
“राह लंबी थी,रात गहरी थी,शरीर थका था…लेकिन मन में बाबा थे, इसलिए कदम रुक नहीं सके।”
कुछ यात्राएं केवल एक स्थान से दूसरे स्थान तक पहुंचने की यात्रा नहीं होतीं। वे मन की गहराइयों में उतरने वाली ऐसी अनुभूतियां बन जाती हैं,जिन्हें समय बीत जाने के बाद भी भुलाया नहीं जा सकता।
मेरे लिए गृह ग्राम से देवघर स्थित बाबा बैद्यनाथ धाम की यह यात्रा भी ऐसी ही एक अविस्मरणीय आध्यात्मिक यात्रा रही।
सावन का पवित्र सोमवार था और मन में एक ही संकल्प—बाबा बैद्यनाथ के दरबार में पहुंचकर अपने हाथों से जल अर्पित करना।

रविवार की सुबह 10:43 बजे अमृत काल में सड़क मार्ग से यात्रा का शुभारंभ हुआ।

चपले (खरसिया) → रायगढ़ → झारसुगुड़ा → राउरकेला → रांची → रामगढ़ → हजारीबाग → कोडरमा → गिरिडीह होते हुए देवघर की ओर बढ़ते गए।
लगभग 650 किलोमीटर की लंबी दूरी सामने थी।

सड़क लंबी थी,सफर लगातार था पायलेट अकेला और मंजिल अभी बहुत दूर।
लेकिन मन में एक अजीब-सा विश्वास था—
“जब बाबा ने बुलाया है,तो रास्ता भी वही दिखाएंगे और मंजिल तक भी वही पहुंचाएंगे।”
रविवार की सुबह अमृत काल में शुरू हुई यह यात्रा कब दोपहर से शाम और फिर रात में बदल गई,पता ही नहीं चला। रास्ते बदलते रहे,शहर पीछे छूटते रहे, लेकिन मन की दिशा एक ही थी—देवघर।
रात गहराती गई। शरीर थकने लगा। आंखों में नींद दस्तक देने लगी। सड़क की लंबी दूरी अब महसूस होने लगी थी। कई बार लगा कि अभी बहुत दूर जाना बाकी है।
लेकिन बाबा का नाम मन को फिर संभाल लेता—
हर-हर महादेव… हर-हर महादेव…
और इसी आस्था के सहारे हम आगे बढ़ते रहे।
आखिरकार रात लगभग 3 बजे देवघर की धरती पर पहुंचने का सौभाग्य मिला।
करीब 16 घंटे की सड़क यात्रा और 650 किलोमीटर की दूरी जैसे-तैसे पूरी हुई।
भारी सुरक्षा के बीच शहर में प्रवेश कर पाना असंभव सा लग रहा था … सच कहूं तो उस समय शरीर पूरी तरह थक चुका था,

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लेकिन मन भीतर से बेहद प्रसन्न था।
ऐसा लगा जैसे बाबा ने स्वयं कंधे पर हाथ रखकर कहा हो—
“आ गए… अब बाकी सब मुझ पर छोड़ दो।”

देवघर में रात्रि विश्राम के बाद सावन सोमवार की सुबह जब बाबा बैद्यनाथ के दर्शन और जलाभिषेक के लिए निकला, तो वातावरण ही बदल चुका था।
चारों ओर शिवभक्तों की भीड़।
भगवा रंग में रंगी गलियां।
हर तरफ गूंजता—
“बोल-बम!”
“हर-हर महादेव!”
कहीं कांवड़ियों का उत्साह था, तो कहीं बाबा के दर्शन की प्रतीक्षा में खड़े श्रद्धालुओं की आंखों में अद्भुत श्रद्धा।
मंदिर की ओर बढ़ते हुए महसूस हुआ कि यहां हर व्यक्ति अपने भीतर कोई न कोई मनोकामना लेकर आया है। किसी के लिए बाबा सहारा हैं, किसी के लिए विश्वास, किसी के लिए संकल्प और किसी के लिए जीवन की कठिन राहों में उम्मीद की आखिरी लौ।
मेरे लिए उस दिन बाबा के दरबार तक पहुंचना ही सबसे बड़ा सौभाग्य था।
लंबी कतार सामने थी। समय कम था। शरीर सफर से थका हुआ था।
लेकिन मन में केवल एक बात थी—
“बाबा, अब आप ही संभालिए।”
कदम धीरे-धीरे आगे बढ़ते रहे।
कतार बढ़ती रही।
समय बीतता रहा।
और फिर वह क्षण आया, जिसके लिए यह पूरी 650 किलोमीटर की यात्रा की गई थी।

बाबा बैद्यनाथ के पावन ज्योतिर्लिंग के सम्मुख खड़े होने का क्षण।
हाथों में जल था।
मन में श्रद्धा थी।
आंखों में भावनाएं थीं।
और जैसे ही अपने हाथों से बाबा का जलाभिषेक किया, लगा कि पिछले कई घंटों की थकान जैसे उसी क्षण बह गई।
उस क्षण शब्द नहीं थे।
केवल भाव था।
केवल समर्पण था।
और भीतर से निकला—

“बाबा, आपने बुलाया… आपने पहुंचाया… और आपने ही अपने चरणों में जल चढ़ाने का सौभाग्य दिया।”
उस क्षण लगा कि 650 किलोमीटर की दूरी वास्तव में दूरी थी ही नहीं। वह तो बाबा तक पहुंचने की एक साधना थी।

देवघर—जहां शिव और शक्ति की आस्था एक साथ धड़कती है
देवघर स्थित रावणेश्वर बाबा बैद्यनाथ धाम भगवान शिव के बारह ज्योतिर्लिंगों में से एक प्रमुख और अत्यंत पवित्र तीर्थ माना जाता है। इसे श्रद्धालु ‘कामना लिंग’ के नाम से भी स्मरण करते हैं।
इस पावन धाम को लेकर धार्मिक मान्यता है कि यहां माता सती का हृदय गिरा था। इसी कारण देवघर को शिव और शक्ति के आध्यात्मिक मिलन से जुड़ा अत्यंत महत्वपूर्ण तीर्थ माना जाता है।
शायद यही वजह है कि यहां पहुंचकर केवल मंदिर दिखाई नहीं देता—
आस्था का एक विराट संसार दिखाई देता है।
हर चेहरे पर उम्मीद।
हर कदम में श्रद्धा।
हर कंठ में महादेव का नाम।
और हर आंख में अपने आराध्य के दर्शन की प्यास।
यात्रा का सबसे बड़ा सत्य
इस यात्रा ने मुझे एक बार फिर यह महसूस कराया कि तीर्थ की दूरी किलोमीटर में नहीं, विश्वास में मापी जाती है।
रक्सापाली से देवघर तक 650 किलोमीटर का रास्ता था।
रविवार सुबह 10:43 बजे अमृत काल में शुरू हुई यात्रा देर रात 03 बजे देवघर पहुंची।

रास्ते में थकान थी, नींद थी, कठिनाई थी और लंबी दूरी थी।
लेकिन मंजिल पर पहुंचकर लगा—
यह सफर मैंने नहीं किया था,बाबा ने करवाया था।

कभी-कभी जिंदगी में हम किसी मंजिल तक पहुंचने की कोशिश करते हैं, लेकिन जब वहां पहुंचते हैं तो समझ आता है कि उस पूरी यात्रा में हमारा साथ किसी अदृश्य शक्ति ने दिया था।
मेरे लिए बाबा बैद्यनाथ की यह यात्रा भी ऐसी ही अनुभूति बन गई।
रक्सापाली से देवघर तक की 650 किलोमीटर की यात्रा समाप्त हुई,
लेकिन बाबा के प्रति आस्था की यात्रा शायद उसी दिन से और गहरी हो गई।
बाबा से बस यही प्रार्थना है—
“हे बाबा बैद्यनाथ!
जैसे आपने अपने दरबार तक बुलाकर अपने चरणों में जल अर्पित करने का सौभाग्य दिया,
वैसे ही जीवन की हर कठिन राह में अपना हाथ सिर पर बनाए रखना।
कदम चाहे कितने भी थक जाएं,
विश्वास कभी न थके।”
हर-हर महादेव।
बोल-बम।
जय बाबा बैद्यनाथ। 🔱🙏




