अकेले चलने वालों के साथ कृष्ण होते हैं…

सत्य,धर्म और एकांत का गीता-दर्शन
जीवन के विराट रंगमंच पर एक प्रश्न बार-बार मनुष्य की आत्मा को उद्वेलित करता है—जो लोग छल नहीं करते, जिनके हृदय में करुणा का दीप जलता है, जो दूसरों के लिए अपना सर्वस्व अर्पित कर देते हैं, वही लोग अक्सर सबसे अधिक अकेले क्यों रह जाते हैं?
यह प्रश्न नया नहीं है। कुरुक्षेत्र के मैदान में अर्जुन भी इसी द्वंद्व से गुजर रहे थे। उनके सामने अपने ही लोग थे, अपने ही संबंध थे, अपना ही संसार था। तब भगवान श्रीकृष्ण ने जो उत्तर दिया, वह केवल अर्जुन के लिए नहीं, बल्कि उन सभी लोगों के लिए था जो सत्य के मार्ग पर चलते हुए कभी न कभी अकेले पड़ जाते हैं।
भगवान कहते हैं—
> “कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।” (गीता 2.47)
अर्थात् मनुष्य का अधिकार केवल कर्म पर है, फल पर नहीं।
यही वह बिंदु है जहाँ सच्चे और सामान्य व्यक्ति के मार्ग अलग हो जाते हैं। अधिकांश लोग प्रशंसा, स्वीकृति और लाभ के लिए कर्म करते हैं, जबकि सच्चा व्यक्ति केवल इसलिए सही कार्य करता है क्योंकि वह सही है। परिणामस्वरूप वह भीड़ की तालियों से नहीं, अपने अंतःकरण की आवाज़ से संचालित होता है। ऐसे व्यक्ति को कभी-कभी समाज समझ नहीं पाता और वह अकेला दिखाई देने लगता है।
धर्म का मार्ग सदैव भीड़ से अलग होता है
कृष्ण अर्जुन से कहते हैं—
> “श्रेयान्स्वधर्मो विगुणः परधर्मात्स्वनुष्ठितात्।” (गीता 3.35)
अर्थात् अपना धर्म अपूर्ण रूप से निभाना भी दूसरे के धर्म को पूर्ण रूप से निभाने से श्रेष्ठ है।
धर्म कभी-कभी हमें उन निर्णयों तक ले जाता है जहाँ अपने भी विरोधी बन जाते हैं। सत्य बोलने वाला व्यक्ति अक्सर चापलूसी करने वालों की भीड़ में असहज प्रतीत होता है। न्याय की बात करने वाला व्यक्ति अन्याय से लाभ उठाने वालों को खटकता है। इसलिए धर्म का मूल्य प्रायः एकांत के रूप में चुकाना पड़ता है।
एकांत दंड नहीं, आत्मा का प्रशिक्षण है
जब जीवन में विश्वासघात होता है, जब अपने ही साथ छोड़ देते हैं, तब मनुष्य सोचता है कि ईश्वर ने उसे त्याग दिया। परंतु गीता इसका विपरीत संदेश देती है।
भगवान कहते हैं—
> “उद्धरेदात्मनात्मानं नात्मानमवसादयेत्।” (गीता 6.5)
अर्थात् मनुष्य स्वयं अपने को ऊपर उठाए, स्वयं को गिरने न दे।
एकांत आत्मा का वह विद्यालय है जहाँ मनुष्य बाहरी सहारों के बिना खड़ा होना सीखता है। जिन लोगों का चरित्र महान बनना होता है, जीवन उनकी परीक्षा भी असाधारण लेता है। सोना जितना शुद्ध होता है, अग्नि में उतना ही अधिक तपता है।
सत्व की रोशनी अक्सर अकेली होती है
गीता तीन गुणों—सत्व, रजस और तमस—का वर्णन करती है।
> “सत्त्वं निर्मलत्वात् प्रकाशकमनामयम्।” (गीता 14.6)
सत्व निर्मल है, प्रकाश देने वाला है।
किन्तु संसार का बड़ा भाग रजस और तमस से संचालित होता है—लालसा, प्रतिस्पर्धा, मोह और अज्ञान से। ऐसे वातावरण में सत्वगुणी व्यक्ति का अकेला पड़ जाना अस्वाभाविक नहीं है। वह अंधकार में दीपक की तरह होता है; प्रकाश का स्वभाव चमकना है, भीड़ जुटाना नहीं।
अनासक्ति को लोग दूरी समझ लेते हैं
कृष्ण का सबसे बड़ा संदेश है—अनासक्ति।
> “विहाय कामान्यः सर्वान्पुमांश्चरति निःस्पृहः।” (गीता 2.71)
जो इच्छाओं और आसक्तियों से मुक्त होकर चलता है, वही शांति प्राप्त करता है।
सच्चे लोग प्रेम करते हैं, लेकिन स्वामित्व नहीं चाहते। वे संबंध निभाते हैं, लेकिन किसी को बंधन नहीं बनाते। दुर्भाग्यवश, अधिकार को ही प्रेम मानने वाली दुनिया इस स्वतंत्रता को अक्सर दूरी समझ बैठती है। परिणामस्वरूप अनासक्त व्यक्ति अकेला दिखने लगता है, जबकि उसके भीतर प्रेम का अथाह सागर बह रहा होता है।
विश्वासघात भी एक आध्यात्मिक शिक्षा है
विश्वासघात मनुष्य के हृदय को तोड़ता अवश्य है, लेकिन गीता कहती है कि यह हमें एक गहरे सत्य से परिचित कराता है—संसार का कोई भी संबंध शाश्वत नहीं है।
> “अनित्यमसुखं लोकमिमं प्राप्य भजस्व माम्।” (गीता 9.33)
यह संसार अनित्य है, इसलिए परम सत्य की ओर बढ़ो।
जब मनुष्य बार-बार टूटता है, तब वह समझता है कि स्थायित्व किसी व्यक्ति, पद या संबंध में नहीं, बल्कि आत्मा और परमात्मा के संबंध में है।
अंतिम सत्य
सच्चे लोग इसलिए अकेले नहीं रह जाते कि उनमें कोई कमी होती है। वे इसलिए अकेले दिखते हैं क्योंकि उनका मार्ग भीड़ से अलग होता है। वे सत्य को सुविधा पर, धर्म को लोकप्रियता पर और आत्मा को अहंकार पर चुनते हैं।
कुरुक्षेत्र में अर्जुन भी अकेले थे,लेकिन उनके सारथी स्वयं कृष्ण थे।
गीता का सबसे बड़ा संदेश है—
जब संसार साथ छोड़ देता है,तब भी जो व्यक्ति धर्म के पथ पर अडिग रहता है, वह वास्तव में अकेला नहीं होता। उसके रथ की लगाम स्वयं श्रीकृष्ण थाम लेते हैं।

और तब एकांत बोझ नहीं रह जाता,बल्कि आत्मा की सबसे पवित्र यात्रा बन जाता है।




