केवल दूरी तय करने का माध्यम नहीं थी, बल्कि श्रद्धा, धैर्य, अनुशासन और विश्वास की वास्तविक परीक्षा थी। हर मोड़ के साथ हिमालय और निकट आता गया, और हर धड़कन में केवल एक ही भाव गूंज रहा था—अब बाबा बर्फानी के दिव्य दर्शन अधिक दूर नहीं हैं।

पहलगाम से पवित्र गुफा तक—आस्था,तप और आत्मानुभूति की यात्रा

संगी साथियों से मिलें अपनत्व …

पहलगाम की पहली भोर जैसे किसी आध्यात्मिक आमंत्रण के साथ उतरी। लिद्दर नदी की कल-कल ध्वनि, देवदार के घने वन और हिमालय की श्वेत चोटियाँ मानो हर यात्री का मौन स्वागत कर रही थीं। यहीं से वह पथ प्रारंभ होता है, जिस पर कभी स्वयं भगवान शिव ने माँ पार्वती को अमरत्व का रहस्य सुनाने के लिए अपने समस्त सांसारिक बंधनों का त्याग किया था।

चंदनवाड़ी तक पहुँचते-पहुँचते प्रकृति का स्वरूप बदलने लगता है। हर मोड़ पर बर्फ से ढकी पर्वत-श्रृंखलाएँ और वेग से बहती हिमधाराएँ यह एहसास कराती हैं कि यह केवल पर्वतीय यात्रा नहीं, बल्कि श्रद्धा की परीक्षा है। आगे पिस्सू टॉप की कठिन चढ़ाई सांसों की गति अवश्य बढ़ाती है, किंतु “हर-हर महादेव” का उद्घोष प्रत्येक थकान को भक्ति में परिवर्तित कर देता है।

संध्या तक शेषनाग पहुँचने पर नीले आकाश का प्रतिबिंब झील के शांत जल में उतर आता है। लोकमान्यता है कि यही वह पावन स्थल है जहाँ भगवान शिव ने अपने गले में विराजमान शेषनाग का त्याग किया था। हिमाच्छादित पर्वतों के मध्य बिताई गई वह रात्रि जीवनभर स्मृति में अंकित रहने वाली आध्यात्मिक अनुभूति बन जाती है।

अगले दिन की कठिन चढ़ाई मानो मनुष्य के धैर्य और विश्वास की अंतिम परीक्षा लेती है। लगभग चौदह हजार फीट की ऊँचाई पर पहुँचकर ऐसा प्रतीत होता है जैसे धरती और आकाश के बीच की दूरी समाप्त हो गई हो। इसके बाद पंचतरणी की पवित्र भूमि दिखाई देती है, जहाँ पाँच निर्मल जलधाराएँ शिव की अनंत कृपा का प्रतीक बनकर बहती हैं।

मृत्यु और महादेव के मध्य…


पवित्र अमरनाथ गुफा अब अधिक दूर नहीं थी। आधे से अधिक सीढ़ीयां पार कर चुका था, लेकिन ऊँचाई बढ़ने के साथ शरीर ने जैसे सांसों का साथ छोड़ना शुरू कर दिया। साँसें भारी होने लगीं,कदम डगमगाने लगे और एक क्षण ऐसा आया जब लगा मानो जीवन की डोर हाथों से फिसल रही हो।
साथ चल रहे कृष्ण कुमार पटेल ने परिस्थिति की गंभीरता को तुरंत समझा। मुझे हाॅस्पिटल पहुँचाया और ऑक्सीजन दी गई। कुछ ही देर में शरीर ने फिर से जीवन का स्पर्श महसूस किया। मन में एक ही संकल्प था—जब बाबा बर्फानी ने बुलाया है,तो उनके दर्शन किए बिना लौटना नहीं है।
मैं फिर आगे बढ़ा। पर शायद नियति मेरी आस्था की एक और परीक्षा लेना चाहती थी। पवित्र गुफा से ठीक पहले की 21 सीढ़ियाँ… हर सीढ़ी श्रद्धा की थी, लेकिन हर कदम के साथ ऑक्सीजन का स्तर फिर गिरने लगा। शरीर जवाब दे रहा था,पर मन अभी भी “अघोरानाम परो मंत्र नास्ति तत्व गुरु परम “ का जाप कर रहा था।
उसी निर्णायक क्षण में सेवा का साक्षात् रूप सामने आया। ड्यूटी पर तैनात सीआरपीएफ के एक जवान ने मुझे गिरने नहीं दिया। उसने तत्परता से ऑक्सीजन उपलब्ध कराई, हौसला दिया और तब तक साथ रहा, जब तक साँसें फिर सामान्य होने नहीं लगीं। उस पल लगा कि वह केवल एक जवान नहीं, बल्कि स्वयं बाबा बर्फानी की भेजी हुई कृपा था।
धीरे-धीरे ऑक्सीजन का स्तर सुधरा, शरीर में चेतना लौटी और जीवन ने फिर से मेरा हाथ थाम लिया। आज मैं आप सभी के बीच हूँ, तो यह केवल ईश्वर की असीम कृपा, साथियों के समर्पण और सेवा-भाव से परिपूर्ण उन अनाम देवदूतों के कारण संभव है।
मैं हृदय की गहराइयों से कृष्ण कुमार पटेल,हीरा पटेल,पवन डनसेना,केदार पटेल,ओमप्रकाश पटेल गुरुजी, ओमप्रकाश पटेल,राजेश डनसेना,पप्पू पटेल,राजू पटेल,भीष्मा पटेल,अवितेश (बंटी) राठौर और राहुल पटेल सहित मेरे सभी यात्रा-साथियों,हाॅस्पिटल के चिकित्सकों,सेवा में जुटे प्रत्येक कर्मचारी तथा विशेष रूप से उस सीआरपीएफ जवान को नमन करता हूँ, जिनके प्रयासों ने मेरी साँसों को फिर से जीवन का सहारा दिया।
श्री अमरनाथ यात्रा ने मुझे यह सिखाया कि पर्वतों की ऊँचाई से कहीं अधिक ऊँची होती है सेवा की भावना। जब मनुष्य की शक्ति समाप्त होने लगती है, तब ईश्वर किसी न किसी रूप में अपने दूत भेज देते हैं।
बाबा बर्फानी के द्वार से लौटते हुए मैं केवल दर्शन का प्रसाद ही नहीं,बल्कि संगी साथी,जम्मू-कश्मीर शासन- प्रशासन के प्रयास जीवन का दूसरा अवसर भी अपने साथ लेकर लौटा हूँ…

अंततः वह क्षण आता है, जिसका प्रत्येक श्रद्धालु प्रतीक्षा करता है। पवित्र श्री अमरनाथ गुफा के द्वार पर पहुँचते ही वर्षों की मनोकामनाएँ,जीवन का संघर्ष और समस्त अहंकार स्वतः ही शिवचरणों में समर्पित हो जाते हैं। हिम से निर्मित दिव्य शिवलिंग के प्रथम दर्शन के साथ समय जैसे ठहर जाता है। आँखें नम: होती हैं,कंठ मौन हो जाता है और भीतर केवल एक ही अनुभूति शेष रहती है—महादेव ने बुलाया,तभी यह दर्शन संभव हुआ।

दर्शन के उपरांत बालटाल मार्ग से लौटते समय पर्वतों की कठिन ढलानें यह स्मरण कराती हैं कि शिव का मार्ग सदैव सरल नहीं होता, किंतु जो श्रद्धा और विश्वास के साथ चलता है, उसके प्रत्येक कदम पर अदृश्य रूप से भोलेनाथ का संरक्षण बना रहता है।

धन्यवाद विनोद पटेल,पदुमन पटेल का जिनके सहयोग से AC डिब्बे में रेल यात्रा सम्भव हो पाएगा …

इस प्रकार श्री अमरनाथ यात्रा केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं,बल्कि आत्मविश्वास,धैर्य,समर्पण और ईश्वर के प्रति अटूट आस्था का जीवंत अनुभव बनकर जीवन को नई दिशा प्रदान करती है। लौटता हुआ प्रत्येक यात्री केवल स्मृतियाँ ही नहीं,बल्कि अपने भीतर एक नया आध्यात्मिक प्रकाश भी लेकर लौटता है मुझे ऐसा लगता हैं …

Show More

Gopal Krishna Naik

Editor in Chief Naik News Agency Group

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button
error: Content is protected !!